1/05/2008

मैं अयोध्या...

मैं अयोध्या...

(बाबरी मस्जिद ध्वंस पर केन्द्रित )

जज साब!
बचा लो मुझे
बचा लो...
इस अनैतिक सियासत से / इस लम्पट दौर से

जज साब!
सुन लो मेरी शिक़ायत
ले लो मेरी गवाही
लिख लो मेरा बयां

जज साब!
मैं अयोध्या
सरयू पुत्र अयोध्या
आपकी अदालत में
जो कहूँगा
सच कहूँगा...

जज साब!
यूं तो वह
६ दिसम्बर १९९२ का दिन था
मगर हालत ऐसे थे कि वह
उन दिनों की
कोई भी तारीख हो सकती थी

उस दिन हुआ था
उन तीन गुम्बदों का ध्वंस
मेरे सान्झेपन का कत्ल
मेरी पहचान का बलात्कार

जी हाँ जज साब!
मैं वहीं था उस वक्त
बेबस और असहाय
सती होती स्त्री सा
जिब ह होते बकरे-सा
सूली पर चढ़ते निरपराध-सा
अपहृत सीता-सा
भयाक्रांत और उद्विग्न
क्योंकि घोषित हो रहा था
कि किसी भी वक्त
धकेल दिया जाएगा मुझे
वहीं 'सरयू ' में
कथित धर्म-रक्षाथ्र
उस दिन...
मेले में गुम बच्चे की तरह
मुझसे पूछा जा रह था
बाप का नाम
घर का पता
प्रश्नों के चप्पुओं से
खेता रह
समय की नाव

जज साब!
मैंने देखें हैं
अपने सामने सैकड़ों युद्ध
अपनी छाती पर बहती खून की नदियाँ
सही हैं आत्मा पर
हजारों घावों के दर्द की चीत्कारें
इसलिए मैं नही याद करना चाहता
वह वक्त
क्योंकि मैं नये ख्वाबों को लेकर
जाना चाहता हूँ भविष्य में
आजादी के नये वितान में
जीवन के नये संविधान में

लेकिन जज साब!
अब की बार
सियासत की बिसात पर
बनाया गया है मुझे
साजिश, सत्ता और स्वार्थ का
नया मोहरा
अपनों ने हे किया विश्वासघात...

बताइए जज साब!
ऐसे में उस दिन
मैं कहाँ जाता, क्या करता?

उस दिन सुबह
हवा में
भयानक चुप्पी थी
लेकिन मस्तिष्क बज रहे थे
टनाटन
माँ सरयू
फटी-फटी आँखों से
देख रही थीं
कुचला जाता मेरा बदन
आकर लेटा
एक विरत ओक्तोपस
जो पी रहा था
मेरे जीवन का सत्व

उस दिन
एक सोये हुए अजगर ने
फिर ली थी अंगडाई
और पूरा इलाका
कांप उठा था
न जाने अब क्या हो!!

आस्था के
अकर्मण्य रिश्तेदार
देश के वे जिम्मेदार
किन्क्र्त्व्य विमुद-से
हाजिर थे वहीं जज साब!
मैं गिना सकता हूँ आज भी
उनमें से एक-एक के नम

मैं वहीं था उस वक्त
जब
बेकसूर सद्भावना और
सम्मति को
शब्दों के पेडों से बांधकर
लगाए जा रहे थे कोड
सतासत-सतासत
उसी समय
मैंने देखा था जज साब!
कि मुई सियासत ने भी
भीड़ को
थमा दिया था
नशीला कटोरा,शरारती आग
और नशे में धुत
दिशाहीन भीड़
करने लगी थी अग्निपान

मैं वहीं था उस वक्त
जब नौजवान भविष्य
प्यास से व्याकुल
मांग रहा था पानी

और वे पानीदार
उसके मुहं पर
ठुक रहे थे
साम्प्रदायिकता और जातिवाद का
बदबूदार बलगम

देश का मकरंद
संशय के धुएं और धूल में
लिथर रह था
और
सिंहासन की छीना-झपटी में
लग गई थी तिरंगे में
बड़ी-सी खूंट

जज साब!
उस दिन
सुबह के मुँह से
फूटा था
आदिम युग की
बदबू का भभूका
जेहानों से रिस रही थी
जहरीली गैस
जैसे यूनियन कार बा ईद से
रिस गई हो
'मिथ इल आइसो -सयानिद '

उस दिन
ख़बरों में परोसी गई थी
इतिहास के कब्रिस्तान की
पुरानी कब्रों से उघारकर
गली हुई लाशों की सडांध
विद्वेष की बेहतरीन तस्तरी में

