1/30/2008

गांधी, तू आकर देख

गांधी, तू आकर देख

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश

पग-पग फैला भ्रष्टाचार
होता केवल यहाँ अत्याचार
नित्य यहाँ होता बलात्कार
जनता में मची हाहाकार

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

जनता है यहाँ भूखे-नंगे
नेता जमकर करते वायदे
यहाँ न कोई कानून-कायदे
सब सोचते अपने फायदे

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

यहाँ होते रोज घोटाले
राज करते बीवी साले
किसी के मन पर न होते ताले
दिन-रात खनकती शराब के प्याले

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

शाम ढलते सूनी होती गलियां
सड़क पर होते कुत्ते-बिल्लियाँ
नींद चुराती बंदूक की गोलियां
रोज बहती खून की नदियाँ

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

(यह कविता २६ जुलाई १९९९ को भागलपुर में रहने के दौरान लिखी गयी थी.)

मोहे अगले जनम... और गायिका ऋचा शर्मा


फिल्म बागबान में गायिका ऋचा शर्मा ने बेटी की विदाई गीत अपने सुरों में पिरोया है। गीत के सुर और बोल ऐसे कि हर कैसी की आँखों में आशू ला दे। यह वही ऋचा शर्मा हैं, जिसने पिछले दिनों रिलीज हुई गोल, आजा नच ले, savariya का टाइटल संग , ओऊम शांति ओऊम में गाना गया है। जल्द ही, उसकी आवाज राजकंवर की सदियाँ, बाबी देयोल की चमकू और श्याम बेनेगल की महादेव में सुनने को मिलेगी।

ऋचा को जानने और समझने का मौका फरीदाबाद में रहने के दौरान मिला। वह वहीं की रहने वाली है। आज दिल्ली वाले मोबाइल नम्बर के inbox से कुछ मैसेज hata रहा था। अचानक ऋचा शर्मा का मैसेज सामने आ गया। भले ही यह निजी मैसेज हो सकता है, इसमें कुछ कर गुजरने वालों की सादगी नजर आ रही है।

उनका मैसेज है...

हाय, विनीत मैं दिवाली ke
मौक़े
पर शहर में हूँ, जब फुरसत हो जाये तो कॉल करना।


गलती से आज मोबाइल से उन्हें कॉल चला गया। मुझे लगा खामखा उन्हें परेशां कर दिया. मैंने झट से कॉल कटा और और एक मैसेज भेज दिया. पर, थोडी देर में ऋचा जी का कॉल आ गया। आख़िर मैंने कॉल रिसीव किया.हाल-चाल जाना, तमाम तरह की बाते हुई और फिर अलविदा। जहाँ तक मैसेज की बात है, दिवाली के मौक़े पर मैं जयपुर में छोटी बहन के पास था। २००७ में दिवाली वहीं बीती थी। उसी दिन, जयपुर से ऋचा शर्मा से बात की थी। उस वक्त फिल्म सवारिया और ओऊम शांति ओऊम रिलीज होने वाली थे। काफी खुश थीं, कहा विनीत मेरे गाने जुरूर सुनना। काफी पसंद आयेगी।


यहाँ यह जानकारी देने का मकसद सिर्फ मेरा इतना था, कि एक बेटी क्या नही कर सकती। आपको बता दूँ ऋचा आठ बहनों में एक है। तीन भाई हैं उसके। मैंने उसका इंटरव्यू हिंदुस्तान में शख्सियत कालम के लिए लिया था। बाद में आत्मीयता होने के बाद फरीदाबाद में उसने आपने घर पर बुलाया था। पापा तो काफी पहले गुजर गए थे। अपने भैया के यहाँ थी। भैया और भाभी से मिलवाया और जो भैया मुम्बई में साथ रहते हैं, उनसे भी परिचय कराया था। जमकर नास्ता किया, एक दूसरे के बारे में और जाना।करियर में आगे बढ़ने की kamnaa हुई.

कभी सोचता हूँ, घर इतना बड़ा, मुम्बई इतना बड़ा, फिल्मी दुनिया इतनी बड़ी, एक लडकी ने कैसे संघर्ष किया होगा। फिर भी इस मुकाम पर पहुचने पर कोई घमंड नही। आज भी जब वो फरीदाबाद आती है तो सबसे उसी तरह मिलती है, जैसे कल मिली हो।

1/29/2008

...कमलेश्वर का निधन यानी दिल्ली के एक मौत

...कमलेश्वर का निधन यानी दिल्ली के एक मौत

फिर दिल्ली के पत्रकार मित्रों से बात कर उनके घर के फोन नम्बर ले कर कन्फर्म किया और राजूजी ने दिल्ली ऑफिस फोन कर खबर लिखाई। लेकिन राजूजी ने मुझे इत्तला कर दी कि तैयार रहना, हो सकता है कि देर रात या सुबह कमलेश्वरजी के घर इरोज गार्डन जाना पड़े।


रात में फिर मैंने अपने मित्र स्नेहा को फोन कर मामला जानना चाहा, लेकिन उसने कहा पापा यानी अशोक चक्रधर बाहर हैं, इस कारण मैं क्या सहायता कर सकती हूँ। फिर थोडी देर बाद स्नेहा का फोन आया, बताई, पापा तो ट्रेन में है, उन्हें भी पता नहीं है। उसे आश्वस्त करते हुवे मैंने कहा चिंता के बात नही है, रात काफी हो रही है, सुबह बात करते हैं।


सुबह आठ बजते ही राजूजी का फोन आ गया, कि तैयार हो जाओ, मैं आ रहा हूँ। फोटोग्राफ़र सुभाष शर्मा भी साथ जायेंगे। जल्दी से तैयार हो कर दफ्तर पंहुचा। फिर तीनो इरोज गार्डन की और चल पड़े। सुबह का समय। दिल्ली से कुछ समाचार चैनल के पत्रकार वाहन मौजूद थे। कुछ सहपाठी भी थे। दुआ सलाम होने के बाद खबर लेने में जुट गए।


पता चला, कमलेश्वरजी का शरीर उनके पहले तल पर स्थित उनके बैठक में रखा गया है, लेकिन किसी भी पत्रकार को नही जाने दिया जा रह है। कुछ पत्रकार नीचे खडे थे, तो कुछ दरवाजे पर दस्तक देकर निराश हो कर लौट जा रहे थे। तत्काल मेरे दिमाग ने कुछ सोचा और मैंने राजूजी से सवाल किया, भाई साहब, ऐसे काम नही चलने वाला है। रिपोर्टिंग तो करनी है। उन्होने कहा, क्या उपाय है। मुझे अन्दर का सीन देखा नही जाएगा।


