4/14/2016

सोशल मीडिया क्या है?

एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है
सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है, जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़ने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है।
इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है और हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी किसी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज भी किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसेआपकी वास्तविक जीवन में अभी मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और कॉलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढ़े, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।
अमेरिकी की कठपुतली
दुनिया के दो अहम सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्विटर जिसका मुख्यालय अमेरिका में है, पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। मालूम हो कि फेसबुक की स्थापना 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी। शुरुआत में इसका नाम फेशमाश था और जुकेरबर्ग ने इसकी स्थापना विश्वविद्यालय के सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करके किया था। हार्वर्ड विवि में उन दिनों छात्रों के बारे में बुनियादी सूचनाएं और फोटो देने वाली अलग से कोई डायरेक्ट्री नहीं थी। कुछ ही घंटों के भीतर जुकेरबर्ग का प्रयोग लोकप्रिय हो गया लेकिन विवि प्रशासन ने इस पर गहरी आपत्ति जताई और जुकेरबर्ग को विवि से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उसके बाद फेसबुक ने क्या मुकाम हासिल किया, यह किसी से छुपी हुई नहीं है।
नेटवर्किंग की प्रसिद्ध कंपनी सिस्को ने दुनिया के 18 देशों में कॉलेज जाने वाले युवाओं में इस बात को लेकर कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन किया था कि वे अपने संभावित कार्यालय में क्या-क्या चाहते हैं। भारत में 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे लैपटॉप, टैबलेट या स्मार्टफोन के जरिए ही काम करना पसंद करेंगे। 56 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे ऐसी कंपनी में काम करना पसंद करेंगे, जहां सोशल मीडिया या मोबाइल फोन पर पाबंदी हो।
वहीं, ट्विटर इस दुनिया में 21 मार्च, 2006 को आया और तक से लेकर आज तक यह नित्य नई बुलंदियों को छू रहा है। पहले ट्विटर को केवल कंप्यूटर में प्रयोग किया जा सकता था लेकिन अब यह टैबलेट, स्मार्टफोन आदि में भी डाउनलोड किया जा सकता है। ट्विटर पर अभी तक सिर्फ 140 शब्दों में लिखने की सुविधा थी लेकिन पिछले दिनों इस पर लिखने की शब्दसीमा को बढ़ाया गया है। मालूम हो कि ट्विटर के लिए अभी तक सत्तर हजार से भी अधिक प्लेटफार्म पर अलग-अलग एप्लीकेशनें बन चुकी हैं।
कहां तक है सोशल मीडिया का दायरा
2011 में अरब में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने अहम भूमिका निभाई। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल रहा। इन आंदोलनों के बाद इंटरनेट सेंसरशिप की प्रवृति जिस कदर बढ़ी है, वह शायद ही कभी देखने को मिली। इसके पक्ष में भले ही बहस की जाती रही लेकिन हकीकत यह है कि अलग-अलग देशों में सेंसरशिप अपने विभिन्न अवतारों में मौजूद है। इंटरनेट पर नियंत्रण करने के लिए कहीं इंटरनेट को ब्लॉक किया गया तो कहीं कॉपीराइट, मानहानि, उत्पीड़न और अवमानना को हथियार बनाया जा रहा है।
भारत के गुजरात में जहां हार्दिक पटेल के आंदोलन को देखते हुए इंटरनेट को बंद कर दिया गया था, वहीं मुंबई में बाला साहेब ठाकरे के निधन पर महाराष्ट्र की एक लड़की के कमेंट और उसकी सहेली के उस कमेंट को लाइक करने का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ा, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, पिछले दिनों सरकार ने व्हाट्सएप के संदेशों में लोगों को नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया लेकिन मामले के सामने आ जाने और विरोध के कारण केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना पड़ा।
हो रही निगरानी
वहीं, अमेरिका में इंटरनेट को सेंसर करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के सामने कुछ वर्ष पहले ‘सोपा’ और ‘पीपा’ नामक विधेयक लाया गया था और इसके विरोध स्वरूप अंग्रेजी विकिपीडिया कुछ वक्त के लिए गुल की गई थी। इंटरनेट पर निगरानी रख रही संस्थानों का दावा है कि सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार द्वारा इंटरनेट को सख्त किया जा रहा है। 2010 में ओपन नेट इनिशियेटिव ने विश्व के कुल 40 देशों की लिस्ट जारी की थी, जहां की सरकारें इंटरनेट फिल्टिरिंग कर रही हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव पांच जुलाई 2012 को पारित कर दिया था और परिषद ने सभी देशों से नागरिकों की इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को समर्थन देने की अपील की थी।
अंकुश लगाने की प्रक्रिया जारी
एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है। याद करें देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए गैंग रेप को कि कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इन साइटों पर रेप, मर्डर, गर्ल एजुकेशन जैसे पेज प्रमुख थे। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर उठी नफरत की आंधी बेलगाम सोशल मीडिया का नतीजा था और इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था।
सभी ने मन लोहा
इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में इसकी पूरी ताकत देखने को मिली। हालांकि अमेरिका में बराक ओबामा ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ताकत का लोहा पहले ही दिखा चुके थे। भारत में नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर उपयोग किया और इसका फायदा भाजपा को भी मिला। नरेंद्र मोदी भले ही पूरे चार सौ से अधिक संसदीय क्षेत्र का दौरा किया लेकिन उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास है। लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देता और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। वहीं, दूसरी ओर, उनके तमाम प्रतिद्वंद्वी उनकी रणनीति की कोट पूरे चुनावी समर में सामने नहीं ला पाए और जाहिर सी बात है कि वे चारों खाने चित्त गिरे।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )

