7/22/2007

मीडिया की अबूझ पहेली

कितनी बातें सच हैं कितनी नहीं इसका आंकलन करना इतना आसान नहीं होता। जिस गंभीर पत्रकारिता की बात को लेकर बहस जारी है क्या इसकी जिम्मेदारी सिफॆ न्यूज चैनल की है। अधिकतर चैनलों में वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग क्या दूसरे ग्रहों से आए प्राणी हैं। यकीन मानिए इन लोगों में अधिकतर प्रिंट में काफी कलम घिसे हैं। सारा दोष
टीवी चैनलों को नहीं दिया जा सकता। क्या इस बात का कोई जवाब दे सकता है कि प्रिंट में फीचर नहीं छपती है। प्रिंट के पास पेज बढ़ाने का आप्शंस होता है। वे गंभीर समाचारों के लिए कुछ पेज निधारित कर सकते हैं। फीचर स्टोरी के लिए अलग से चार पेज शामिल किया जा सकता है। विशेष मौके पर पेज तुरंत बढ़ाया जा सकता है। बच्चों का कोना भी होता है। ज्योतिष और भूत-प्रेत के लिए भी जगह होता है। हां यह बात और है कि लोग न्यूज पेपर को संभालकर जुगाली कर पढ़ सकते हैं।
दूसरी तरफ टीवी न्यूज चैनलों की दुनिया कुछ और ही होती है। चौबिस घंटे के समय में ही उन्हें सारा कुछ दिखाना होता है। गंभीर समाचारों के लिए भी समय चाहिए। मनोरंजन के लिए भी समय चाहिए। सभी वगों द्वारा देखे जाने वाले समाचार चाहिए। फिर प्रिंट पत्रकारिता के इतने साल बीतने के बाद भी गलतियां हो रही है तो भारत में बमुश्किल से दस साल हुए टीवी मीडिया को दोष देने के पीछे इतना हायतौबा क्यों मचाया जा रहा है।
समय बदल रहा है। बदलने की काफी गुंजाइश है। अभी तो सारे मामले में प्रैक्टिकल हो रहा है। धीरज धरिए। कालांतर में सारी बातें समझ में आने लगेगी और हासिए से बाहर रह रहे लोगों की आवाजें दुनिया के हर कोने में सुनाई देगी। और फिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।

1 comment:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

समय बदल रहा है। बदलने की काफी गुंजाइश है। अभी तो सारे मामले में प्रैक्टिकल हो रहा है। धीरज धरिए। कालांतर में सारी बातें समझ में आने लगेगी और हासिए से बाहर रह रहे लोगों की आवाजें दुनिया के हर कोने में सुनाई देगी। और फिर बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।
aap ke es khyal se main bhi sahmat hun.
sayad nahi jaroor hi aur jald hi wah samaya aane wala hai,,
Girindra