भाई साहब, आप बाहर नजर रखिये, और मैं पत्रकार की भांति नही, बल्कि उनके चाहने वाले और बतौर पाठक घर में जाऊंगा। कमरे के अन्दर गया। कोने में खडे होकर चुपचाप सभी चीजें देखता रहा। आने वाले रोते तो दिल रोने लगता। खुद को सांत्वना देता। अंदर गौरीनाथ जी भी कुछ देर में आ गए। हिमांशु जोशी सहित और भी कई साहित्यकार आये। करीब पांच घंटे घर के अंदर रहा।


कमलेश्वरजी के दामाद आलोकजी और उनकी बेटी मानू भी कई घंटे बाद आयी। तब तक हिन्दू रीति रिवाज से उनके सिर की ओर धूप और कान्हा जी की मूर्ति रख्खी गयी थी। उनका कमरा अस्त-व्यस्त था।अन्दर का दृश्य २८ जनवरी,२००७ के हिंदुस्तान के स्पेशल पेज पर छपा था। करीब दो बजे उनकी अन्तिम यात्रा शुरू हुई। यहाँ तक ही मेरा साथ था उनका। राजूजी ने उनके यहाँ काम करने वाले रघुनाथ और उसके पिताजी से बात की थी। उनकी यादें एन सी आर पेज के सभी संस्करण में छपी थी।


करीब पांच घंटे कमरे के अन्दर रहने के बाद जब भूके- प्यासे दोनो आदमी खबर लिखने बैठे, दिमाग सुन्न हो रहा था। खबर लिखते कई बार तो पड़ा। सभी साथी सिर्फ हमारा मुँह देख रहे थे। कोई कुछ नही बोल रह था।
mujhe शख्सियत कालम भी लिखना था। संयोग वश फिल्म मैं हूँ ना में शाहरुख़ खान के साथ काम करने वाले कुनाल से बात हो गयी और उसने जहाँ अपनी तस्वीर मुझे ई-मेल तुरंत कर दिया, वहीं कालम से जूरी तमाम बातें तुरन बता डाली, जबकि वह फिल्म की शूटिंग में मुम्बई में व्यस्त था।


दूसरे दिन हिंदुस्तान में हमारी खबर बेहतरीन होने के कारण हमने और राजूजी ने रहत की साँस ली, लेकिन उन माहौल से उबरने में कई हफ्ते लग गए।
समाप्त

1/28/2008

मैंने जिस कमलेश्वर को जाना...



जामिया से मास मीडिया की डिग्री लेने, हिंदुस्तान टाईम्स और हिंदुस्तान में इन्टर्नशिप करने के बाद मैंने सेंटर फार पीस एंड कोंफ्लिक्ट रीजोल्युशन में एडमीशन ले लिया था। सेंटर की ओर से दो दिनों का एक कांफ्रेंस आयोजित किया गया था। सेंटर के पहले बीस छात्रों में शामिल होने के कारण सभी काम हमारे ही जिम्मे था।
कांफ्रेंस के दूसरे दिन कमलेश्वरजी को एक सत्र की अध्यक्षता करनी थी। और भी कई वक्ता थे। जम कर शांति और दंगे पर चर्चा हुई। कमलेश्वरजी भी बाबरी ढांचे और अपनी नौकरी के अनुभवों को बांटा। पूरे देश के अलावा बाहरी देशों के प्रतिनिधि हाल में मौजूद थे।

सत्र ख़त्म होने के बाद सेंटर के निदेशक साजिद सर ने कमलेश्वरजी से व्यक्तिगत तौर पर मेरा परिचय कराया। उन्होंने मेरा नाम सुनते ही कहा, तुम वही विनीत तो नहीं, जिसने कुछ माह पूर्व गीतकार शैलेन्द्र पर हिंदुस्तान के सम्पादकीय पर लेख लिखा था। मैंने जैसे ही हामी भरी, उन्होंने आव देखा न ताव, सामने खडे फोटोग्राफर से कहा, भाई, विनीत के साथ मेरा अच्छा सा फोटो खींचो। वह उस समय काफी की चुस्की का आनंद उठा रहे थे।

मैंने कहा, सर कोई बात नही, आप काफी पीते रहें, फोटो खीच जाएगा। उन्होंने थोडी सख्ती बरतते हुवे कहा, भले ही विनीत को अपनी तस्वीर पसंद नही हो, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं किसके साथ फोटो खीचा रहा हूँ और फोटोग्राफर से एक फोटो अपने घर पर भेजने का आदेश दिया। मैं पूरे समय हक्का-बक्का रहा। कहाँ मैं, कहाँ कमलेश्वर। तत्काल मुझे याद आ रहा था कि लेख लिखने के दौरान मुझे पढ़ने को मिला था कि जब गीतकार शैलेन्द्र का निधन हुआ था, तो कमलेश्वरजी उनके घर से लेकर अन्तिम संस्कार तक मौजूद रहे थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी।

कार् में बैठते ही जहाँ उन्होने घर पर आने का निमंत्रण दिया, वही जम कर पढाई करने की सलाह दी। उन की कर में सिर्फ बैठने की जगह थी और पूरे कार में किताबें भरी पडी थी।

यह तो थी पहली मुलाक़ात।

जब मैं दिल्ली में हिंदुस्तान को अपनी सेवा दे रहा था, तो एन सी आर डेस्क से मुझे फरीदाबाद रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया था। उस वक्त डेस्क प्रमुख इरा झा थीं। उन्होने कहा था कि जब तुम्हें मौका मिले या शख्सियत कालम शुरू करना तो पहले कमलेश्वरजी का इंटरव्यू करना।
हिंदुस्तान एन सी आर का चार पेज यानी पूल आउट नॉएडा, फरीदाबाद, गुडगाँव और गाजियाबाद का शुरू हुआ तो मैंने कालम शख्सियत के लिए दो बार उनसे बात की। उन्होने हर बार कहा, घर आ जाओ तो बैठ कर जम कर बात करेंगे। लेकिन फ़िलहाल छाती में कुछ समस्या है, डाक्टर को दिखा दूँ और आराम हो जाये तो फिर जमकर बात होगी। एक -दो दिन की तो बात है।

संयोग वश २३ जनवरी,2007 से पूल आउट शुरू हो गया। आनन- फानन में मुझे मुम्बई फोन कर सोनू निगम के इंटरव्यू से कलाम शुरू करना पड़ा। फिर भी मन में विचार था कि पहले हफ्ते में ही कमलेश्वरजी का इंटरव्यू लूँगा।
पर , वह २७ जनवरी की रात थी। फरीदाबाद के मेरे बास राजू सजवान मुझे घर छोड़ते हुवे रात के करीब १०.३० बजे चले गए। ११ बजे के आस-पास उनका फोन आया, क्या तुम्हें कुछ जानकारी है, मैंने पूछा, क्या और किस बारे में। उन्होने कहा शायद कमलेश्वरजी का देहांत हो गया है, लेकिन कोंफ्र्म नही हो रहा है। मेरी फोन डायरी दफ्तर में थी। उनके घर का नम्बर उसी में था।
जारी....