खबरों का खेल बनाम एजेंडा सेटिंग

मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता हैमीडिया एजेंडाजो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीति काफी हद तक मीडिया को प्रभावित करती है। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को तवज्जो देता हैकिस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है और ऑडियंस की रुचि कैसी खबरों में हैआदि बातें मायने रखती हैं और फिर खबरों के प्रसारण के बाद उन्हीं बातों पर आम लोग अपनी राय कायम करते हैं।(मैक्सवेल)
खबरों के शतरंजी खेल में कौन ‘राजा” है और कौन ‘प्यादा”, दर्शकों और पाठकों के लिए इसे समझना काफी मुश्किल है। हालांकि वे अपनी राय खबरिया चैनलों पर दिखाई जा रही खबरों और अखबारों में छपे मोटे-मोटे अक्षरों के हेडलाइंस को पढ़कर ही बनाती है और लगातार उन मुद्दों पर विचार-विमर्श भी करती है। यही वह विंदु होता है जहां से मीडिया की एजेंडा सेटिंग का प्रभाव पड़ना शुरू होता है। मीडिया की एजेंडा सेटिंग थ्योरी कहती है कि मीडिया कुछ घटनाओं या मुद्दों को कमोबेश कवरेज देकर राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक बहसों या चर्चाओं का एजेंडा तय करता है। आज खबरिया चैनलों पर प्राइम टाइम की खबरें देंखें तो यह एजेंडा सेटिंग पूरी तरह साफ-साफ समझ में आती है। इस प्राइम टाइम पर सिर्फ खबरें ही नहीं दिखाई जाती बल्कि जोरदार चर्चा के साथ बहस भी की जाती है। चाहे ईपीएफ पर कर लगाने की बात हो या फिर जेएनयू के छात्रों पर मुकदमा दर्ज करने का मामला।
अन्ना आंदोलन के दौरान लोकपाल मामले में संसद में बहस के दौरान शरद यादव ने युवा सांसदों से सवाल किया था कि आप लोग बुद्धू बक्से में बहस के लिए क्यों जाते हैं। वह पिछले दस सालों से वहां बहस करने के लिए नहीं जाते हैं। तो उन्होंने जाने-अनजाने जिस मुद्दे की ओर पूरा देश का ध्यान आकर्षित किया था, उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने इसी मीडिया एजेंडा थ्योरी की ओर ही ध्यान आकर्षित कराया था। इस थ्योरी को सरकार के साथ-साथ राजनीतिक दल और कॉरपोरेट समूह बखूबी समझते हैं क्योंकि इसका आकलन इस बात से किया जा सकता है कि जब भर किसी गंभीर मसला सामने आता है तो विभिन्न राजनीतिक पार्टियां, सरकार और कॉरपोरेट समूह के तेजतर्रार प्रवक्ता इस पर चर्चा कर रहे होते हैं और अपने हिसाब से एजेंडे का मुंह मोड़ते रहते हैं।
आज पाठक या दर्शक ही मीडिया का प्रोडक्ट हो चुका है। जाहिर-सी बात है कि हर प्रोडक्ट को एक बाजार की जरूरत होती है और मीडिया का बाजार और खरीदार का रास्ता विज्ञापन से होकर विज्ञापन तक जाता है। यानी मीडिया का बाजार उसका विज्ञापनदाता है। इस मसले को अमेरिका के संदर्भ में नोम चोमस्की अच्छी तरह समझाते हैं। वे लिखते हैं कि वास्तविक मास मीडिया लोगों को डायवर्ट कर रही है। वे प्रोफेशनल स्पोट्र्स, सेक्स स्कैंडल या फिर बड़े लोगों के व्यक्तिगत बातों को जमकर सामने रखती हैं। क्या इससे इतर और कोई गंभीर मामले ही नहीं होते। जितने बड़े मीडिया घराने हैं वे एजेंडे को सेट करने में लगे हुए हैं। अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स और सीबीएस ऐसे मामलों के बादशाह हैं। उनका कहना है कि अधिकतर मीडिया इसी सिस्टम से जुड़े हुए हैं। संस्थानिक ढांचा भी कमोबेश उसी तरह का है। न्यूयार्क टाइम्स एक कॉरपोरेशन है और वह अपने प्रोडक्ट को बेचता है। उसका प्रोडक्ट ऑडियंस है। वे अखबार बेचकर पैसे नहीं बनाते। वे वेबसाइट के जरिए खबरें पेश करके खुश हैं। वास्तव में जब आप उनके अखबार खरीदते हैं तो वे पैसे खर्च कर रहे होते हैं। लेकिन चूंकि ऑडियंस एक प्रोडक्ट है, इसलिए लोगों के लिए उन लोगों से लिखाया जाता है तो समाज के टॉप लेवल नियतिनियंता हैं। आपको अपने उत्पाद को बेचने के लिए बाजार चाहिए और बाजार आपका विज्ञापनदाता है। चाहे टेलीविजन हो या अखबार या और कुछ आप ऑडियंस को बेच रहे होते हैं। (नोम चोमस्की)
यही कारण है कि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर जब ‘टाइम” मैग्जीन ने कवर स्टोरी छापी और ‘वाशिंगटन पोस्ट” ने लिखा तो भारत सरकार की नींद हराम हो गई। यह मीडिया एजेंडा का ही प्रभाव था कि वैश्विक स्तर पर अपनी साख को बचाने के लिए भारत की कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन में कई फैसले लिए। क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि 1990 के दशक में जब मनमोहन सिंह भारत के वित्तमंत्री थे तो उन्होंने आर्थिक उदारीकरण का दौर लाया था और भारत अमेरिका सहित दुनिया के आर्थिक संपन्न देशों की नजरों में छा गया। यही वह समय था जब मनमोहन सिंह उस दुनिया के चहेते बन गए लेकिन आज जब पश्चिमी मीडिया ने खिचार्इं की तो फिर उन्हें कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर हो गए।
आज के दौर में चाहे सरकार हो या विपक्ष या फिर सिविल सोसाइटी के सदस्य, हर कोई एजेंडा सेट करने में लगा है। देशद्रोह, जेएनयू, अख़लाक़, कन्हैया, रोहित बेमुला, लोकपाल, भ्रष्टाचार, आंदोलन, चुनाव, विदेशी मीडिया, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, टूजी एस्पेक्ट्रम मामला, कोयला आवंटन मामले आदि ऐसे मामले हैं जिनके जरिए विभिन्न रूपों में एजेंडे तय किए गए। क्योंकि हर मामले में चाहे न्यूज चैनल हो या फिर अखबार, हर जगहों पर जमकर बहस हुई और मीडिया की नई भूमिका लोगों ने देखा कि किस तरह आरोपी और आरोप लगाने वाले एक ही मंच पर अपनी-अपनी सफाई दे रहे हैं।
यहीं से मामला गंभीर होता जाता है कि क्या मीडिया की भूमिका एजेंडा सेट करने के लिए होती है। अभी अधिक समय नहीं बीता जब ‘पेड न्यूज” को लेकर संसद तक में हंगामा मचा था। मीडिया के पर्दे के पीछे पेड न्यूज ने किस तरह का खेल खेल रही थी, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। लेकिन मीडिया एजेंडा सेटिंग की ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। यह मामला पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय में सामने आया और इस थ्योरी को लेकर पहली बार मैक्सवेल मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ ने लिखा। 1922 में पहली बार वाल्टर लिप्पमेन ने इस मामले में अपनी बात सामने रखी थी। उनके मुताबिक लोग किसी भी मामले में सीधे तौर पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते बल्कि वे स्यूडो वातावरण में रहते हैं। ऐसे में मीडिया उनके लिए काफी मायने रखता है क्योंकि यह उनके विचारों को प्रभावित करता है। (वाल्टर लिप्पमेन) मालूम हो कि मैक्सवेल मैकॉम्ब और शॉ के द्वारा एजेंडा सेटिंग थ्योरी सामने रखने के बाद इस मामले पर करीब सवा चार सौ अध्ययन हो जुके हैं। वैश्विक तौर पर भौगोलिक और एतिहासिक स्तर पर यह एजेंडा कई स्वरूपों में सामने आया बावजूद इसके दुनिया में तमाम तरह के मसले हैं और तमाम तरह की खबरें भी हैं।
