सबके नजरिये अपने होते हैं,सबकी अपनी दुनिया होती है लेकिन क्या सोचते हैं और कैसे व्यवहार करते हैं, मायने रखता है इस दुनिया में.

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गुरुवार, १२ नवम्बर २००९

मज़दूर की चैंपियन बेटी कविता गोयत

दिहाड़ी पर मजदूरी करने वाले परिवार के सदस्य शायद ही कभी सोच सकते हैं कि उनके घर कि बेटी सोना उगलेगी। वह भी अपने मुक्कों के दम पर। वह भी अपने देश में नहीं सीमा पार वियतनाम में। वह भी तब जब उसकी टीम में चार बार कि विश्व चैम्पियन मेरी कॉम, एल। सरिता देवी और एन. उषा जैसी स्तर मुक्केबाज शामिल हों। हालांकि इन सपने जैसी बातों को हकीकत में लाने वाली लड़की है कविता गोयत।

पिछले दिनों वियतनाम में संपन्न तीसरी एशियन महिला इनडोर चैम्पियन में स्वर्ण पदक विजेता कविता मूल रूप से हरियाणा के हंसी ब्लाक के गांव सीसर खरबला की है। हिसार के कैमरी रोड स्थित मनोहर कालोनी वासी साई की बाक्सर कविता के इस मुकाम तक पहुंचने की कहानी ऐसी लड़की की है, जो अपने भाई की जिद के कारण अपने मुक्कों का लोहा पूरी दुनिया से मनवा सकी।

करीब पांच साल पहले तक वह अपने पिता के कामों में हाथ बटाती थी, वहीं घरों के कामकाज में मां के साथ सरीक होती थी। लेकिन एक दिन जब अपने भाई पवन के साथ हिसार के ‘साई सेंटर’ में गई तो उसके दिमाग के किसी कोने में बैठा फितूर जग गया। भाई को रिंग में मुक्केबाजी करते देख वह भी इस खेल की दीवानी हो गई।जिस घर का पूरा परिवार पिता आ॓मप्रकाश की दिहाड़ी पर चलता हो, वहां बेटी की जिद कैसे मान ली जाती। लेकिन जब हौसले बुलंद हों तो लक्ष्य पाने में कोई समस्या रूकावट नहीं बनती। यही कारण था की आखिरकार कविता को उसके पिता ने साई हॉस्टल भेज दिया। जहां कोच जसवंत और राज सिंह ने उसके हुनर को पहचान कर मुक्केबाजियों की बारीकियों से अवगत कराया।

उनकी मां सुमित्रा बताती हैं कि छोटा बेटा पवन बॉक्सिंग में कई पदक जीत चुका है। उसने कविता को बॉक्सिंग के रिंग में उतारने की जिद पकड़ रखी थी। वह पहले इस पक्ष में नहीं थी लेकिन धार्मिक गुरू राधास्वामी के परम शिष्य विमल प्रकाश की सलाह पर उसे इस खेल में महारत हासिल करने के लिए भेज दिया।अभावों और गरीबी में बचपन बिताने के लिए मजबूर रहने वाली कविता का विजयी अभियान 2003 से शुरू हुआ। पिछले साल उसने आगरा में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था। इस चैंपियनशिप में मेरी कॉम ने स्वर्ण, एल। सरिता देवी ने और एन। उषा ने रजत और छोटू लौरा ने कांस्य पदक जीता था।

अपने समय में कबड्डी के बेहतरीन खिलाड़ी रहे आ॓मप्रकाश की पुत्री कविता का जन्म 15 अगस्त, 1988 को हुआ है। उसने जाट कॉलेज, हिसार से स्नातक की डिग्री हासिल की है। हालांकि इन दिनों ट्रेनिंग में व्यस्त होने के कारण स्नातकोत्तर की डिग्री नहीं ले पा रही है। पिछले दिनों वियतनाम में 64 किलोग्राम भार वर्ग में अपनी प्रतिद्वंद्वी कजाकिस्तान की खासेनोवा सौदा को 8:4 से शिकस्त देने वाली कविता के कोच जसवंत सिंह का मानना है की वह रिंग में दिमाग से लड़ती है। उसकी इच्छा शक्ति जबरदस्त रूप से मजबूत है। यही कारण है कि उसने सही तरीके से अपनी ट्रेनिंग पर ध्यान दिया तो वह दिन दूर नहीं जब 2012 में पदक जीत कर देश का नाम रोशन कर सकती है।

