9/09/2007

तुम न होते तो हम

अक्सर जिन्दगी की राहों में कुछ ऐसे मोड़ आते हैं जब किसी का साथ हौसला देता है। पुराने दर्द को भुलाने में मदद करता है। हमसाया ऐसा जो नए एहसास को पैदा कर जिन्दगी की विकट राहों पर चलना आसान कर देता है। जीवन की इस भुलभुलिया की नजाकत समझते हुये दिनेश कुछ यूं बयां करते हैं...

इतनी तन्हाईयाँ थी मर जाते
तुम न होते तो हम बिखर जाते

कोई अपना भी रास्ता तकता
शाम ढलते ही हम भी घर जाते

तू नए जख्म फिर भले देता
जो पुराने थे तो मर जाते

हैं अभी औरों के जैसे हो जाता
पर ये अहसास मेरे मर जाते

हम जहाँ से चले थे, लौट आये
और जाते भी तो किधर जाते.

2 comments:

सजीव सारथी said...

आपने कहा ये ग़ज़ल दिनेश ने लिखी है, क्या आप मुझे पूरा नाम बता सकते हैं गज़लकार का please

विनीत उत्पल said...

mere blog par aane ke liye dhanybad.gazalkar hain dinesh raghubanshee, jo faridabad me rahte hain.Manchee kavi hain.