अभी तक एजेंडा सेटिंग के गिरफ्त में विदेशी चैनलों और अखबारों के शामिल होने की खबरें सामने आती थीं लेकिन अब भारतीय मीडिया पूरी तरह इसकी चपेट में है। अखबारों की हेडलाइंस के आकार, खबरों का आकार और प्लेसमेंट मीडिया एजेंडा का कारक होता है तो वहीं टीवी चैनलों में खबरों के पोजिशन और लंबाई उसकी प्राथमिकता और महत्ता को तय करती है। इस मामले में आनंद प्रधान लिखते हैं कि कहने को इन दैनिक चर्चाओं में उस दिन के सबसे महत्वपूर्ण खबर या घटनाक्रम पर चर्चा होती है लेकिन आमतौर पर यह चैनल की पसंद होती है कि वह किस विषय पर प्राइम टाइम चर्चा करना चाहता है। वह कहते हैं कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोकतंत्र में ये चर्चाएं कई कारणों से महत्वपूर्ण होती हैं। ये चर्चाएं न सिर्फ दर्शकों को घटनाओं व मुद्दों के बारे में जागरूक करती हैं और जनमत तैयार करती हैं बल्कि लोकतंत्र में वाद-संवाद और विचार-विमर्श के लिए मंच मुहैया कराती हैं। वह आगे लिखते हैं कि न्यूज मीडिया इन चर्चाओं और बहसों के जरिये ही कुछ घटनाओं और मुद्दों को आगे बढ़ाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय/क्षेत्रीय एजेंडे पर स्थापित करने की कोशिश करते हैं।(आनंद प्रधान) हालांकि एजेंडे का प्रभाव तत्काल दिखाई नहीं देता, इसका प्रभाव दूरगामी भी होता है। वालग्रेव और वॉन एलिस्ट कहते हैं कि एजेंडा सेटिंग का यह मतलब नहीं होता है कि उसके प्रभाव स्पष्ट दीखने लगें बल्कि यह टॉपिक, मीडिया के प्रकार आैर इसके विस्तार के सही समुच्चय के तौर पर सामने आता है। (वालग्रेव एंड वॉन एलिस्ट, 2006)
वर्तमान में भारतीय न्यूज़ चैनलों की खबरों का विश्लेषण करें तो मैक्सवेल ई मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ द्वारा जनसंचार के एजेंडा सेटिंग थ्योरी के निष्कर्ष साफ दिखाई देंगे। पिछले कुछ समय से जो खबरें प्रसारित की जा रही हैं उनके जरिए न्यायपालिका से लेकर संसदीय प्रक्रिया तक के एजेंडे तय हुए हैं। सबसे ताजातरीन मामला आरुषि हत्याकांड का है। आज के दौर में ऐसा लगता है हमारा पूरा का पूरा मीडिया एजेंडा सेटिंग के सिद्धांत में उलझकर रह गया है। ट्रायल और ट्रीब्यूनल्स को किस तरह भारतीय मीडिया पेश करते हैं, यह किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, एजेंडा सेटिंग कई तरह के प्रभाव से भी जुड़े होते हैं मसलन फायदेमंद प्रभाव, खबरों को नजरअंदाज करना, खबरों के प्रकार और मीडिया गेटकीपिंग आदि। (डेयरिंग एंड रोजर्स, 1996:15)
पिछले दिनों एक साक्षात्कार में शेखर गुप्ता मीडिया एजेंडा थ्योरी की बारीकियों को बताते हुए कहा था कि मीडिया का मूल सवाल खड़े करना है लेकिन यह एजेंडा तब हो जाता है जब आप सवाल के जरिए किसी एजेंडे को खड़े करते हैं। इन मसलों पर अब विचार नहीं किया जाता। मसलन भ्रष्टाचार के विरोध में खड़ा हुआ आंदोलन मीडिया को और व्यापक बनाते हैं। यदि मीडिया अच्छे कारणों को लेकर चल रही है और इससे समाज को बड़े पैमाने पर फायदा होगा तो इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जेंडर की समानता को लेकर चलाया गया कंपेन काफी प्रभावशाली रहा था और ‘गुड एजेंडा सेटिंग” का उदाहरण है। साक्षरता, सूचना अधिकार आदि को लेकर चलाया गया कंपेन भी इसी का उदाहरण है। (शेखर गुप्ता)
इसी मसले पर सेवंती नैनन का मानना है कि मीडिया में इतनी ताकत होती है कि वह किसी भी मसले को हमारे दिमाग में भर दे। जैसे अन्ना आंदोलन को लेकर जो नॉन स्टॉफ कवरेज टीवी चैनलों के द्वारा किया गया, इससे हर कोई यह सोचने के लिए विवश हो गया कि कौन-सा राष्ट्रीय मसला महत्वपूर्ण है। जहां तक इसके नकारात्मक पहलू की बात है तो हर किसी को चोर कह देना आैर जेल में डालने की बात कहना, गलता है। ऐसे में यह ध्यान देना चाहिए कि सब कुछ टीआरपी ही नहीं होता। (सेवंती नैनन) गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार एन. राम ने सकारात्मक पक्ष को एजेंडा बिल्डिंग का नाम दिया है और उनका कहना है लोगों को एजेंडा सेटिंग और प्रोपगैंडा के साथ एजेंडा बिल्डिंग के बीच कनफ्यूज नहीं होनी चाहिए।
मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता है, मीडिया एजेंडा, जो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीति काफी हद तक मीडिया को प्रभावित करती है। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को तवज्जो देता है, किस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है और ऑडियंस की रुचि कैसी खबरों में है, आदि बातें मायने रखती हैं और फिर खबरों के प्रसारण के बाद उन्हीं बातों पर आम लोग अपनी राय कायम करते हैं।(मैक्सवेल)
आखिर किस तरह की खबरें दिखाई जा रही हैं और किस तरह के विज्ञापन प्रसारित किए जा रहे हैं, इनकी निगरानी करने वाली संस्थाएं कहां हैं। शुरुआती दौर में एजेंडा सेटिंग के तहत समाचारों का विश्लेषण पब्लिक ओपेनियन पोलिंग डाटा के साथ किया जाता था और राजनीतिक चुनाव के दौरान इसकी मदद से काफी कुछ तय हो जाता है। यही कारण है कि नोम चोमस्की कहते हैं कि इन मामलों में पीआर रिलेशन इंडस्ट्री, पब्लिक इंटलेक्चुअल, बिग थिंकर (जो ओप एड पेज पर छपते हैं) की भूमिका पर ध्यान देना होगा। हालांकि समय के साथ मीडिया के एजेंडे में बदलाव होता रहता है और ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि एक बात तय होती है कि पत्रकारों की सहभागिता के साथ-साथ आम लोग किसी खास मुद्दे पर बात करते हैं और बहस करते हैं।
नोम चोमस्की कहते हैं कि मीडिया की जो भी कंपनियां है, सभी बड़ी कंपनियां हैं और मुनाफे की मलाई काटते हैं। उनका मानना है कि निजी अर्थव्यवस्था की शीर्षस्थ सत्ता संरचना का हिस्सा होती हैं और ये मीडिया कंपनियां मुख्य तौर पर ऊपर बैठे बड़े लोगों द्वारा नियंत्रित होती हैं। अगर आप उन आकाओं के मुताबिक काम नहीं करेंगे, तो आपको नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है। बड़ी मीडिया कंपनियां इसी आका तंत्र का एक हिस्सा है। (नोम चोमस्की) ऐसे में हमें विभिन्न एजेंडों, मीडिया की प्राथमिकता, आम लोगों और कानूनविदों के बीच अंतर को समझना होगा। किस तरह की खबरों को प्रमोट किया जाता है और किस तरह खबरों से खेला जा रहा है, वह भी एजेंडा सेटिंग में मायने रखते हैं। जैसे मीडिया कभी घरेलू मामलों को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय मामलों को तवज्जो देने लगता है या फिर घरेलू मसलों में से किसी खास मसले की खबरें लगातार दिखाई जाती हैं। (रोजर्स एंड डेयरिंग, 1987)
बहरहाल, लोकतंत्र के इस लोक में मीडिया पर बाजार का जबर्दस्त प्रभाव है क्योंकि पेड न्यूज तो पैसे कमाने का साधन मात्र था लेकिन मीडिया एजेंडा तो पूरे तंत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसके दायरे में सिर्फ आर्थिक संसाधन नहीं आते बल्कि पूरे लोक की सोच और समझ के साथ नियति निर्धारकों का मंतव्य भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया एजेंडे थ्योरी को समझना होगा और इसके जरिए पड़ने वाले प्रभाव पर भी बारीक नजर रखनी होगी।
संदर्भ:
नोम चोमस्की, 1997, http://www.chomsky.info/articles/199710–.htm
वाल्टर लिप्पमेन,http://www.agendasetting.com/index.php/agenda-setting-theory
आनंद प्रधान, 2011, http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/994.html
शेखर गुप्ता, 2011, http://www.campaignindia.in/Article/276406,double-standards-why-is-agenda-setting-in-media-significant.aspx
सेवंती नैनन, 2011, http://www.campaignindia.in/Article/276406,double-standards-why-is-agenda-setting-in-media-significant.aspx
डेनिस मैक्वेल, 2010, McQuail’s Mass Communication (6th ed.) Theory, pp. 513-514, Sage Publication
रोजर्स एंड डेयरिंग, 1987, ‘Agenda setting research; Where has it been? Where is it going?, in J. Anderson (ed.) Communication Yearbook 11, pp.555-94, Newbury Park. CA: Sage.’
वालग्रेव एंड वान एलिस्ट, 2006, ‘The contingency effect of the mass media’s agenda setting’, Journal of Communication, 56(1), pp. 88-109′
डेयरिंग एंड रोजर्स, 1996, Agenda Setting Thousand Oaks, CS: Sage