रविवार, ८ नवम्बर २००९

पंकज सिंह की कविता संग्रह 'नहीं' की समीक्षा

नहीं से हां तक की संभावना

वर्तमान दौर की जद्दोजहद और भविष्य को एक नए आयाम देने या पहुंचाने के दिवास्वप्न के इर्द-गिर्द के शब्द ही पंकज सिंह की कविताओं का यथार्थ है। यथार्थ की द्वन्द्वात्मकता को कविता के रूप में ढाल कर व्यापक अनुभव के दायरे और मनुष्य की आकांक्षा और संभावना को सामने लाने का काम कविता संग्रह ‘नहीं’ के जरिए किया गया है। तभी तो कविता ‘वहीं से’ में वह कहते हैं, ‘कौन विश्वासघात करता है/ कौन चुप रह गया था पेशेवर जल्लाद की तरह सर्द/सीधी आंखों घूरता हुआ/कौन था पाश्चाताप को जाहिर न करता।’

पंकज सिंह की इन 61 कविताओं की दृष्टि संपन्नता और आशय इन्हें कोरे नकार की निष्फलता से बचाकर संवेदना की उस मनभूमि में ले जाते हैं जो ‘नहीं’ की पवित्र दृढ़ता से अनंत संभावनाओं की प्रक्रिया और उसकी सहज-अबाध परिणतियों के प्रकट होते जाने की आश्वस्ति देती है। ‘उन्हीं पुराने शब्दों को’ कविता की पंक्तियां हैं, ‘आखेटक की हिंसा में सिर्फ आखेट नहीं करता/समयता के बियाबान में आखेटक को भी/राख करती जाती है उसी हिंसा/कोई नहीं बताता कब तक/मुक्ति के विज्ञान में रक्ताभ/अकेले उपकरण सी निनाद करेगी/प्रतिहिंसा।’ अनुभव-अनुकूलित शिल्प का सुघड़पन से सुसज्जित कवितायें बेबाक होकर वर्तमान समय से साक्षात्कार कराने का माद्दा रखती हैं।

'हम वापस लौटते हैं जाने कहां से कहां/एक फरेब की चोट खाये दूसरे फरेब में/ठहरे काले पानी वाली दु:स्वप्न में/हम कहते हैं खुद में हमें पुरानी वेबकूफियों से बचना/आ गये हैं इसी तरह किस्त-दर-किस्त/खुद को निपटाकर।’

छल-प्रपंचों और दुनियादारी की वस्तुस्थिति को पाठकों के सामने रखती हुई कविता ‘देखते हुए छिली त्वचा को’ में बखूबी वे कहते हैं, ‘हम वापस लौटते हैं जाने कहां से कहां/एक फरेब की चोट खाये दूसरे फरेब में/ठहरे काले पानी वाली दु:स्वप्न में/हम कहते हैं खुद में हमें पुरानी वेबकूफियों से बचना/आ गये हैं इसी तरह किस्त-दर-किस्त/खुद को निपटाकर।’ और जब वे टीवी चैनलों के पत्रकारों को आत्मविहीन होकर खबरें परोसते देखते हैं तो कुछ यूं काव्य की पंक्तियां सामने आती हैं, ‘कालाहांडी अगरतला तरन-तारन मंचरियाल गये/हिंदी-अंग्रेजी के पत्रकार दनदनाते/खूब हुई लिखी-पढ़ी आवाजाही/राष्ट्रीय पुरस्कार सनसनीखेज समाचार तेज टीवी चैनल/तेज तेज हुआ हुआ हुआ/हुआं हुआं।’