जिसे चटखारे ले-ले
लपक-लपककर
भकोस रहे थे
अखबारी लोग

जज साब!
मैं वहीं था उस वक्त
जहाँ शब्द
अपना दुरूपयोग न किये जाने की
हाथ जोड़ कर
मिन्नतें कर रहे थे सियासत से
चेतावनियाँ दे रहे थे बार-बार
मगर
कोफी की चुस्कियों
व सिगरेट के कशों के बीच
बुद्धिजीवियों में
चेत्ती रही
सुविधा, सत्ता और
स्वार्थ की भागीदारी
होती रही कबूतरबाजी
चलते रहे सांड-संघ्र्स
डब्लू-डब्लू एफ
लोग लगाते रहे
एक-दूसरे पर
सत्ता...

जज साब!
जब
मेरे आंगन में
गिराए गए थे
वैमनस्य के परमाणु-बम

तब आण्विक विखंडन से
तापमान
सूर्य के गर्भास्थल से
ऊपर हो चला था वहन

तब
साफ देखा था मैंने
जज साब!
चपत में आ गई थी
मेरी बगिया
हरे-भरे खेत, हरिया की बारात
मेरी कविता
मेरा इतिहास
मेरी संस्कृति और
मेरा वजूद

जज साब!
वो तो मेरे राम का ही प्रताप था
जो मैं इस बार
बचकर आ पाया हूँ
आपके सामने

मगर जज साब!
जैकारों, ग्वोर्क्तियों व
अत्थासों के बीच
आज भी नन्हीं नुसरत चौंकती है बार-बार
छुटका वहीद आप से पूछता है-
'आप! अयोध्या में तो
भक्तों का मेला है
हुजूम है, रेला है
मगर हमारी फूल की दुकान के फूल
क्योँ नहीं बिकते है अब?'

जज साब!
आप तो जानतें हैं
नुसरत की, सुलेमान शेख की
अहमद या निसार की फूल मालायें
प्रतीक्षा कर रही हैं
आज भी

मैं इसलिए कह रह हूँ
जज साब!
क्योंकि देखा नही जाता
फूलों को इस तरह
मुरझाते हुए प्रतीक्षा करना
अपने ही घर में
नन्हीं नुसरत का
इस तरह नींद में चौंकना

समय! मेरे न्यायाधीश!
मैं अयोध्या वल्द भारत
हाथ जोड़कर गुहार लगता हूँ आपसे
इससे पहले
कि मिट जाये
मेरा वजूद , मेरा घर-परिवार
मुझे बच लीजिये
बच लीजिये
इस अनैतिक सियासत से
इस लम्पट दौर से...

(यह कविता मैं अयोध्या... कविता संग्रह की है। इस कविता के रचनाकार हरे राम समीप हैं, जो इन दिनों फरीदाबाद में रहते हैं। भद्र पुरुस को पिछले दिनों हार्ट अटैक का दौरा पड़ा। संजोग वश उस दिन मैं सुब-सुबह आगरा से अपनी फरीदाबाद के कमरे पर पहुंचा था। अपने पुराने बौस राजू सजवान के साथ उनको देखने सेक्टर आठ स्थित निवास पर गया था। उनके बेहतर स्वास्थ के कामना लेकर दोनों विदा हुए। संयोग वश कल रात उनकी किताब पर नजर चली गयी और आपसे शेयर कर रहा हूँ, यदी कहीं से भी कविता आपकी आत्मा को छूती हो तो उन्हें ९८७१६९१३१३ पर काल कर हाल चाल जान लें और कविता के बधाई भी दे दें. )

2 comments:

Mired Mirage said...

कविता अच्छी है परन्तु वही पुराना प्रश्न अनुत्तरित छोड़ जाती है कि यह सब अयोध्या ही क्यों पूछता है ? क्यों नहीं विश्व के अन्य शहर जहाँ हमें जाने की अनुमति भी नहीं है या जिन्हें अन्य धर्मों के पूजास्थल तोड़ने का कोई मलाल नहीं है ? या जिन देशों में मुझे अपने भगवान या अपने धर्म की पुस्तक भी ले जाने की अनुमति नहीं है? क्या यह सारी आत्मा भारत के हिस्से ही आती है ?
घुघूती बासूती

विनीत उत्पल said...

घुघूती बासूती जी,
यह भारत है। सपनो मी रहना लोगों को खूब आता है। खबरों की दुनिया है। बचपन में भेरिया धसान के बारे में सुना था। वही हाल आज भी हमारे समाज का है।