1/28/2008

मैंने जिस कमलेश्वर को जाना...



जामिया से मास मीडिया की डिग्री लेने, हिंदुस्तान टाईम्स और हिंदुस्तान में इन्टर्नशिप करने के बाद मैंने सेंटर फार पीस एंड कोंफ्लिक्ट रीजोल्युशन में एडमीशन ले लिया था। सेंटर की ओर से दो दिनों का एक कांफ्रेंस आयोजित किया गया था। सेंटर के पहले बीस छात्रों में शामिल होने के कारण सभी काम हमारे ही जिम्मे था।
कांफ्रेंस के दूसरे दिन कमलेश्वरजी को एक सत्र की अध्यक्षता करनी थी। और भी कई वक्ता थे। जम कर शांति और दंगे पर चर्चा हुई। कमलेश्वरजी भी बाबरी ढांचे और अपनी नौकरी के अनुभवों को बांटा। पूरे देश के अलावा बाहरी देशों के प्रतिनिधि हाल में मौजूद थे।

सत्र ख़त्म होने के बाद सेंटर के निदेशक साजिद सर ने कमलेश्वरजी से व्यक्तिगत तौर पर मेरा परिचय कराया। उन्होंने मेरा नाम सुनते ही कहा, तुम वही विनीत तो नहीं, जिसने कुछ माह पूर्व गीतकार शैलेन्द्र पर हिंदुस्तान के सम्पादकीय पर लेख लिखा था। मैंने जैसे ही हामी भरी, उन्होंने आव देखा न ताव, सामने खडे फोटोग्राफर से कहा, भाई, विनीत के साथ मेरा अच्छा सा फोटो खींचो। वह उस समय काफी की चुस्की का आनंद उठा रहे थे।

मैंने कहा, सर कोई बात नही, आप काफी पीते रहें, फोटो खीच जाएगा। उन्होंने थोडी सख्ती बरतते हुवे कहा, भले ही विनीत को अपनी तस्वीर पसंद नही हो, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं किसके साथ फोटो खीचा रहा हूँ और फोटोग्राफर से एक फोटो अपने घर पर भेजने का आदेश दिया। मैं पूरे समय हक्का-बक्का रहा। कहाँ मैं, कहाँ कमलेश्वर। तत्काल मुझे याद आ रहा था कि लेख लिखने के दौरान मुझे पढ़ने को मिला था कि जब गीतकार शैलेन्द्र का निधन हुआ था, तो कमलेश्वरजी उनके घर से लेकर अन्तिम संस्कार तक मौजूद रहे थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी।

कार् में बैठते ही जहाँ उन्होने घर पर आने का निमंत्रण दिया, वही जम कर पढाई करने की सलाह दी। उन की कर में सिर्फ बैठने की जगह थी और पूरे कार में किताबें भरी पडी थी।

यह तो थी पहली मुलाक़ात।

जब मैं दिल्ली में हिंदुस्तान को अपनी सेवा दे रहा था, तो एन सी आर डेस्क से मुझे फरीदाबाद रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया था। उस वक्त डेस्क प्रमुख इरा झा थीं। उन्होने कहा था कि जब तुम्हें मौका मिले या शख्सियत कालम शुरू करना तो पहले कमलेश्वरजी का इंटरव्यू करना।
हिंदुस्तान एन सी आर का चार पेज यानी पूल आउट नॉएडा, फरीदाबाद, गुडगाँव और गाजियाबाद का शुरू हुआ तो मैंने कालम शख्सियत के लिए दो बार उनसे बात की। उन्होने हर बार कहा, घर आ जाओ तो बैठ कर जम कर बात करेंगे। लेकिन फ़िलहाल छाती में कुछ समस्या है, डाक्टर को दिखा दूँ और आराम हो जाये तो फिर जमकर बात होगी। एक -दो दिन की तो बात है।

संयोग वश २३ जनवरी,2007 से पूल आउट शुरू हो गया। आनन- फानन में मुझे मुम्बई फोन कर सोनू निगम के इंटरव्यू से कलाम शुरू करना पड़ा। फिर भी मन में विचार था कि पहले हफ्ते में ही कमलेश्वरजी का इंटरव्यू लूँगा।
पर , वह २७ जनवरी की रात थी। फरीदाबाद के मेरे बास राजू सजवान मुझे घर छोड़ते हुवे रात के करीब १०.३० बजे चले गए। ११ बजे के आस-पास उनका फोन आया, क्या तुम्हें कुछ जानकारी है, मैंने पूछा, क्या और किस बारे में। उन्होने कहा शायद कमलेश्वरजी का देहांत हो गया है, लेकिन कोंफ्र्म नही हो रहा है। मेरी फोन डायरी दफ्तर में थी। उनके घर का नम्बर उसी में था।
जारी....

3 comments:

Sanjeet Tripathi said...

आपके जाने कमलेश्वर को हम भी जान रहे हैं, अगले किश्त की प्रतीक्षा रहेगी।

इरा झा बोले तो वही न जो रायपुर में भी पदस्थ थीं?

anitakumar said...

कमलेश्वर जी नही रहे जान कर बहुत दुख हुआ, वो हमारे भी प्रिय साहित्यकारूं में से एक थे। मेरे कॉलेज के जमाने में टी वी पर उनका एक कार्यक्रम आता थे 'परिक्रमा' , मजाल है कि हम वो कार्यक्रम न देखें। मुझे याद है कि एक बार वो हमारे कॉलेज में मुख्य अतिथी के रूप में आये थे। उनको रु ब रु देखने और सुनने की लालसा लिए हम कॉलेज जा रहे थे लोकल ट्रेन में, ट्रेन शुरु हुई तो पता चला कि हम गलत ट्रेन में बैठे हैं, अगले स्टेशन पर उतर कर ट्रेन बदल सकते थे, पर उस हाल में दस मिनिट लेट होने का भय था सो चलती ट्रेन से कूद गये कि कहीं कमलेश्वर जी का एक शब्द भी मिस न हो जाय्…।:)

anitakumar said...

अब अगर कमलेशवर जी आप से इतने प्रभावित थे कि आप के साथ फ़ोटो खिचाने के लिए खुद आग्रह कर रहे थे तो आप के ब्लोग को भी नियमित पढ़ेगें।