पंकज सिंह बखूबी जानते हैं कि जिस लोकतंत्र में भिखमंगों का राजसी गीत गाया जाता है, वहां कपास और गेहूं उपजाने वाले किसान आत्महत्या करते हैं। वे जानते हैं कि यहां की स्त्रियां और बच्चे जमकर भूधराकार चक्की में पिस रहे हैं। वह यह भी जानते हैं कि किनके हाथ उस निर्मम चक्की को चलाते हैं। कविता संग्रह ‘नहीं’ की सभी कवितायें जीवंत अनुभव-राशि के अंतर्विरोधों और द्वन्द्वों में शासित विडम्बनाओं और कई प्रकार के सामूहिक बोध के समुच्चय हैं जो निजी आवेग-संवेग, प्रेम और आसक्ति, आघात-संघात और अवसाद-विषाद के व्यापक फलक के तौर पर सामने आए हैं। अधिकतर कवितायें अतीत की स्मृतियों और भविष्य की व्यापक संभावनाओं को बेहद सुंदर कोलाज है जिनके अनेक रंग इस तरह घुले-मिले हैं कि तर्क और विवेक की शक्लें अख्तियार कर सार्वजनिक संलाप का हिस्सा मालूम होती है।

नहीं (कविता संग्रह)

पंकज सिंह

मूल्य : 175 रूपए

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रा.लि। ए -बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002

आशा पांडे - फ्रांस का सर्वोच्च सम्मान

फ्रांस का सर्वोच्य नागरिक सम्मान ‘लिजन दि ऑनर’ से सम्मानित होने वाले सत्यजित राय, शिवाजी गणेशन, अमिताभ बच्चन, रविशंकर और आरके पचौरी कि लिस्ट में पहली बार किसी भारतीय महिला का नाम शुमार हुआ है। मूल रूप से कुमाऊं के अल्मोड़ा जनपद के पाटिया गांव की निवासी प्रो। आशा पांडे का जन्म देहरादून के क्लेमनटाउन में हुआ, जिन्हें इस साल फ्रांस सरकार इस सम्मान से सम्मानित कर रही है।

राजस्थान विश्वविघालय में प्राध्यापक आशा दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविघालय के फ्रैंच भाषा के पहले बैच की पोस्ट ग्रेजुएट हैं। उन्होंने जेएनयू से ही पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की है। प्रो। पांडे वर्तमान में राजस्थान विश्वविघालय जयपुर में ड्रामाटिक्स विभाग की अध्यक्ष व यूरोपियन स्टडीज विभाग में प्रोफेसर हैं। प्रो. पांडे को यह सम्मान भारत-फ्रांस रिश्तों को प्रगाढ़ करने तथा राजस्थान में फ्रैंच भाषा के प्रसार के लिए प्रदान किया जाएगा। 1973 बैच के आईएएस अफसर अशोक पांडे से शादी करने वाली आशा अक्सर अपने गृह प्रदेश और गृह नगर जाते रहती हैं।

1982 में डॉ. पांडे ने इंडो-फ्रैंच कल्चरल सोसायटी का गठन किया और फ्रैंच भाषा पढ़ानी शुरू की। पिछले 27 सालों से फ्रेंच के प्रचार-प्रसार में जुटी हुई हैं। उनके ही प्रयासों का फल है कि राजस्थान में करीब सात हजार छात्र यूरोपियन भाषाओं का अध्ययन कर रहे हैं। बताते हैं कि जयपुर में कुछ स्कूल और दस कालेज फ्रेंच से जुड़े विभिन्न कोर्स छात्र को उपलब्ध करा रहे हैं। इतना ही नहीं, राजस्थान विश्वविघालय भी छात्रों को पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स फ्रेंच में उपलब्ध कराया है।

डा। आशा पांडे का मानना है कि फ्रेंच भाषा सीखने से छात्रों को जहां रोजगार मिल रहा है, वहीं फ्रांस कि संस्कृति से रूबरू होने पर उनके व्यक्तित्व में निखार आता है, जिससे जीवन को नई दिशा मिलती है। यही कारण है कि यहां पढ़ाई करने वाले छात्रों को विभिन्न वर्कशापों के साथ फ्रेंच थियेटर और गोष्ठी में शामिल किया जाता है। आशा बतातीं हैं कि कुछ महीने पहले फ्रांस दूतावास के अधिकारी उनसे बायोडाटा मांगा था लेकिन उन्हें इस बात का तनिक भी भान नही था कि उन्हें इस सम्मान से नवाज जाएगा।