(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से सोशल मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )

3/29/2016

न्यूज़ ब्रेक करता है सोशल मीडिया

किसी भी घटना की पहली रिपोर्ट जो पुलिस दर्ज करती है, वह एफआईआर यानी फस्र्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट कहलाती है। इस रिपोर्ट में किसी भी घटना की बारीक जानकारी होती है, जो प्रभावित व्यक्ति दर्ज कराता है। उसी तरह वर्तमान समय में सोशल मीडिया तमाम मुख्यधारा की मीडिया के लिए एफआईआर का काम करती है और आज फेसबुक के पोस्ट, स्टेट्स और ट्विटर की ट्वीट से खबरें ब्रेक होने लगी है और बनने लगी है। पहली खबर सोशल मीडिया में फ्लैश होते ही उसे लेकर रिपोर्टर रिसर्च करता है, छानबीन करता है, संबद्ध लोगों से बातचीत करता है और फिर पुख्ता खबर अखबारों में जहां प्रकाशित होता है, वहीं न्यूज चैनलों पर प्रसारित होता है।
त्रासदियों को करें याद
याद करें उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी को, या फिर नेपाल और बिहार में आए भूकंप को, तमाम अखबार और न्यूज चैनलों ने खबरें जानने और प्रसारण करने के लिए इन्हीं सोशल मीडिया का सहारा लिया। यहां तक कि मीडिया के इन माध्यमों में जो तस्वीरें या वीडियो दिखाए गए, वे इन्हीं सोशल मीडिया से लिए गए थे। अब तो प्रधानमंत्रियों सहित केंद्र सरकार के तमाम मंत्री प्रेस कांफ्रेस करना तक भूल गए हैं और वे लोगों को तमाम जानकारी सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म के जरिए दे रहे हैं। गौरतलब है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विदेशी प्रवास पर किसी मीडियाकर्मी को नहीं ले जाते लेकिन उनके फेसबुक और ट्विटर एकाउंट पर दी गई जानकारी और फोटो सुर्खियां बनती हैं।
नोकझोंक बनती हैं सुर्खियां
यह सिर्फ केंद्र सरकार की कार्य पद्धति नहीं है बल्कि राज्यों में पक्ष और विपक्षी नेताओं की नोकझोंक भी इन्हीं सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर चलती रहती है। यहां तक कि किसी खिलाड़ी के मैच या पदक जीतने पर तमाम नेता सोशल मीडिया के माध्यमों से बधाई देते हैं और वे तमाम मीडिया में सुर्खियां पाती हैं। किसी फिल्म का फस्र्ट लुक भी अब इन्हीं सोशल मीडिया में पहली बार आता है। फिल्म अभिनेता और निर्माता अपनी फिल्मी का प्रचार-प्रसार के लिए इन्हीं माध्यमों का सहारा लेते हैं। इसके अलावा, अपनी व्यक्तिगत जानकारियां और तस्वीरें भी यहां पोस्ट करते हैं। इतना ही नहीं, किसी अखबार में उनके बारे में या फिर कोई और जानकारी प्रकाशित होने पर वे विरोध भी दर्ज कराते हैं। मसलन दीपिका पादुकोण और उनके अंगों को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबरों को लेकर दीपिका पादुकोण ने कैसी प्रतिक्रिया जाहिर की थी और सोशल मीडिया पर कैसी लताड़ लगाई थी, यह किसी से छुपी हुई नहीं थी। वहीं, दीपिका की फिल्म ‘माई च्वाइस’ का यूट्यूब पर प्रसारण और फिर इसके बाद सामाजिक परिदृश्य में पक्ष और विपक्ष में बहस ज्यादा पुरानी नहीं है।
(पूरा आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें http://www.newswriters.in/2016/03/29/breaking-news-on-social-media/)