1/27/2008

बेटी का ब्लाग ही नहीं, बहन से बिछुड़ने का दर्द भी है

इन दिनों मोहल्ला वाले अविनाश जी सहित उनके तमाम खास दोस्तों ने बेटी का ब्लाग का संचालन शुरू किया है। इसके तमाम पोस्टों को पढा हूँ। भले ही सभी- सभी अपनी बेटियों को लेकर अपने अनुभव बाँट रहे हों, लेकिन वे कहाँ जायेंगे जो कुंवारे हैं और शादी के बाद बेटी की चाहत रखते हैं।
मेरा जन्म उस परिवार में हुआ जहाँ बेटियों की अधिकता थी।जहाँ मैं घर में एकलौता बेटा था वहीं मेरी चार बहनें थी। तीन बहनों के बाद मेरा जनम हुआ। एक छोटी बहन मेरे बाद हुई। यह तो था हमारा कुनबा। लेकिन जब गर्मी या दशहरे में गाँव जाते तो संयुक्त परिवार होता। मेरे दो चाचा थे। हम सभी भाई-बहन गाँव की गलियों में, खेत-खलियानों में खूब मौज- मस्ती करते।
गाँव में ग्यारह बहनें और महज छः भाई होते। बडे चाचा को चार बेटियाँ और दो बेटे थे। छोटे चाचा को तीन बेटियाँ और तीन बेटे थे। लेकिन खास बात यह थी कि कभी भी पापा सहित दोनों चाचा को कभी यह चिंता नही देखी की घर में इतनी लक्ष्मी है, उसकी शादी कब, कहाँ और कैसे होगी।यह बात अलग थी कि खेतीहर जमीं थी और बडे चाचा टीचर थे और पापा भी कालेज में अध्यापन करते हैं। खेतों में फसल इतना होता कि सभी लोग सालों भर फसल खाते और उसे साल के अंत में नई फसल आने से पहले पुराने को बेच देते या जो छोटे वाले चाचा को करना होते वह उनके जम्मे होता।
यह तो हुई हमारे घर की बात, अब मैं असली मुद्दे पर आता हूँ। मेरे यहाँ सबसे बड़ी बहन जिसे सभी लोग प्यार से दीदी कहते थे, उनका इंतकाल गाँव में हैजे से हो गया। सभी लोग गर्मी की छुट्टी में गाँव गए थे। मैं उससे एक हफ्ता पहले वापस तारापुर आ गया था, जहाँ पापा कालेज में थे। मेरे साथ बाबा यानी दादाजी रहते थे। दादी मेरे जनम से पहले गुजर गयी थी।
गाँव से तारापुर उस दौर में आने पर पूरा दिन लगता था। सुल्तानगंज में गंगा पर करना होता था। कई बार बस और ट्रेन के सही समय पर गंगा तट पर नही पहुचाने पर अगवानी यह सुल्तानगंज के दुकानों में रात जाग कर गुजरनी पड़ती थी। फोन की सुविधा तक नही थी। संदेश पहुचने में समय लगता।
उस दिन जब मेरे चचेरे भाई पिंटू भाई जब शाम में दीदी की मौत की खबर लेकर आये थे तब मैंने पहली बार अपने पापा को रोते देखा था। उससे पहले मुझे हमेशा कड़क दिखाई पढ़ते थे। दीदी की मौत की बात पूरे तारापुर में फ़ैल गयी। तभी कालेज के प्रिंसिपल बालेश्वर बाबु घर पर आये थे। मुझे आज भी फिल्म की तरह वह भूली-बिसरी बात आंखों के सामने गुजर जाता है।उस सदमे से अभी तक शायद ही कोई घर का सदस्य मुक्त हुआ हो। बाबा उस समय गाँव में थे, वह दीदी को न बचा पाने का जम्मेदार खुद को मानते थे। उस दौर में हमारे गाँव में एक अस्पताल नही था। पिछले पांच साल से गाँव गया नही, लेकिन पापा और मम्मी जाते रहती है, बताती है एक अस्पताल खुल गया है।
घर में तीनों बहनों ने जम कर पढाई की, सभी का ध्यान होता की पापा या मम्मी को कभी भी दीदी का जाना नही खले। मैं या तीनो बहनों ने तय किया कि कोई भी व्यक्ति ऐसे कोई काम न करे जिससे पापा और मम्मी को दिल को तकलीफ हो। तीनों बहन की शादी पापा ने जहाँ कहा, सभी ने हामी भरी। बड़ी दोनों बहने फ़िलहाल गणित में शोध कर रही है। संयोग वस् हमारे तीनों बहनोई भी काफी अच्छे हैं और उनकी भी इच्छा रहती है कि उनसे कोई ऐसी हरकत या उनके मुँह से ऐसे बात न निकले जिससे दोनो व्यक्तियों को तकलीफ हो।
दो बहनों के इंदौर और छोटी के जयपुर में रहने के कारण भागलपुर में एक साथ मुलाक़ात नही हो पाती। पापा बताते हैं कि घर काफी खाली-खाली लगता है। दिसम्बर में मैं सिर्फ एक दिन के लिए घर गया, पर जहाँ पहले हमेशा घर में रहता था, वही जाने के बाद बाहर ही घूमता रह।
घर में पापा और मम्मी को बेटियों को कमी नही खले इस कारण पिछले पांच साल से शायद ही ऐसा कोई दिन बीता, जिस दिन मैंने फोन नही किया हो। तीनो बहने भी हर दिन फोन करती है। कभी-कभी बड़ी बहन फोन कर ली और सभी को हलचल बता देती है। पापा और मामी भी छुट्टी मिलने पर इंदौर जाता हैं। मैं भी अक्सर जाता हूँ।
२००७ में पापा नौकरी से अवकाश ग्रहण करते, लेकिन नीतिश सरकार ने दो साल और सेवा बढा दी। दोनो आदमी बेटी की याद में जी रहें हैं, आपस में बातचीत वधू का मुद्दा रहता है, कि ऐसे लडकी आये जो बेटी की तरह हो और मम्मी भी ऐसी की सपने हैं कि उसे अपनी मम्मी जैसा प्यार दूँ।
अब बताएं कि घर कि बेटियों कि कहानी किसे सुनाएँ।