जब उन्हें सम्मान मिलने कि जानकारी मिली तो सबसे पहले अपने पति को इस बात कि जानकारी दी लेकिन दीवाली आ जाने के कारण और किसी को बता नहीं पाई। उनके पिता देहरादून के क्लेमनटाउन में भारतीय सेना की नेशनल डिफेंस अकादमी में थे। जब यह अकादमी पुणे खड़गवासला स्थानांतरित हो गई तो उनका परिवार भी खड़गवासला चला गया। डॉ. आशा की प्राथमिक शिक्षा वहीं के केंद्रीय विघालय में हुई।

मुद्दा आतंकवाद का

अमेरिका और भारत की विदेश नीति एक जैसी नहीं है लेकिन अमेरिका पर दबाव तो है ही। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वैश्विक आतंकवाद के मुद्दे पर विश्व के अधिकतर देश दबाव में हैं। कुछ हद तक यह दबाव महज दिखावा है। पाकिस्तान और भारत के मुद्दे पर अमेरिका दोनों को संतुष्ट कर रहा है।

विश्व आतंकवाद के मुद्दे पर सभी देश अलग-अलग दिख रहे हैं और सबकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं। जहां तक भारत और पाकिस्तान की बात है, अमीर सईद को ट्रायल पर नहीं लिया जा रहा है। हर कोई जानता है कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है। उसके खिलाफ यदि चार्ज लाया भी गया तो उसे सबूतों के अभावों में बरी कर दिया जाए गा। इस कारण पाकिस्तान को उसके खिलाफ कोई भी कार्रवाई करने में नहीं बन रहा है।

आतंक के मुद्दे पर हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। खुद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी, अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा। जब आतंकवाद के मुद्दे पर हम दूसरे देशों की सहायता करेंगे तभी कोई हमारे कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए आगे आएगा .

आतंकवाद के मुद्दे पर अमेरिका चाहता है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा सेना का साथ मिले। वह यह भी चाहता है कि एक ओर जहां पाक सेना तालिबान के खिलाफ अपनी जमीन पर लडाई लड़े वहीं अफगानिस्तान की ओर से अमेरिकी सेना दवाब बनाए । लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। अफगानिस्तान मामले में अमेरिका भारत से सैन्य सहायता चाहता है जिसे वह नहीं दे रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं। कोई भी देश किसी भी देश के लिए खासकर आतंकवाद के मुद्दे पर सामने नही आना चाहता।

अमेरिका में जब 9/11 की घटना हुई थी तब क्या भारत उसके साथ आया था, नहीं न। तो फिर मुंबई कांड सहित और आतंकवादी घटनाओं के बाद वह आपके साथ हो,यह कैसे हो सकता है। कई बार हाफिज सईद के खिलाफ यूए न में उस पर कार्रवाई करने का मामला सामने आया लेकिन चीन और रूस इसके खिलाफ खड़े थे। इस मामले पर वीटो लगाने की धमकी भी दे रहे थे। हालांकि बाद में सभी एकजुट भी हुए । दूसरे देश के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर कैसे कोई हमारा साथ देगा, जब हम किसी की कोई सहायता नही करेंगे। हम अपेक्षा करते हैं कि आतंकवाद के मुद्दे पर दूसरे देश हमें सहायता करें लेकिन हमने किसकी सहायता की, जो हमारा कोई करेगा। अल-कायदा और तालिबान को खत्म करने के मामले में अमेरिका की किसी ने सहायता नहीं की। सिर्फ नेटो ही उसके समर्थन में सामने आया। अफगानिस्तान में उसके साथ कोई यूरोपियन देश भी शामिल नहीं है। अमेरिका चाहता है कि वहां भारत अपनी फौज भेजे लेकिन हम वहां फौज नहीं भेज रहें है क्योंकि हमारा वहा कोई इंटरेस्ट नहीं है। तालिबान के खात्मे से हमारा फायदा तो है, बावजूद इसके लिए मददगार नहीं बन रहे हैं।

