1/30/2008

गांधी, तू आकर देख

गांधी, तू आकर देख

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश

पग-पग फैला भ्रष्टाचार
होता केवल यहाँ अत्याचार
नित्य यहाँ होता बलात्कार
जनता में मची हाहाकार

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

जनता है यहाँ भूखे-नंगे
नेता जमकर करते वायदे
यहाँ न कोई कानून-कायदे
सब सोचते अपने फायदे

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

यहाँ होते रोज घोटाले
राज करते बीवी साले
किसी के मन पर न होते ताले
दिन-रात खनकती शराब के प्याले

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

शाम ढलते सूनी होती गलियां
सड़क पर होते कुत्ते-बिल्लियाँ
नींद चुराती बंदूक की गोलियां
रोज बहती खून की नदियाँ

गांधी, तू आकर देख
कैसा है तेरे सपनों का देश।

(यह कविता २६ जुलाई १९९९ को भागलपुर में रहने के दौरान लिखी गयी थी.)

2 comments:

Sanjeet Tripathi said...

वाकई एक सटीक कविता!

mehek said...

gandhiji ke sapno ke viparit hai unka desh aaj,bahut sahi likha hai.