1/26/2008

राग दरबारी के चर्चित लेखक श्रीलाल शुक्ल को पद्म सम्मान

राग दरबारी के चर्चित लेखक श्रीलाल शुक्ल को पद्म सम्मान

हिन्दी बोलने वाले, पढ़ने वाले और इससे जुडाव रखने वालों के लिए आज सुखद अहसास हुआ होगा। राग दरबारी उपन्यास से अपनी पहचान बनने वाले श्री लाल शुक्ल को पद्म भूसन मिलने हिन्दी एक मायने रखता है।

उत्तर प्रदेश के अत्रोली गाँव में ३१ दिसंबर १९२५ को जन्मे शुक्ल भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं। राग दरबारी के लिए १९६९ में ही साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल था। उस वक्त उनकी उम्र ३४ साल थी।

राग दरबारी का अंगरेजी सहित कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चूका है। भारत में रह रहे ब्रिटेन की प्रसिद्ध पत्रकार ट्रिलियन राइट ने उसका अंगरेजी में अनुवाद किया, जिसे पेंगुईन्न ने प्रकाशित किया था। उनकी प्रमुख कृति में सूनी घटी का सूरज, अज्ञात वास , सीमायें टूटती हैं, मकान, पहला पड़ाव शामिल हैं।

शुक्ल को व्यास सम्मान और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का शीर्ष सम्मान भी मिल चूका है।

1/24/2008

घर में चूहे, देना होगा टैक्स

घर में चूहे, देना होगा टैक्स

दिल्लीवासियों सावधान! यदि आपके घर में चूहे या छिपकली हो तो आपको टैक्स देना पर सकता है। भले ही यह आपको एक मजाक लगे, लेकिन दिल्ली सरकार इस मामले पर विचार कर रही है। दिल्ली सरकार कई चरण में इस योजना को लागू करने जा रही है। पहले चरण में सरकार ने दिल्ली में भैस, गाय, घोडा पालने वालों पर टैक्स लगाया है।
सरकार की योजना के मुताबिक, भैस पालने वालों को अब ढाई हजार रूपये, गाय पालने वालों को दो हजार रुपये, घोडा, खच्चर, गधा से चार पहिया वाहन चलाने वालों को दो हजार और दो पहिया चलाने वालों को एक हजार टैक्स ठोंक दिया है।इसे जल्द ही विधानसभा में पेश किया जाना है।
सूत्रों कि माने तो जल्द ही सरकार घरों में चूहों, बिल्ली, छिपकली, मक्खी, मछ्द पालने वालों पर टैक्स लगायेगी। बताया जाता है कि इस बार यदि लोगों का विरोध नही हुआ तो घर के किचन में काकरोच पाए जाने पर भी टैक्स लगाय्गी।
यहाँ बात कर लगाने के नहीं है, बल्कि गरीबों को दिल्ली से दूर करने की है। पहले झुग्गी झोपडी हटाई गयी। सड़क पर पैदल चलने वालों ko प्रतिबंधित किया गया। चान्दिनी चौक इलाका men रिक्शा चलने पर रोक लगाई गयी। दक्षिणी दिल्ली में रिक्शा चलाने पर पहले से प्रतिबंध है।
आमजन कि समस्या से दूर, सरकार हर महीने ऐसे कानून बनाती है, जिससे गरीब और गरीब रहे और अमीर के दिल्ली ही दिल्ली के दिल में बसे।
कानून जमकर बनाओ शीलाजी, लेकिन जरा घर में रहने वाले चूहों, छिपकली, मकरी और हाँ गली में रहने वाले कुत्ता जैसे जानवर से भी निजात दिलाओ। सरकार को चाहिऐ कि पूरी दिल्ली के हर घर की तलाशी ले, और जिस घर में चूहे मिलें उसे दस हजार रूपये का जुर्माना, छिपकली मिले तो पन्द्रह हजार रूपये ....
हाँ, शीलाजी घबराए नही, मेनका गांधी कुछ नही बोलेंगी, क्योंकि यहाँ उन्हें वोट नही मिलेगा।

ख़त्म हुआ टनाटन, घोषित हुआ भारत रत्न

आखिरकार भारत रत्न की घोषणा हो ही गयी। इतना वाद-विवाद होने के इतर यह सम्मान ऐसे शख्सियत को दिया गया, जिसने देश में ऐसा काम किया जिससे पिछले पंद्रह साल में किसी भी राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को लीक से हटने नही दिया। सरकार द्वारा दौउद इब्राहीम को भारत रत्न से सम्मानित करने के फैसले के बाद सभी नेताओं और अभिनेताओं के मुहं पर ताला लग गया है।
सूत्रों के मुताबिक इस बात भारत रत्न की होड़ में जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी, ज्योति बसु, काशीराम, बाला साहेब ठाकरे सहित ऐरे-गेरे नेता इसे पाने की होड़ में शामिल हो गए थे कि समिति को इस के लिए काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। बताया जाता है कि इस बार गाजर-मुली की तरह प्रधानमंत्री के पास नेताओं के अनुरोध को देखते हुए केन्द्र सरकार के पास अत्मसंकट की समस्या आ गयी थी।
जानकारों के अनुसार, इस बार इन टूट पुन्ज्ये नेताओं को छोड़ ऐसे व्यक्ति को दी गई, जिसने सही मायने में देश के सेवा की। इस क्रम में छोटा राजन, अबु सलेम सहित और भी कई नामों पर विचार-विमर्श हुआ। बैठक में वीरप्पन के नाम पर भी चर्चा हुई, लेकिन अहिन्दी भाषी होने के कारण और उसके मर जाने के कारण समिति सदस्यों ने इस नाम पर गंभीर नही huve।
समिति सदस्यों ने बताया कि दौउद ने ना सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में अमन और चैन का रास्ता दिखाया है। १९९२ ऐसा मुम्बई बम विस्फोट के बाद सिर्फ गुजरात में दंगा हुआ, नही तो पहले हर साल पूरे देश में अक्सर दंगा होता रहता था। दौउद का आतंक इस कदर रहा कि अमेरिका भी उसे खोजने में लगी रही। वह तो पाकिस्तान का भला हो जिसने उसके रहने-खाने की व्यवस्था कर दी।
माना जा रहा है कि जिस तरह भगत सिंह, चन्द्रशेखर सहित को अंग्रेज आतंकवादी मानती थी उसी तरह दौउद को अभी तक की सभी सरकार आतंकी मानती रही है। सरकार के सूत्रों का मानना है की जल्द ही दौउद, छोटा राजन सहित दुसरे समाज सेवी की जीवनी पाठ्य पुस्तक में पढ़ने को मिलेगी। उनकी आदमकद तस्वीर संसद में भी लगाने पर भी विचार किया जा रहा है।