यहां कहने को कुछ और करने की जब बारी आती है तो कुछ और किया जाता है। 9/11 के बाद हमने अमेरिका से कहा कि हम आपको सभी सहायता मुहैया करेंगे लेकिन कुछ नहीं किया गया। वह पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई तभी करेगा जब उसका उससे कोई मतलब निकलेगा। अमेरिका को लगता है कि लश्करे तैयबा अब ज्यादा ताकतवर हो गया है और अल-कायदा कमजोर हो रहा है। अगर लश्कर, अल-कायदा की तरह बन रहा है तो उनकी रणनीति या भूमिका क्या होगी, यह सोचने वाली बात है। यदि ये आतंकवादी संगठन अमेरिका और भारत पर आक्रमण कर सकते हैं तो क्या वे दूसरे यूरोपीय देशों पर भी हमले कर सकते हैं।

इन दिनों पाकिस्तान भी इस मामले पर काफी दवाब में है। वहां भी आतंकवादी हमले हो रहे हैं। ऐसे में कैसे भारत पर होने वाले आक्रमण को लेकर पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा सकता है। इसके लिए वहां हम सेना नहीं भेज सकते, डरा नहीं सकते। यदि पाक के भीतर इतनी संख्या में आतंकी हमले नहीं होते तो हम दबाव बना सकते थे। वहां की पूरी सेना तालिबान से निबटने में लगी है। बहरहाल, आतंक के मुद्दे पर हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। खुद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी होगी, अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा। जब आतंकवाद के मुद्दे पर हम दूसरे देशों की सहायता करेंगे तभी कोई हमारे कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए आगे आएगा।

--अजय दर्शन बेहरा (विदेश मामलों के जानकार)

पलायन के पक्षधर अर्थशास्त्री :सीता प्रभु

भारत ही नहीं वरन पूरे विश्व के अधिकतर देशों में जिस कदर इंजीनियर, डॉक्टर सहित प्रबंधन विशेषज्ञ पलायन कर रहे हैं, वास्तव में चिंता की बात है। ऐसे में, यूए नडीपी द्वारा जारी रिपोर्ट ने नई बहस खड़ी कर दी है। यही कारण है कि मानव विकास रिपोर्ट 2009 के जारी होने के बाद भारत स्थित असिस्टेंट कंट्री डायरेक्टर के। सीता प्रभु सुर्खियों में है।

करीब 307 मिलियन लोग ऐसे हैं जो अपने जन्मस्थान से कहीं दूर रह रहे हैं।

मुंबई विश्वविघालय में विकासशील अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली सीता प्रभु की रूचि शुरू से ही विकास के मुद्दे को लेकर रही है। भारत सहित विदेशों के विश्वविघालय में अतिथि प्रोफेसर वह रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, विभिन्न राज्य सरकार सहित कई स्वयंसेवी संस्थाओं में बतौर आर्थिक सलाहकार रही है। आधे दर्जन से अधिक पुस्तकों की लेखिका सीता रिपोर्ट को लेकर मानती हैं कि अधिकतर प्रोफेशनल्स को बेहतर मौका नहीं मिलता। इस कारण उनका पलायन करना लाजिमी है। वह बताती हैं कि भारत के विभिन्न राज्यों से दूसरे राज्यों में करीब 42 मिलियन लोग पलायन करने के लिए मजबूर हैं।

गौरतलब है कि करीब 307 मिलियन लोग ऐसे हैं जो अपने जन्मस्थान से कहीं दूर रह रहे हैं। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि 1950 से लेकर 2000 तक अमेरिकी विश्वविघालयों में विदेशी छात्रों की संख्या में 1।3 फीसद का इजाफा हुआ है।मुंबई विश्वविघालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर करने वाली सीता मृदुभाषी होने के कारण सहज ही आसपास के लोगों को आकर्षित कर लेती हैं। अर्थशास्त्र में ही पीए चडी करने वाली यह अर्थशास्त्री न सिर्फ यूए नडीपी में असिस्टेंट कंट्री डायरेक्टर है बल्कि वरिष्ठ सलाहकार भी हैं। वह राष्ट्रीय महिला आयोग से जुड़ी रही हैं और मानती हैं कि आम आदमी के विकास और उसकी रूपरेखा तय करने में यूए नडीपी द्वारा जारी होने वाली मानव विकास रिपोर्ट काफी अहम भूमिका निभाती है। यही कारण है कि यह रिपोर्ट हमेशा ही नीति-निर्धारकों को विचार करने के लिए मजबूर करता है।