2/07/2016

संचार के पारंपरिक दुर्ग में सेंध

सोशल मीडिया/ विनीत उत्पल

सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है,जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैंबल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहींइसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्कसंवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़नेउत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
साझी चेतना पैदा करता है सोशल मीडिया
न्यूयार्क विश्वविद्यालय में न्यू मीडिया के प्रोफेसर क्ले शर्की का मत है कि सोशल मीडिया की सबसे बड़ी क्रांति शक्ति यह यह है कि यह जनता के यथार्थ और निजी जिंदगी में साझी चेतना पैदा करता है। स्टेट के पास निगरानी के चाहे कितने भी संवेदनशील उपकरण हों लेकिन अब राज्य का सामान्य नागरिक भी अपने संसाधनों का प्रयोग स्टेट के विरुद्ध कर सकता है। वहींजेसन एबट ने अपने शोधपत्र में यह स्थापित किया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट और नवीन तकनीकी कम्युनिकेशन का केवल नया रूप मात्र नहीं है अपितु एक्टिविस्टनागरिकों और सामाजिक आंदोलनों को जन-जन तक पहुंचाने का अद्भुत अवसर उपलब्ध कराता है।
अब प्रेस कांफ्रेंस से दूरी
इस माध्यम का सकारात्मक पहलू यह है कि अब भारत जैसे देश में प्रधानमंत्री सहित तमाम केंद्रीय नेता या अफसर मीडिया को संबोधित करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस न कर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। चुनाव लड़ने में और अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कहने में ये माध्यम काम आते हैं। पार्टी जनता से पूछती है कि सरकार बनाए या नहीं। सोशल मीडिया की ताकत का ही परिणाम है कि विश्वभर में राजनीतिक नसीब लिखने के लिए इसका सहारा लिया जाता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार प्रजातंत्र की परिभाषा जमीन पर दिखाई दी क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने बहुतम ने मिलने पर कांग्रेस का समर्थन को स्वीकार करने के लिए जनता के निर्णय को जानने के लिए सोशल मीडियाइंटरनेट और एसएमएस का सहारा लिया तो सोशल मीडिया का लोकतंत्र में अनोखा प्रयोग था। हालांकि इसके कई नकारात्मक पहलू भी हैंमसलन प्राइवेसी। या फिर किसी के खिलाफ प्रोपेगैंड फैलाना या फिर गलत सूचनाओं का प्रसार। कुछ लोग इसका बेजा फायदा भी उठाते हैं।
हर हाथ में मीडिया
इंटरनेट की यह सुविधा कंप्यूटरलैपटॉपस्मार्टफोन में से किसी भी उपकरण के जरिए ली जा सकती है। जीमेलयाहूरेडिफ जैसी परंपरागत ई-मेल सुविधा प्रदाता वेबसाइटों के साथ-साथ इस नेटवर्किंग में बड़ी भूमिका फेसबुकट्विटरमाई स्पेस जैसी साइटों की हैजिन्हें सोशल नेटवर्किंग साइट कहा जाता है। यूजर इन प्लेटफार्म पर अपना प्रोफाइल बनाकर अपने मित्रों और संबंधियों से संपर्क कर सकता है और नए लोगों से परिचय भी कर सकता है।
सिर्फ सोलह साल में बदला संचार
सोशल मीडिया के आने की क्रांति महज एक-डेढ़ दशक पुरानी है। सारा मामला 2000 के बाद यानी इक्कीसवीं सदी का है। शुरुआती सोशल नेटवर्किंग साइट फ्रेंडस्टर 2002 में आई थी और ट्राइब 2003 में शुरू हुई। लिंक्डइन और माइस्पेस 2003 में आई और माइस्पेस इस लिहाज से सफल पहल कहा जा सकता है। फेसबुक की शुरुआत फरवरी 2004 में हुई और इसने क्रांति कर दी। जुलाई 2010 में इसके पंजीकृत यूजर 50 करोड़ हो गए। जीमेल ने बहुप्रचारित गूगल बज’ सेवा फरवरी  2010 में शुरू हुई जबकि निंग भी 2004 से काम कर रही है। हालांकि सोशल मीडिया का असली खेल 2005 से शुरू हुआ और वर्ष 2008आते-आते अमेरिका में 35 फीसदी वयस्क इंटरनेट यूजर किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी प्रोफाइल बना ली और 18-24 साल आयुवर्ग में तो यह आंकड़ा 75 फीसदी तक पहुंच गया। ट्विटर ने अपने शुरुआती पांच साल में ही बीस करोड़ से अधिक यूजर को जोड़ा।
सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों
सोशल मीडिया जिस तरह युवाओं को खासकर लुभा रहा हैऐसे में जाहिर सी बातें हैं कि उसका एक ओर सदुपयोग हो रह है तो दूसरी ओर उसका दुरुपयोग भी। आज सिर्फ अपने नेटवर्क को स्थापित करने के लिए लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे बल्कि अपनी बातों को रखनेसमर्थन या प्रतिरोध के तौर पर भी कर रहे हैं। इसके जरिए लेखन का विस्तार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पाठकों की प्रतिक्रिया भी सामने आती है और पक्ष या विपक्ष के विचार भी सामने आते हैं। वहींअपनी बात कहने के लिए ना तो किसी धन या संसाधन की जरूरत हैन ही स्थापित एवं औपचारिक मीडिया संस्थानों की चिरौरी करने की। किसी भी द्वंदात्मक प्रजातंत्र में मुद्दे पहचाननाउन पर जन-मानस को शिक्षित करना और इस प्रक्रिया से उभरे जन-भावना के मार्फत सिस्टम पर दबाव डालना प्रजातंत्र की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है।
संवाद का नया विकल्प
एक ओर जब मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता हर रोज कटघरे में खड़ी होती हैवैसी परिस्थिति में सोशल मीडिया आम जनमानस के लिए संवाद के नए विकल्प के तौर पर सामने आया है। यही कारण है कि न सिर्फ नेता बल्कि अब तो अभिनेता भी अपनी खुद की जानकारीअपनी फिल्मों की जानकारी भी सोशल मीडिया के माध्यम से देने लगे हैं। फिल्म के टीजर से लेकर फस्र्ट लुक तक पहले सोशल मीडिया में आते हैं,बाद में संचार के दूसरे माध्यमों में प्रकाशित और प्रसारित होते हैं।
अनगिनत सूचनाओं का प्रवाह
अब तो लोग अपने जन्मदिन से लेकर मृत्यु और यहां तक की शादी की जानकारी भी इन्हीं सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराते हैं। यह जानकारी सिर्फ आमलोग ही नहीं देते बल्कि समाज में एक मुकाम हासिल करने वाले लोग भी देते हैं। मसलन पिछले दिनों मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की शादी अमृता राय के साथ होने के बाद अमृता राय ने अपने फेसबुक एकाउंट के जरिए इस बात की जानकारी दी। उन्होंने अपने पोस्ट में साफ-साफ लिखा कि हिंदू रीति-रिवाजों के साथ दिग्विजय सिंह से शादी कर ली। इतना ही नहींसोशल मीडिया के जरिए उन्होंने अपने आलोचकों को भी लताड़ा और कहा कि जिन्हें प्यार के बारे में कुछ पता नहीं उन्होंने सोशल मीडिया पर मुझे शर्मशार करने का प्रयास किया। लेकिन मैं चुप रही पर और मैंने खुद पर और अपने प्यार पर भरोसा बनाए रखा। वहींजब एम्स में पढ़ाई कर रही खुशबू ने रैगिंग से परेशान होकर खुदकुशी कर ली तो पुलिस ने उसके फेसबुक एकाउंट से लेकर व्हाट्सअप स्टेटस तक की जानकारी हासिल की और पता चला कि उसने कुछ ही दिन पहले लिखा था जिंदगी कई परेशानी दिखाती है लेकिन मौत उसका हल नहीं।
हैकर्स से परेशानी
दूसरी ओर इस मीडिया के नकारात्मक पहलू भी हैं और इसके जरिए जहां एक ओर माना जाता है कि यह समय की बर्बादी करता हैवहीं भले ही यह सोशल मीडिया हो लेकिन यह बगल में बैठे लोगों से आपको दूर भी करता है। वहीं हैकर्स के कारनामों के कारण आम आदमी के साथ-साथ महानायक तक भी परेशान रहते हैं। बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन ने उन अभद्रअश्लील एसएमएस के बारे में मुंबई पुलिस से शिकायत दर्ज कराई थी,जो उन्हें पिछले वर्ष से भेजे जा रहे हैं। 72 वर्षीय अभिनेता ने जुहू पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को संबोधित पत्र में मामले की जांच करने और दोषियों पर कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। इससे पहले उन्होंने कहा था कि उनका ट्विटर एकाउंट हैक हो गया है और कुछ लोगों ने मुझे फॉलो करने वाले लोगों की सूची में अश्लील साइटें डाल दी हैं। जिसने भी यह किया हैमैं उसे बता देना चाहता हूं कि मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है।
जाहिर सी बात है कि सोशल मीडिया के पक्ष में और विपक्ष में कई बातें हैं जो रोज घट रही हैं। उनके फायदे हैं तो नुकसान भी हैं।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )
courtesy: http://uoujournalism.blogspot.in/2016/02/blog-post_57.html