1/22/2008

गोविन्द-गोविन्द कर उठे,मार लिया मैदान

आपने गुरु अशोक चक्रधर जी के ब्लोग पर एक कविता गोविंदा प्रकरण पर देख मेरे अन्दर का कवि भी जाग पर। मैंने भी उनकी तुकबंदी पर कुछ पंक्तियाँ लिख दी।... विनीत

गोविन्द-गोविन्द कर उठे,मार लिया मैदान
टीवी की टीआरपी में,सांसद हुये बेजान.
सांसद हुये बेजान ,रजत शर्मा से की बात
दी अपनी सफ़ाई,सोचा मैंने दे दी मात.
गुरू चक्रधर,चेले ने मिलायी तुकबन्द
तो वाह्-वाह्,नहीं तो झापड देना रसीद.

1/10/2008

हर तरफ हिलेरी क्लिंटन ही क्लिंटन

न्यूयार्क टाइम्स के पहले पन्ने पर मिस क्लिंटन के जीत की खबर छाई हुयी है। लीड स्टोरी में उनके बयान को छपा गया है, जिसमे उसने कहा है कि बहस निर्णायक मोड़ साबित हुआ। पूरी बातचीत एन बी सी पर प्रसारित सुबह के सो के दौरान लिया गया इंटरव्यू है।

इसी पन्ने पर छपे ऐक्जित पोल में कहा गया कि क्लिंटन की जीत में औरतों में जबरदस्त उत्साह देखा गया और आज की जीत में औरतों के हाथ रह है।

अखबार की दुसरी बड़ी खबर बुश का मिडिल ईस्ट यानी इसराइल और फिलिस्तीन का दौरा है। वे एक सप्ताह के दौरे पर जाने वाले हैं। इरान की खबर भी छपी गयी है, जिसमे विडियो औए जहाज के मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट है।

इंटरनेट संस्करण में ब्लाग में छपी खबरों के लिए अलग बाक्स बनाया गया है और कई मनोरंजक और ख़बरों का पिटारा है। बच्चों को खाने से होने वाला एलर्जी पर अक खबर है, जो जानकारी से परिपूर्ण है।

विशेष...हिलेरी क्लिंटन के राष्ट्रपति की दौड़ में शामिल होने पर ओपैद पेज पर ग्लोरिया स्तेनेम का लेख छापा है जिसका शीर्षक है, औरत कभी भी अग्रिम मोर्चे पर नही डटी । इसे आलेख पर विस्तृत चर्चा अगले चिठे में करूँगा।


विदेशों के अख़बारों मी छपने वाली ख़बरों के लिए क्लिक करें मीडिया हंगामा

1/07/2008

अब तो जग जाओ बावा


कॉफी अरसे से मंजीत बावा कोमा में है। पिछले दिनों अमर उजाला में भी उनके बारे में काफी विस्तृत रूप में पढा। दिन तो याद नही है, लेकिन लेख काफी कुछ कह गया.


मुझे आज भी याद है जब दैनिक जागरण के लिए उनसे इंटरव्यू लिया था और उन्होने कहा था कुछ नया करो। नयी दिशा में काम करो। लेकिन कई महीनों से उनका कोमा मी रहना क्या कहलाता है। क्या मैं सोचूँ बावा नया कर रहें हैं, कुछ नया सोच रहे हैं। बस अब उठ कर बैठेंगे और नयी कलाकृति पेश कर एक नयी कृति को जन्म देंगे।


फिर भी जब तक साँस तब तक आस। क्यों न उनकी बातों को फिर से याद कर लें। क्लिक करें ..कुछ नया


1/06/2008

....गहराता जलवायु संकट अंतिम भाग

संयुक्त राष्ट्र जरी इस रिपोर्ट को २०१२ के बाद की स्थिति को लेकर बतौर फ्रेम वर्क देखा जा रहा है। कारण, वर्ष १९९७ में हुए क्योटो प्रोटोकाल के तहत समय सीमा वर्ष २०१२ में ख़त्म हो रही है.वर्ष १९९७ में हुए क्योटो समझौते में प्रदूषण फैलाने वाली गैसों के उत्सर्जन में कमी करने के लिए विकास शील और विकसित देशों को लक्ष्य दिया गया था। यह हम बात है कि सबसे अधिक ग्रीन हॉउस गैस छोड़ने वाला अमेरिका शुरू से ही इस मुद्दे पर नकारात्मक रवैया अपनाता रहा और इसे मानने से पूरी तरह इंकार कर दिया था।



'ह्यूमेन डेवलपमेंट रिपोर्ट २००७-08' में विशेषकर गरीब देशों और वाहन के देशों के प्रति जलवायु मामले को लेकर जबर्दस्त चिंता व्यक्त की गई है। एक और जहाँ जलवायु विज्ञान से जुरे लोगों का ध्यान पांच अहम मुद्दों की ओर आकृष्ट कराया गया है, वहीं विकसित और विकास शील देशों के सामने कई ऐसे प्रस्ताव भी रखे गए हैं।



विस्तृत रिपोर्ट में सबसे पहले कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को प्रमुखता दी गई है। संयुक्त राष्ट्र का मानना है के जलवायु परिवर्तन का प्रभाव , बारिश, तापमान और कृषि के लिए जल उपलब्धता पर काफी अधिक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ऐसे ही स्थिति रही तो २०८० तक करीब छः सौ मिलियन लोग पूरी दुनिया में कुपोषण से पीड़ित होंगे। जल संकट के मामले में रिपोर्ट बताती है कि जलवायु का प्रभाव ग्लेशियर पर जबरदस्त रूप से पर रहा है। एशिया और लैटिन अमेरिका में सिंचाई के पानी की जरूरत पर इसका काफी असर पड़ा है। वैज्ञानिकों और लोगों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो २०८० तक करीब १.८ बिलियन लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों का मानना है को आंधी, तूफान, सुनामी के अलावा समुद्र में जलस्तर बढ़ने या घटने में जलवायु का बड़ा हाथ होता है। ग्लेशियरों के पिघलने का भी प्रभाव लगातार देखने को मिल रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में दुनिया के लोगों का ध्यान स्वास्थ्य स्तर में तेजी से गिरावट होने के ओर भी दिलाया गया है। दुनिया के तमाम देशों को इको सिस्टम की ओर भी दिलाया गया है। शोध के मुताबिक, पूरी दुनिया में मौजूद मूंगे चट्टान के आधे से अधिक भाग का रंग पीला होते जा रह है। यह रंग परिवर्तन सिर्फ समुद्र के गर्म होने के कारण हो रहा है।