2009 में मानव विकास रिपोर्ट को लेकर वह बताती है कि पलायन से सकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है। जाहिर सी बात है कि जहां प्रोफेशनल्स के पलायन से उन इलाकों को फायदा तो होता ही है जहां वे काम करने के लिए जाते हैं। वर्तमान दौर में के सीता प्रभु समाज के उन लड़कियों और महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण के तौर पर उभरी हैं, जो समाज को नई दिशा देने का काम करती हैं। जहां अधिकतर बैंकिंग, प्रबंधन सहित विदेश सेवा प्रमुख के तौर पर सामान्य महिला पदों को सुशोभित कर देश, दुनिया और समाज को नई दिशा दे रही है, वहीं प्रोफेशनल्स के पलायन और प्रवासियों को लेकर रिपोर्ट जारी कर इस महिला अर्थशास्त्री ने बहस के एक नए मुद्दे को जन्म दिया है।

बुधवार, २८ अक्तूबर २००९

उत्तर आधुनिकता और जातीय अस्मिता

उत्तर आधुनिकतावाद एक ऐसा ग्लोबल खेल है, जिसमें हम सब शरीक है। वह हमारी ही भूमंडलीय अवस्था का रामायण है। मीडिया माध्यमों ने ‘यथार्थ’ के साथ हमारे रिश्ते को इस कदर बदल दिया है कि हमारी इंद्रियां अब यथार्थ को सीधे-सीधे ग्रहण नहीं करतीं। सूचना क्रांति ने हमारे ‘बोध’ में ऐसा उलट-पलट किया है कि हमें पता ही नहीं है कि हम कब स्थानीय है, कब भूमंडलीय। हम एक ऐसी चुनौतीभरी विचारधारा की दुनिया में जी रहे हैं जिसमें समस्त मानवीय चिंतन, साहित्य, व्यवस्था, विचारधारा, धर्म, दर्शन, इतिहास, आंदोलन, प्रवृत्तिवाद, सभ्यता, संस्कृति, मूल्य व्यवस्था सभी को ‘उत्तर’, ‘पोस्ट’ व्यतीत घोषित कर दिया है।
कृष्णदत्त पालीवाल ने अपनी पुस्तक ‘उत्तर आधुनिकतावाद और दलित विमर्श’ के जरिए विमर्श, दलित चिंतन और प्रगति के फल पर गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श किया है। पिछले तीन दशकों में उत्तर-आधुनिकतावादी नव चिंतन का जो पूरा बिंब उभरता है, उसमें वैचारिक कलह बहुत है। उत्तर-आधुनिकतावाद के मूल तत्व में बहुलतावाद तथा बहु-संस्कृतिवाद, विकेंद्रीयता, क्षेत्रीयता, लोकप्रिय संस्कृति, परा-भौतिकवाद पर अविश्वास, नारीवाद, दलित आंदोलन, महान आख्यानों का अंत, विचारधाराओं का अंत, शाश्वत साहित्य सिद्धांतों का पतन, विरचनावाद कर्त्ता का अंत समाहित है। बहुराष्ट्रीय निगमों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मांग के अनुकूल पूरी शिक्षा व्यवस्था को ढाला जा रहा है, बदला जा रहा है।
पालीवाल वर्तमान परिदृश्य पर चिंता जाहिर करते हुए कहते हैं कि यह ‘मैनेजमेंट युग’ का ही प्रभाव है कि साहित्य-कला, दर्शन, इतिहास और समाजशास्त्र की कद एकदम कम हो गई है। ‘लेखक’ का अंत हो गया है। ‘विचार’ का अंत हो गया है। ‘मूल्यों’ पर आधारित पूरी समाज-व्यवस्था का अंत हो गया है। पुरानी ईस्ट इंडिया कंपनी का यह नया आधुनिकीकरण है, जिसमें तकनीकी क्रांति की विजय यात्रा है। आलोचना का दायित्व है कि देश और काल में निरंतर बदलते हुए मनुष्य और संदर्भ को परिभाषित करे। नया दलित-विमर्श समतामूलक, शोषण मुक्त, आत्मसम्मानपूर्ण और छुआछूत रहित समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देता है। लोक जागरण के नाम पर नए किस्म के अंधकार युग को लेकर उनका मानना है कि इसमें न तुलसी के लिए स्थान है, न कबीर के लिए , न गांधी-अंबेडकर के लिए । दलित-साहित्य-विमर्श आज के साहित्य की यह राजनीति है, जिसमें धर्मवीरों की गुर्राहट है और नामवरों की लिए मुश्किल।
पालीवाल पुस्तक के जरिए सवाल करते हैं कि दलित साहित्य और गैर दलित साहित्य, अगड़ी जातियों द्वारा रचा गया वर्चस्ववादी साहित्य और पिछड़ी जातियों द्वारा सृजित पीड़ा-यातना का साहित्य जैसे विभाजन को मानने और मनवाने के प्रयास के पीछे दलित साहित्य की राजनीति का ‘हिडन एजेंडा’ क्या है? दलित साहित्य की राजनीति करने वालों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि कई मुद्राओं में यह प्रश्न पूछा जाता है कि क्या दलित साहित्य केवल दलित ही लिख सकते हैं-अन्य गैर दलित क्यों नहीं? यहां ‘केवल’ पर विवाद है, भोगे हुए यथार्थ की प्रामाणिक अनुभूति और अनुभूति की ईमानदारी पर नहीं।
पुस्तक की भूमिका ‘विखंडन का विखंडन’ में कृष्णदत्त पालीवाल अपनी बात रखते हैं। उनका मानना काफी हद तक सही है कि हम एक ऐसा चुनौती भरे समय में जीवित हैं, जिसमें सभ्यता, संस्कृति, धर्म, राजनीति, जातीय अस्मिता की तलाश जैसी जटिल अवधारणाओं का प्रयोग जरूरत से ज्यादा हो रहा है। बहरहाल, उत्तर आधुनिक परिदृश्य में दलित साहित्य एक तरह से क्रांतिकारी विचार-प्रवाह की निष्पत्ति की है। पिछड़े, अति पिछड़े, वंचितों, उपेक्षितों और परिधि पर यातना भोगते विशाल जन-समाज को इस साहित्य ने शब्द और कर्म के समाजशास्त्र की आ॓र प्रवृत्त किया है।
साभार : राष्ट्रीय सहारा