2/06/2016

What is Internet Troll?

In Internet slang, a troll (/ˈtrl//ˈtrɒl/) is a person who sows discord on the Internet by starting arguments or upsetting people, by posting inflammatory,[1] extraneous, or off-topic messages in an online community (such as a newsgroup, forum, chat room, or blog) with the deliberate intent of provoking readers into an emotional response[2] or of otherwise disrupting normal on-topic discussion,[3] often for their own amusement.
This sense of the word "troll" and its associated verb trolling are associated with Internet discourse, but have been used more widely. Media attention in recent years has equated trolling with online harassment. For example, mass media has used troll to describe "a person who defaces Internet tribute sites with the aim of causing grief to families."[4][5] In addition, depictions of trolling have been included in popular fictional works such as the HBO television program The Newsroom, in which a main character encounters harassing individuals online and tries to infiltrate their circles by posting negative sexual comments himself.[6][7]
Application of the term troll is subjective. Some readers may characterize a post as trolling, while others may regard the same post as a legitimate contribution to the discussion, even if controversial. Like any pejorative term, it can be used as an ad hominem attack, suggesting a negative motivation.
As noted in an OS News article titled "Why People Troll and How to Stop Them" (January 25, 2012), "The traditional definition of trolling includes intent. That is, trolls purposely disrupt forums. This definition is too narrow. Whether someone intends to disrupt a thread or not, the results are the same if they do."[8][9] Others have addressed the same issue, e.g., Claire Hardaker, in her Ph.D. thesis[9] "Trolling in asynchronous computer-mediated communication: From user discussions to academic definitions",[10] and Dr. Phil.[citation needed] Popular recognition of the existence (and prevalence) of non-deliberate, "accidental trolls", has been documented widely, in sources as diverse as Nicole Sullivan's keynote speech at the 2012 Fluent Conference, titled "Don't Feed the Trolls"[11] Gizmodo,[12] online opinions on the subject written by Silicon Valley executives[13] and comics.[14]
Regardless of the circumstances, controversial posts may attract a particularly strong response from those unfamiliar with the robust dialogue found in some online, rather than physical, communities. Experienced participants in online forums know that the most effective way to discourage a troll is usually to ignore it,[citation needed] because responding tends to encourage trolls to continue disruptive posts – hence the often-seen warning: "Please do not feed the trolls".
The "trollface" is an image occasionally used to indicate trolling in Internet culture.[15][16][17]
At times, the word can be abused to refer to anyone with controversial opinions they disagree with.[18] Such usages goes against the ordinary meaning of troll in multiple ways. Most importantly, trolls don't actually believe the controversial views they claim. Farhad Manjoo criticises this view, noting that if the person really is trolling, they are a lot more intelligent than their critics would believe.[18]
Online trolls launch a personal attack on the author by following some of these steps: Call the author names, make fun of the author’s appearance, attempt to correct the author’s already correct grammar, accuse the author of nefarious motives, such as attention-seeking. Claim any studies are biased, especially when they’re comprehensive meta-analysis of every rigorous study ever done (designed to correct for bias), insult the author’s family for good measure.