मूगों के चट्टान के टकराने के कारण कई देशों के मानवीय विकास मामले में यह महाविपत्ति का कारण बन सकता है। पूरी रिपोर्ट में अंतर राष्ट्रीय समुदाय से जहाँ कारगर कदम उठाने की मांग की गई है। जलवायु संकट से निजात पाने के लिए रिपोर्ट में कई प्रस्ताव भी रखे गए हैं। साथ ही, विभिन्न मसलों पर दुनिया को चेतावनी भी दी गयी है। संयुक्त राष्ट्र ने इस रिपोर्ट के जरिये २०१२ के फ्रेम वर्क के तहत जलवायु की खतरनाक स्थिति से निजात पाने के लिए बहु पक्षीय फ्रेमवर्क बनने पर जोर दिया गया है। २०५० तक ग्रीन हॉउस गैस में पचास फीसदी कमी लाने का प्रस्ताव भी किया गया है। क्योटो समझौते के तहत विकसित देशों को लक्ष्य को पुरा किया जाना चाहिऐ, जिसके तहत २०५० तक ८० फीसदी और २०२० तक ३० फीसदी गैस की मात्रा में कमी लाने पर जोर दिया गया है। जिन विकास शील देशों में अधिक गैस उत्सर्जित हो रहा है, उन्हें हर हालत में २०२० तक खुद पर अंकुश लगना चाहिऐ और इसके लिए वैश्विक समुदाय को वित्तीय सहायता और लो-कार्बन तकनीक की दीर्घ कालीन योजना लागु करने की भी बात रिपोर्ट में कही गई है, जिसमे इसके अल्पीकरण का एजेंडा तय करने पर सभी का ध्यान आकृष्ट कराया गया है।

प्रस्ताव के तहत सभी विकसित देशों से एक राष्ट्रीय कार्बन बजट तैयार करने का आग्रह किया गया है। इसके तहत, कार्बन पर अधिक कराधान की बात कही गयी है, जिससे वर्ष २०२० के बाद ग्रीन हॉउस गैस कार्बन द ओक्दिईद् की मात्र में उम्मीद से ३५ फीसदी अधिक तेजी से बढोत्तरी पर अंकुश लग सके। संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक तौर पर फ्रेम वर्क को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसके तहत, माडर्न एनर्जी सर्विस और बायोमास पर आश्रय करने की ओर ध्यान दिलाया गया है।



रिपोर्ट में २०३० तक सभी को जलवायु संकट मामले पर जागरूक होने की बात कही गयी है। ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन द आक्साइड की बढ़ती मात्र आश्चर्यजनक नही है, लेकिन जिस गति से बढ़ रही है, वह चिंताजनक है।

बहरहाल, जलवायु परिवर्तन बहुत खतरनाक चुनौती बन चुकी है और इससे नही निबटा गया तो ऐसे खतरनाक प्रभाव हो सकते हैं जिनसे उबरना असंभव हो सकता है। पीढी दर पीढी इस मुद्दे पर लोगों को जागरूक होना होगा। जलवायु संकट से निजात पाना एक दिन का खेल नही है। वर्तमान पीढी को इस मसले पर अपनी खिड़की खुली रखनी होगी, तभी ग्रीन हॉउस के स्तर में कानी होगी। इसके ग्राफ की दिशा को नीचे लाने का प्रयास करने के लिए जी- तोड़ मह नत करनी होगी।



विनीत उत्पल

1/05/2008

मैं अयोध्या...

मैं अयोध्या...

(बाबरी मस्जिद ध्वंस पर केन्द्रित )

जज साब!
बचा लो मुझे
बचा लो...
इस अनैतिक सियासत से / इस लम्पट दौर से

जज साब!
सुन लो मेरी शिक़ायत
ले लो मेरी गवाही
लिख लो मेरा बयां

जज साब!
मैं अयोध्या
सरयू पुत्र अयोध्या
आपकी अदालत में
जो कहूँगा
सच कहूँगा...

जज साब!
यूं तो वह
६ दिसम्बर १९९२ का दिन था
मगर हालत ऐसे थे कि वह
उन दिनों की
कोई भी तारीख हो सकती थी

उस दिन हुआ था
उन तीन गुम्बदों का ध्वंस
मेरे सान्झेपन का कत्ल
मेरी पहचान का बलात्कार

जी हाँ जज साब!
मैं वहीं था उस वक्त
बेबस और असहाय
सती होती स्त्री सा
जिब ह होते बकरे-सा
सूली पर चढ़ते निरपराध-सा
अपहृत सीता-सा
भयाक्रांत और उद्विग्न
क्योंकि घोषित हो रहा था
कि किसी भी वक्त
धकेल दिया जाएगा मुझे
वहीं 'सरयू ' में
कथित धर्म-रक्षाथ्र
उस दिन...
मेले में गुम बच्चे की तरह
मुझसे पूछा जा रह था
बाप का नाम
घर का पता
प्रश्नों के चप्पुओं से
खेता रह
समय की नाव

जज साब!
मैंने देखें हैं
अपने सामने सैकड़ों युद्ध
अपनी छाती पर बहती खून की नदियाँ
सही हैं आत्मा पर
हजारों घावों के दर्द की चीत्कारें
इसलिए मैं नही याद करना चाहता
वह वक्त
क्योंकि मैं नये ख्वाबों को लेकर
जाना चाहता हूँ भविष्य में
आजादी के नये वितान में
जीवन के नये संविधान में

लेकिन जज साब!
अब की बार
सियासत की बिसात पर
बनाया गया है मुझे
साजिश, सत्ता और स्वार्थ का
नया मोहरा
अपनों ने हे किया विश्वासघात...

बताइए जज साब!
ऐसे में उस दिन
मैं कहाँ जाता, क्या करता?