सोमवार, १९ अक्तूबर २००९

कुत्ते या आदमी : एक कविता

कुत्ते या आदमी

कुछ लोग कुत्ते बना दिए जाते हैं
कुछ लोग कुत्ते बन जाते हैं
कुछ लोग कुत्ते पैदा होते हैं

कुत्ते बनने और बनाने का जो खेल है
काफी हमदर्दी और दया का है
क्योंकि न तो कुत्ते के पूंछ
सीधे होते हैं और न ही किए जा सकते हैं

आदमी थोड़ी देर पैर या हाथ मोड़कर
सोता है लेकिन थोड़ी देर बाद सीधा कर लेता है
लेकिन कुत्ते की पूंछ हमेशा टेढ़ी ही रहती है
न तो उसे दर्द होता है और न ही सीधा करने की उसकी इच्छा होती है

कुत्ता कुछ सूंघता है, लघुशंका करता है
और फिर वहां से नौ-दो-ग्यारह हो जाता है
लेकिन जो कुत्ते बना दिए जाते हैं
वह सूंघते तो हैं लेकिन करने लगते हैं चुगलखोरी और चमचागिरी
जो कुत्ते बन जाते हैं वे इसे इतर नहीं होते
उनके होते तो हैं दो हाथ व दो पैर
लेकिन दूसरों के जूठे, थूक-खखार व किए हुए उल्टी
चाटने में मजा आता है

हां, और जो लोग जन्मजात कुत्ते होते हैं
वे कुत्तेगिरी से बाहर नहीं निकल सकते
ऑफिस में नौकरी कम, बॉस के तलवे अधिक चाटते हैं
और रात होने पर बन जाते हैं महज एक नैपकीन।