Origin and etymology

There are competing theories of where and when troll was first used in Internet slang, with numerous unattested accounts of BBS and UseNet origins in the early 1980s or before.
The English noun troll in the standard sense of ugly dwarf or giant dates to 1610 and comes from the Old Norse word troll meaning giant or demon.[19] The word evokes the trolls of Scandinavian folklore and children's tales: antisocial, quarrelsome and slow-witted creatures which make life difficult for travellers.[20][21]
In modern English usage, trolling may describe the fishing technique of slowly dragging a lure or baited hook from a moving boat[22] whereas trawling describes the generally commercial act of dragging a fishing net. Early non-Internet slang use of trolling can be found in the military: by 1972 the term trolling for MiGs was documented in use by US Navy pilots in Vietnam. It referred to use of "...decoys, with the mission of drawing...fire away..."[23]
The contemporary use of the term is alleged to have appeared on the Internet in the late 1980s,[24] but the earliest known attestation according to the Oxford English Dictionary is in 1992.[25]
Another claim sets the origin in Usenet in the early 1990s as in the phrase "trolling for newbies", as used in alt.folklore.urban (AFU).[26][27] Commonly, what is meant is a relatively gentle inside joke by veteran users, presenting questions or topics that had been so overdone that only a new user would respond to them earnestly. For example, a veteran of the group might make a post on the common misconception that glass flows over time. Long-time readers would both recognize the poster's name and know that the topic had been discussed a lot, but new subscribers to the group would not realize, and would thus respond. These types of trolls served as a practice to identify group insiders. This definition of trolling, considerably narrower than the modern understanding of the term, was considered a positive contribution.[26][28] One of the most notorious AFU trollers, David Mikkelson,[26] went on to create the urban folklore website Snopes.com.
By the late 1990s, alt.folklore.urban had such heavy traffic and participation that trolling of this sort was frowned upon. Others expanded the term to include the practice of playing a seriously misinformed or deluded user, even in newsgroups where one was not a regular; these were often attempts at humor rather than provocation. In such contexts, the noun troll usually referred to an act of trolling—or to the resulting discussion—rather than to the author.
Early incidents of trolling[30] were considered to be the same as flaming, but this has changed with modern usage by the news media to refer to the creation of any content that targets another person.[31] The Internet dictionary NetLingo suggests there are four grades of trolling: playtime trolling, tactical trolling, strategic trolling, and domination trolling.[32] The relationship between trolling and flaming was observed in open-access forums in California, on a series of modem-linked computers. CommuniTree was begun in 1978 but was closed in 1982 when accessed by high school teenagers, becoming a ground for trashing and abuse.[33] Some psychologists have suggested that flaming would be caused by deindividuation or decreased self-evaluation: the anonymity of online postings would lead to disinhibitionamongst individuals[34] Others have suggested that although flaming and trolling is often unpleasant, it may be a form of normative behavior that expresses the social identity of a certain user group[35][36] According to Tom Postmes, a professor of social and organisational psychology at the universities of Exeter, England, and Groningen, The Netherlands, and the author of Individuality and the Group, who has studied online behavior for 20 years, "Trolls aspire to violence, to the level of trouble they can cause in an environment. They want it to kick off. They want to promote antipathetic emotions of disgust and outrage, which morbidly gives them a sense of pleasure."[33]
The practice of trolling has been documented by a number of academics as early as the 1990s. This included Steven Johnson in 1997 in the book, Interface Culture, and Judith Donath in 1999. Donath's paper outlines the ambiguity of identity in a disembodied "virtual community" such as Usenet:
In the physical world there is an inherent unity to the self, for the body provides a compelling and convenient definition of identity. The norm is: one body, one identity ... The virtual world is different. It is composed of information rather than matter.[37]
Donath provides a concise overview of identity deception games which trade on the confusion between physical and epistemic community:
Trolling is a game about identity deception, albeit one that is played without the consent of most of the players. The troll attempts to pass as a legitimate participant, sharing the group's common interests and concerns; the newsgroups members, if they are cognizant of trolls and other identity deceptions, attempt to both distinguish real from trolling postings, and upon judging a poster a troll, make the offending poster leave the group. Their success at the former depends on how well they – and the troll – understand identity cues; their success at the latter depends on whether the troll's enjoyment is sufficiently diminished or outweighed by the costs imposed by the group.
Trolls can be costly in several ways. A troll can disrupt the discussion on a newsgroup, disseminate bad advice, and damage the feeling of trust in the newsgroup community. Furthermore, in a group that has become sensitized to trolling – where the rate of deception is high – many honestly naïve questions may be quickly rejected as trollings. This can be quite off-putting to the new user who upon venturing a first posting is immediately bombarded with angry accusations. Even if the accusation is unfounded, being branded a troll is quite damaging to one's online reputation.[37]
Susan Herring and colleagues in "Searching for Safety Online: Managing 'Trolling' in a Feminist Forum" point out the difficulty inherent in monitoring trolling and maintaining freedom of speech in online communities: "harassment often arises in spaces known for their freedom, lack of censure, and experimental nature".[38] Free speech may lead to tolerance of trolling behavior, complicating the members' efforts to maintain an open, yet supportive discussion area, especially for sensitive topics such as race, gender, and sexuality.[38]
In an effort to reduce uncivil behavior by increasing accountability, many web sites (e.g. ReutersFacebook, and Gizmodo) now require commenters to register their names and e-mail addresses.[39]

Corporate, political and special interest sponsored trolls

Investigative journalist Sharyl Attkisson is one of several in the media who has reported on the increasing trend for organizations to utilize trolls to manipulate public opinion as part and parcel of an Astroturfing initiative. Teams of sponsored trolls swarm a site to overwhelm any honest discourse and denigrate any who disagree with them.[40] A 2012 Pew Center on the States presentation on Effective Messaging included two examples of social media posts by a recently launched "rapid response team" dedicated to promoting fluoridation of community water supplies. That same presentation also emphasized changing the topic of conversation as a winning strategy. [41]
A 2016 study for the NATO Strategic Communications Centre of Excellence (NATO StratCom COE) on hybrid warfare notes that the Russian military intervention in Ukraine"demonstrated how fake identities and accounts were used to disseminate narratives through social media, blogs, and web commentaries in order to manipulate, harass, or deceive opponents."[42](p3) The NATO report describes that a "Wikipedia troll" uses a type of message design where a troll does not add "emotional value" to reliable "essentially true" information in re-posts, but presents it "in the wrong context, intending the audience to draw false conclusions." For example, information, without context, from Wikipediaabout the military history of the United States "becomes value-laden if it is posted in the comment section of an article criticizing Russia for its military actions and interests in Ukraine. The Wikipedia troll is 'tricky', because in terms of actual text, the information is true, but the way it is expressed gives it a completely different meaning to its readers."[42](p62) Unlike "classic trolls," Wikipedia trolls "have no emotional input, they just supply misinformation" and are one of "the most dangerous" as well as one of "the most effective trolling message designs."[42](pp70, 76) Even among people who are "emotionally immune to aggressive messages" and apolitical, "training in critical thinking" is needed, according to the NATO report, because "they have relatively blind trust in Wikipedia sources and are not able to filter information that comes from platforms they consider authoritative."[42](p72) While Russian-language hybrid trolls use the Wikipedia troll message design to promote anti-Western sentiment in comments, they "mostly attack aggressively to maintain emotional attachment to issues covered in articles."[42](p75) Discussions about topics, other than International sanctions during the Ukrainian crisis, "attracted very aggressive trolling" and became polarized according to the NATO report, which "suggests that in subjects in which there is little potential for re-educating audiences, emotional harm is considered more effective" for pro-Russian Latvian-language trolls.[42](p76)

Psychological characteristics

Two studies published in 2013 and 2014 have found that people who are identified as trolls tend to have dark personality traits and show signs of sadismantisocial behavior,psychopathy, and machiavellianism.[43][44] The 2013 study suggested that there are a number of similarities between anti-social and flame trolling activities[43] and the 2014 study suggested that the noxious personality characteristics known as the "dark triad of personality" should be investigated in the analysis of trolling, and concluded that trolling appears "to be an Internet manifestation of everyday sadism."[44] Their relevance is suggested by research linking these traits to bullying in both adolescents and adults. The 2014 study found that trolls operate as agents of chaos on the Internet, exploiting hot-button issues to make users appear overly emotional or foolish in some manner. If an unfortunate person falls into their trap, trolling intensifies for further, merciless amusement. This is why novice Internet users are routinely admonished, "Do not feed the trolls!" The 2013 study found that trolls often have a high expectation of what it means to be successful, which is higher than they are able to attain, and this results in them resenting others who think they are successful but who fall below their standards.