उस दिन सुबह
हवा में
भयानक चुप्पी थी
लेकिन मस्तिष्क बज रहे थे
टनाटन
माँ सरयू
फटी-फटी आँखों से
देख रही थीं
कुचला जाता मेरा बदन
आकर लेटा
एक विरत ओक्तोपस
जो पी रहा था
मेरे जीवन का सत्व

उस दिन
एक सोये हुए अजगर ने
फिर ली थी अंगडाई
और पूरा इलाका
कांप उठा था
न जाने अब क्या हो!!

आस्था के
अकर्मण्य रिश्तेदार
देश के वे जिम्मेदार
किन्क्र्त्व्य विमुद-से
हाजिर थे वहीं जज साब!
मैं गिना सकता हूँ आज भी
उनमें से एक-एक के नम

मैं वहीं था उस वक्त
जब
बेकसूर सद्भावना और
सम्मति को
शब्दों के पेडों से बांधकर
लगाए जा रहे थे कोड
सतासत-सतासत
उसी समय
मैंने देखा था जज साब!
कि मुई सियासत ने भी
भीड़ को
थमा दिया था
नशीला कटोरा,शरारती आग
और नशे में धुत
दिशाहीन भीड़
करने लगी थी अग्निपान

मैं वहीं था उस वक्त
जब नौजवान भविष्य
प्यास से व्याकुल
मांग रहा था पानी

और वे पानीदार
उसके मुहं पर
ठुक रहे थे
साम्प्रदायिकता और जातिवाद का
बदबूदार बलगम

देश का मकरंद
संशय के धुएं और धूल में
लिथर रह था
और
सिंहासन की छीना-झपटी में
लग गई थी तिरंगे में
बड़ी-सी खूंट

जज साब!
उस दिन
सुबह के मुँह से
फूटा था
आदिम युग की
बदबू का भभूका
जेहानों से रिस रही थी
जहरीली गैस
जैसे यूनियन कार बा ईद से
रिस गई हो
'मिथ इल आइसो -सयानिद '

उस दिन
ख़बरों में परोसी गई थी
इतिहास के कब्रिस्तान की
पुरानी कब्रों से उघारकर
गली हुई लाशों की सडांध
विद्वेष की बेहतरीन तस्तरी में

जिसे चटखारे ले-ले
लपक-लपककर
भकोस रहे थे
अखबारी लोग

जज साब!
मैं वहीं था उस वक्त
जहाँ शब्द
अपना दुरूपयोग न किये जाने की
हाथ जोड़ कर
मिन्नतें कर रहे थे सियासत से
चेतावनियाँ दे रहे थे बार-बार
मगर
कोफी की चुस्कियों
व सिगरेट के कशों के बीच
बुद्धिजीवियों में
चेत्ती रही
सुविधा, सत्ता और
स्वार्थ की भागीदारी
होती रही कबूतरबाजी
चलते रहे सांड-संघ्र्स
डब्लू-डब्लू एफ
लोग लगाते रहे
एक-दूसरे पर
सत्ता...

जज साब!
जब
मेरे आंगन में
गिराए गए थे
वैमनस्य के परमाणु-बम

तब आण्विक विखंडन से
तापमान
सूर्य के गर्भास्थल से
ऊपर हो चला था वहन

तब
साफ देखा था मैंने
जज साब!
चपत में आ गई थी
मेरी बगिया
हरे-भरे खेत, हरिया की बारात
मेरी कविता
मेरा इतिहास
मेरी संस्कृति और
मेरा वजूद

जज साब!
वो तो मेरे राम का ही प्रताप था
जो मैं इस बार
बचकर आ पाया हूँ
आपके सामने

मगर जज साब!
जैकारों, ग्वोर्क्तियों व
अत्थासों के बीच
आज भी नन्हीं नुसरत चौंकती है बार-बार
छुटका वहीद आप से पूछता है-
'आप! अयोध्या में तो
भक्तों का मेला है
हुजूम है, रेला है
मगर हमारी फूल की दुकान के फूल
क्योँ नहीं बिकते है अब?'

जज साब!
आप तो जानतें हैं
नुसरत की, सुलेमान शेख की
अहमद या निसार की फूल मालायें
प्रतीक्षा कर रही हैं
आज भी

मैं इसलिए कह रह हूँ
जज साब!
क्योंकि देखा नही जाता
फूलों को इस तरह
मुरझाते हुए प्रतीक्षा करना
अपने ही घर में
नन्हीं नुसरत का
इस तरह नींद में चौंकना

समय! मेरे न्यायाधीश!
मैं अयोध्या वल्द भारत
हाथ जोड़कर गुहार लगता हूँ आपसे
इससे पहले
कि मिट जाये
मेरा वजूद , मेरा घर-परिवार
मुझे बच लीजिये
बच लीजिये
इस अनैतिक सियासत से
इस लम्पट दौर से...

(यह कविता मैं अयोध्या... कविता संग्रह की है। इस कविता के रचनाकार हरे राम समीप हैं, जो इन दिनों फरीदाबाद में रहते हैं। भद्र पुरुस को पिछले दिनों हार्ट अटैक का दौरा पड़ा। संजोग वश उस दिन मैं सुब-सुबह आगरा से अपनी फरीदाबाद के कमरे पर पहुंचा था। अपने पुराने बौस राजू सजवान के साथ उनको देखने सेक्टर आठ स्थित निवास पर गया था। उनके बेहतर स्वास्थ के कामना लेकर दोनों विदा हुए। संयोग वश कल रात उनकी किताब पर नजर चली गयी और आपसे शेयर कर रहा हूँ, यदी कहीं से भी कविता आपकी आत्मा को छूती हो तो उन्हें ९८७१६९१३१३ पर काल कर हाल चाल जान लें और कविता के बधाई भी दे दें. )

1/04/2008

तसलीमा नसरीन इंटरव्यू अन्तिम भाग

(Close your eyes and think once what you have done and what happens all around. )


As I know, Turkey is an ideal among muslim countries। What is the reason behind this?


It is a big history. Why and how, Turkey became a secular and not so Arabian. Many political things...I told you about American interest...Some countries fundamentalists. It was America, who created the muslims fundamentalists to fight the communalists during cold war. So, they.....Kamal Ata forced to bring secularism in Turkey. So, I don't believe for these things...country to democracy of secular. People should bring democracy to fight. Democracy within and from the country.
You cannot apply force. People should aware to democracy. Situation create the country. It is not. If you apply force, it will not remain. So, you should enter... Problems...if you give the free election in the fundamental rights. So, it is not, it cannot be democracy and secular. So, army in Turkey is secular. Therefore, fundamentalist should live to take the government too.
You understand, I am saying...
So, you cannot apply. People should be secular and they should fight or create their country secular. Otherwise, if people are not educated than the country would remain the fundamentalist, remain problem in tha muslim countries.

