2/05/2008

हिन्दी जगत ब्राहमणवाद से पीड़ित

हिन्दी जगत ब्राहमणवाद से पीड़ित

पहले
रवीश भाई और अब तीन फरवरी को अमर उजाला ने रविवार पत्रिका में साहित्यकार और गीतकार पर जोरदार बहस चलायी है। मोहल्ले में अविनाश जी ने भी इसे छापा। पूरा हिन्दी जगत ब्राहमण वाद से पीड़ित है। छुआछूत का हर तरफ बोलबाला है।


यदि हिन्दी जगत और विश्व विद्यालय या स्कूल के कोर्सों के ओर नजर डालें, तो अधिकतर संस्थानों में सालों दर साल से वही घिसा हुआ स्लेबस पढाया जा रहा है। कोई इससे आगे सोचने वाला नहीं। जो खुद छात्र जीवन में पढा और वही प्रोफेसर बनने के बाद पढाया। वही जिन्दगी और फिर वही kahanee. । हिन्दी साहित्य के लोग जितना बड़बोलेपन का शिकार हो लेकिन हकीकत यही है की एक कदम भी न तो आगे बढ़ती है और न ही नया कुछ सोचा जा रहा है।

क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है, अंगरेजी में आक्सफोर्ड अपने शब्द भंडार में हर साल कुछ न कुछ शब्द जोर कर लोगों को जानकारी देती है, लेकिन हिन्दी में कहाँ। आज के दौर में कितने हिन्दी के पैरोकारों इंटरनेट, की- बोर्ड से संबंध है। सिर्फ गिनने लायक. हिन्दी साहित्य अकादमी कुछ पुरस्कार, कुछ किताब छाप कर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर डालती है।

कहा जाता है, vahee संस्कृति और सभ्यता जीवित रहती hai जो नए को उसी तरह अपनाती हैं जिस तरह पुराने को इज्जत देती है। लेकिन हिन्दी भाषा और साहित्य की ओर नजर डालें तो बस गटर के मेढक की भांति टर्र-टर्र कर, उसे ही पूरी दुनिया मानते हैं और मस्त रहते हैं। पूरा हिन्दी जगत ब्राहमण वाद से पीड़ित है। छुआछूत का हर तरफ बोलबाला है।

जब इन हिन्दी साहित्यकारों के घर में चूल्हा जलना भी मुश्किल हुआ तो सीधे गीतकार बनने चल दिए। चाहे प्रेमचंद हों यह शैलेन्द्र।यह अलग बात है, निदा फाजली, गुलजार इसके अपवाद हैं। और तो और अमर उजाला में जिस तरह उदय प्रकाश ने दोनो विधा को साइंटिस्ट और मैकेनिकल में बाँट बरगलाने की कोशिश की है, यह सही नही है। आप नए को स्वीकार नही कर पा रहे हैं, तो कम से कम एक नयी दिशा तो दे ही सकते है।

क्यों हिन्दी साहित्य नए को स्वीकार नही करता है। हरशंकर परसाई के लेखन को कितने सालों के बाद साहित्य में स्थान मिलने लगा। तथाकथित साहित्य अपना दायरा क्यों सीमित कर रखा है, मंचीय कविता को अपने में शामिल नही कर पाया है। फिल्म के लिए गीतों को क्यों नही साहित्य में शामिल किया गया है, जबकि वह कही रोड छाप साहित्यकारों से कहीं अधिक दिलों के पास होते हैं।

सवाल कई हैं। समय आ गया है, जब साहित्य के पैरोकारों को आपनी सोच का दायरा संकुचित करने के बजाय आगे ले जाना होगा। साहित्य के दूसरे पहलुओं को बाँहों में समेटना होगा, जिसे सौतेला छोड़ रखा है। फिर भी लोग सौतेले के साथ भी इतना बुरा व्यवहार नही करते।

1 comment:

दिलीप मंडल said...

हिदी का ब्राह्मणवाद जाति निरपेक्ष है। ब्राह्मणवाद को अगर जातिवाद का समानार्थी मानें तो ये बींमारी सभी जातियों में है। आपको किस विश्वविद्यालय में नौकरी मिलेगी ये जातिवाद और चेलावाद से ही तय होना है। और ऐसा करने वाले सिर्फ ब्राह्मण नहीं हैं। ये जरूर है कि सवर्ण जातियों को ऐसा अनाचार करने का मौका ज्यादा मिला है और इसके ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारण हैं।

इतना तय है कि ऐसे लोग हिंदी के दुश्मन हैं, समाज के भी दुश्मन हैं और दरअसल खुद के दोस्त भी नहीं है। उनका वश चले तो वो संस्कृत की तरह हिंदी की भी हत्या कर देंगे। पवित्र और शुद्ध बनाकर मार डालेंगे। हमारा सौभाग्य है कि पूरे हिंदी संसार के वो 5 परसेंट के भी मालिक नहीं हैं। सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग मिलकर सालभर में जितनी नौकरी देते हैं, उतनी और उससे ज्यादा मालदार नौकरियां हिंदी के बाकी क्षेत्रों में हर दिन मिलती हैं। जाति को इन जगहों में पूछा नहीं जाता, ऐसा तो नहीं है। लेकिन यहां विविधता ज्यादा नजर आ रही है।

हिंदी अब मीडियाकर्मियों, विज्ञापन बनाने वालों, मनोरंजन व्यवसाय से जुड़े लोगों के हाथों में है और पहले से ज्यादा सुरक्षित है। हिंदी की इतनी अच्छी स्थिति कभी नहीं थी। तो जश्न मनाइए हिंदी में ब्राह्णणवाद की मौत का और जश्न मनाइए हिंदी के आजाद होने का।