Concern troll

A concern troll is a false flag pseudonym created by a user whose actual point of view is opposed to the one that the troll claims to hold. The concern troll posts in Web forums devoted to its declared point of view and attempts to sway the group's actions or opinions while claiming to share their goals, but with professed "concerns". The goal is to sowfear, uncertainty and doubt within the group.[45]

An example of this occurred in 2006 when Tad Furtado, a staffer for then-Congressman Charles Bass (R-NH), was caught posing as a "concerned" supporter of Bass' opponent,Democrat Paul Hodes, on several liberal New Hampshire blogs, using the pseudonyms "IndieNH" or "IndyNH". "IndyNH" expressed concern that Democrats might just be wasting their time or money on Hodes, because Bass was unbeatable.[46][47] Hodes eventually won the election.
Although the term "concern troll" originated in discussions of online behavior, it now sees increasing use to describe similar behaviors that take place offline. For example, James Wolcott of Vanity Fair accused a conservative New York Daily News columnist of "concern troll" behavior in his efforts to downplay the Mark Foley scandal. Wolcott links what he calls concern trolls to what Saul Alinsky calls "Do-Nothings", giving a long quote from Alinsky on the Do-Nothings' method and effects:
These Do-Nothings profess a commitment to social change for ideals of justice, equality, and opportunity, and then abstain from and discourage all effective action for change. They are known by their brand, 'I agree with your ends but not your means'.[48]
The Hill published an op-ed piece by Markos Moulitsas of the liberal blog Daily Kos titled "Dems: Ignore 'Concern Trolls'". The concern trolls in question were not Internet participants but rather Republicans offering public advice and warnings to the Democrats. The author defines "concern trolling" as "offering a poisoned apple in the form of advice to political opponents that, if taken, would harm the recipient".[49]

Troll sites

While many webmasters and forum administrators consider trolls a scourge on their sites[according to whom?], some websites welcome them. For example, a New York Times article discussed troll activity at 4chan and at Encyclopedia Dramatica, which it described as "an online compendium of troll humor and troll lore".[24] This site and others are often used as a base to troll against sites that their members can not normally post on. These trolls feed off the reactions of their victims because "their agenda is to take delight in causing trouble".[50]

Media coverage and controversy

Mainstream media outlets have focused their attention on the willingness of some Internet users to go to extreme lengths to participate in organized psychological harassment.

Australia

In February 2010, the Australian government became involved after users defaced the Facebook tribute pages of murdered children Trinity Bates and Elliott Fletcher. Australian communications minister Stephen Conroy decried the attacks, committed mainly by 4chan users, as evidence of the need for greater Internet regulation, stating, "This argument that the Internet is some mystical creation that no laws should apply to, that is a recipe for anarchy and the wild west."[51] Facebook responded by strongly urging administrators to be aware of ways to ban users and remove inappropriate content from Facebook pages.[52] In 2012, the Daily Telegraph started a campaign to take action against "Twitter trolls", who abuse and threaten users. Several high-profile Australians including Charlotte DawsonRobbie FarahLaura Dundovic, and Ray Hadley have been victims of this phenomenon.[53][54][55]

United Kingdom

In the United Kingdom, contributions made to the Internet are covered by the Malicious Communications Act 1988 as well as Section 127 of the Communications Act 2003, under which jail sentences were, until 2015, limited to a maximum of six months.[56] In October 2014, the UK's Justice Secretary, Chris Grayling, said that "internet trolls" would face up to two years in jail, under measures in the Criminal Justice and Courts Bill that extend the maximum sentence and time limits for bringing prosecutions.[56][57] The House of Lords Select Committee on Communications had earlier recommended against creating a specific offence of trolling. Sending messages which are "grossly offensive or of an indecent, obscene or menacing character" is an offence whether they are received by the intended recipient or not.[58] Several people have been imprisoned in the UK for online harassment.[59]
Sean Duffy, who mocked the testimonial page of a dead teenager, was sentenced to eighteen weeks in prison and banned from using social networking sites for five years.[60]Trolls of the testimonial page of Georgia Varley faced no prosecution due to misunderstandings of the legal system in the wake of the term trolling being popularized.[61] In October 2012, a twenty-year-old man was jailed for twelve weeks for posting offensive jokes to a support group for friends and family of April Jones.[62] Later that month, The Register said there was a viewpoint that "the Crown Prosecution Service needs to reel in cops who are busily collaring trolls more or less at random ... usually responding to public pressure from media or social media".[63]

United States

On March 31, 2010, the Today Show ran a segment detailing the deaths of three separate adolescent girls and trolls' subsequent reactions to their deaths. Shortly after the suicide of high school student Alexis Pilkington, anonymous posters began performing organized psychological harassment across various message boards, referring to Pilkington as a "suicidal slut", and posting graphic images on her Facebook memorial page. The segment also included an exposé of a 2006 accident, in which an eighteen-year-old fatally crashed her father's car into a highway pylon; trolls emailed her grieving family the leaked pictures of her mutilated corpse.[5]
In August 2012, the subject of trolling was featured on the HBO television series The Newsroom. The character of Neal Sampat encounters harassing individuals online, particularly looking at 4chan, and he ends up choosing to post negative comments himself on an economics related forum. The attempt by the character to infiltrate trolls' inner circles attracted debate from media reviewers critiquing the series.[6][7]
The publication of the 2015 non-fiction book The Dark Net: Inside the Digital Underworld by Jamie Bartlett, a journalist and a representative of the British think tank Demos, attracted some attention for its depiction of misunderstood sections of the internet, describing interactions on encrypted sites such as those accessible with the software Tor. Detailing trolling-related groups and the harassment created by them, Bartlett advocated for greater awareness of them and monitoring of their activities. Professor Matthew Wisnioski wrote for The Washington Post that a "league of trolls, anarchists, perverts and drug dealers is at work building a digital world beyond the Silicon Valley offices where our era’s best and brightest have designed a Facebook-friendly" surface and agreed with Bartlett that the activities of trolls go back decades to the Usenet 'flame wars' of the 1990s and even earlier.[64]

India

Newslaundry covered the phenomena of "Twitter Trolling" in its Criticles.[65] It has also been characterizing twitter trolls in its weekly podcasts.[66]

Examples

As reported on April 8, 1999, investors became victims of trolling via an online financial discussion regarding PairGain, a telephone equipment company based in California. Trolls operating in the stock's Yahoo Finance chat room posted a fabricated Bloomberg News article stating that an Israeli telecom company could potentially acquire PairGain. As a result, PairGain's stock jumped by 31%. However, the stock promptly crashed after the reports were identified as false.[67]
So-called Gold Membership trolling originated in 2007 on 4chan boards, when users posted fake images claiming to offer upgraded 4chan account privileges; without a "Gold" account, one could not view certain content. This turned out to be a hoax designed to fool board members, especially newcomers. It was copied and became an Internet meme. In some cases, this type of troll has been used as a scam, most notably on Facebook, where fake Facebook Gold Account upgrade ads have proliferated in order to link users to dubious websites and other content.[68]
The case of Zeran v. America Online, Inc. resulted primarily from trolling. Six days after the Oklahoma City bombing, anonymous users posted advertisements for shirts celebrating the bombing on AOL message boards, claiming that the shirts could be obtained by contacting Mr. Kenneth Zeran. The posts listed Zeran's address and home phone number. Zeran was subsequently harassed.[67]
Anti-Scientology protests by Anonymous, commonly known as Project Chanology, are sometimes labeled as "trolling" by media such as Wired,[69] and the participants sometimes explicitly self-identify as "trolls".
Neo-Nazi website The Daily Stormer orchestrates what it calls a "Troll Army", and has encouraged trolling of Jewish MP Luciana Berger and a Muslim activist.[70]
courtesy: https://en.wikipedia.org/wiki/Internet_troll