The original force of liberalisation of Islam lost all over world, what you think?



There are some politics behind this. As I told you that American policy made the muslim fundamentalists, the communists and afterwords America against Afghanistan and made liberal muslims fundamentalists.
The people, who is secular in the muslim countries should be liberal...they become islamic fundamentalist and anger against the western policy, american foreign policy... This is the islamic fundamentalists and another issues set by america. Palestine is also big cause to make the islamic to moderate the muslims, fundamentalist muslims.

One another, personal question, what you feel when Bangal government banned your book 'Dwikhandita'।



Oh, I was surprised. I was shocked. I don't right... But many people protest against the ban.

I have read your two books 'Lajja' and 'Aourat ke hak men'. I am not found any wrong theories. But why some people opose your literature...



I don't know, but they gave reasons. The five books are ban in my country, Bangladesh and one is ban in India. So, they gave different reasons for banning different books.
'Lajja' was ban by Bangladesh government. Government gave the reason, it would create communal problems and my other books also banned.....It would heart the religious people. These some reasons were given by the government when banned.
So, those are...I think stupis reasons.
Actually, They don't want to readers should read the truth. Because told the truth, what happens in Bangladesh in 1992 after Ayodhya. That how Hindu people, hind minority or community suffer.
That I told the truth, but government try to hide the truth. And my other books that I wrote against the patriotical system and religious system that the government was fade my words. So, they banned.
The writers should have rights to write, writers to think or believe in and the readers should have to right to read, whatever they like to read. No government should have the right to ban any body's book. So, I am against banned or censorship.

... your next book?


My next book is the fifth part of my autobiography.

concluded

1/03/2008

It is not really true democracy...Taslima

तसलीमा से बात करना और अरसे बाद उसे फिर से सुनना एक अलग ही मजा और सोचने के लिए मजबूर करता है। जहाँ वह अपने आसपास की घटनाओं पर जमकर बोलती हैं, वहीं भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश सहित तुर्की पर भी समान अधिकार और आत्मविश्वास के साथ सिर्फ गरजती ही नही बरसती भी हैं। अमेरिका के खिलाफ मुहँ खोलने में भी तसलीमा को गुरेज नही है। लोकतंत्र की जम कर वकालत करती हैं। गुजरे हुए पल को याद करती है। लज्जा और द्विखान्दिता पर भी बात करती हैं.


मुझसे करीब पौने घंटे बात हुई थी। करीब पन्द्रह सवाल पूछने का मौका मिला था। और जबाब भी मुझे मिला था। मजेदार बातें हुई थी। इंटरव्यू के बाद हंसी के फव्वारे भी छूटे थे। क्यों न अंगरेजी में हुई बातचीत को पढा जाय।

बताते चलूं मेरे अंगरेजी उतनी achchhee नही है, इस कारन जहाँ गलती हो, सही कर पढ़ने का कष्ट करेंगे...विनीत उत्पल







It is not really true democracy...Taslima






What you feel in India?

I feel good.

What is the best thing in India, which you like most?

The best thing....People.

There are several muslim countries in world, where is no democracy, as well as in Bangladesh. What you think about that?

First off all, we see lack of democracy in many countries wherever the countries colonial by British or imperialist or there are new democracy. So, Pakistan is democracy, Bangladesh is democracy and some other countries like Indonesia, Maleyasia and Algeria, Tunesia, Turkey. There is democracy. We have democracy. But, some of the Arabic countries not yet democractic. Because, they have monarchy and still country monarchy. Many political reason for that....
Suppose, Saudi Arabia, Monarchy is encouraged by super power America. It is the American interest that not to encourage for democracy in the middle east because of the oil interest. They want to become puppets, who are American puppets in the middle east countries. So, the people who are fighting for democracy are, their struggle, their fight, their movements normally crashed by America. You know the history. So, there are countries, suppose Bangladesh. the people who believe in democracy have been fighting for the real democracy. This is democracy, but this is new democracy, in Bangladesh. So, it is not really true democracy.

What is wrong in Bangladesh?

Wrong means?

You have no security in Bangladesh since ten years...


yah, it happens in so many countries. But this is discourage now in the country. Government kills the people, who ever suppose the movement. They torture their opponents.

You have written 'Lazza', people about Bangladesh. Is there democracy...

It has democracy. Why are you saying, Bangladesh is no democractic.

But, then why you have no security to your life in Bangladseh?

It happens. You know America is democracy. Ok...But how many people have the freedom to speak...You know, no people have the right to write or speak against war... So, you not find any country real democracy. No where. Everywhere some restrictions.

Is it India too?

India is the largest democracy in the world. But you too, find lots of problems. You look my book called 'Dwikhandita' is banned by West Bangal government.

...Only West Bangal government?

No, not only West Bangal government, it is applied all over India. So, it is not democracy. Democracy means you have freedom of expression. You have the freedom to write if it is real democracy. Look at muslims in India. They don't have the rights to live as a human beings...is not real democracy. Book is banned, people are tortured.

What you feel on Gujarat riots?

I criticised all kind of riots, all kind of hatred. Because, I consider everybody as a human being, wharever their gender or religion. I defend minority, when Hindus oppressed in Bangladesh. I defand muslims, I defand Christian in Pakistan...So, I believe in humanism. I am a secular humanist, whatever people are oppresser. I am against any kind of harted or violence. People should love each other, live together with equality and justice and now there humanity.

contunied...







1/02/2008

मैं तसलीमा बोल रही हूँ

कुछ अरसा पहले मैंने अपने ब्लाग पर तसलीमा के बारे में और उनसे इंटरव्यू के बारे में लिखा था। अपनी छोटी सी लाइब्रेरी से रिकार्ड इंटरव्यू को लिपि में बदल तो दिया लेकिन पूरी बातचीत अंगरेजी में है। मैंने सोचा बातचीत हुबहू पढा जाये तो मजा आ जाएगा।

तमाम हिन्दी प्रेमी के लिए बात में उसका अनुवाद आपके सामने हो गा। इंटरव्यू को कल आप भड़ास, विनीत उत्पल और पीस 4 आल पर पढ़ सकते हैं।

बताते चलें यह पूरी बातचीत छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के होटल पिकेद्ली में हुई थी जो कई मायने में प्रासंगिक है.

1/01/2008

नया साल मुबारक हो


HAPPY NEW YEAR 2008




From-

VINIT UTPAL


AKINCHAN BHARAT

AGRA


अकिंचन भारत

आगरा

नया साल मुबारक हो