2/05/2008

क्यों, साहित्यकारों की रजाई खींच रहे हो



क्यों, साहित्यकारों की रजाई खींच रहे हो



उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ से ताल्लुकात रखने वाले पत्रकार वैभव पाण्डेय की सोच और लेखन हिन्दी के साहित्यकारों के लिए करारा तमाचा है। बेबाक बोलने और लिखने वाले वैभव का मानना है की फिल्मी दुनिया में जो गीतकार बेहतर लेखन कर रहे हैं, उन्हें साहित्यकार मानने में कोई बुराई नही है। पर उन्हें साहित्यकारों पर तरस आता है.... विनीत

चाहे रवीश कुमार की बात हो या अमर उजाला में छपी बयानबाजी। फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद मौजूदा दौर में कुछ प्रतिभाशाली गीतकारों को साहित्यकार मानने में क्या बुराई है। इन गीतकारों में ५० से ६० दशक के गीतकारों का प्रतिबिम्ब झलकता है। चाहे रंग दे बसन्ती से चर्चित प्रसून जोशी हों या परिणीता से लोगों के नजरों में आने वाले प्रदीप शाहनी।

आज के दौर में खास फिल्मों के गाने को सुना जाये, तो आसानी से महसूस किया जा सकता है की आधुनिक कवि कितने संवेदनशील हैं। उनके गीतों में जिन्दगी के तमाम पहलू बंधे रहते हैं। ध्यान रखिये, यहाँ 'सरकाय लियो खटिया' या 'मेरी पैंट भी सेक्सी ' जैसे दो अर्थ वाले गाने लिखने वाले गीतकारों की बात नही कर रहा हूँ। गीतकार शैलेन्द्र, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलजार और जावेद अख्तर की गौरवमयी परंपरा को बढ़ाने वाले कुछ असाधारण प्रतिभाशाली गीतकारों की चर्चा कर ध्यान में लाना चाहता हूँ। इन लोगों ने अपने गीतों के माध्यम से फिल्मों को एक नया जीवन दिया है।

बहस में शामिल उदय प्रकाश का यह कहना मन को उदास करता है की गीतकार तो मैकेनिक जैसा है, जो गाडी के खराब इंजन तो सही कर सकता है, लेकिन गति के सिधांत जैसे रते-रटाये के बारे में नही जानता। क्या सजीव काव्य कैसे लिखा जाये, इसके लिए कहीं बाकायदा 'क्लास' चलायी जाती है? क्या जितने मूर्धन्य कवि हुवे हैं, सभी ने इस क्लास में पढ़ाई की है? नही न, तो फिर इन प्रतिभाशाली गीतकारों से ऐसी आशा क्यों?

अब बात आती है यथार्थपरक गाने लिखने वाले इन गीतकारों की प्रतिभा का, तो क्यों नही इन गीतकारों को साहित्यिक पुरस्कारों की कसौटी पर कसा जाये। इसका जबाब ज्ञानेन्द्र पति की इन पंक्तियों में छुपा है, 'इन गीतकारों को तो उनकी उत्कृष्ट रचनाओं के एवज में पैसे और फिल्मफेयर अवार्ड समेत अनेक पुरस्कार मिल जाते हैं, पर हम जैसे khantee कवियों को साहित्य पुरस्कार नाम मात्र है।'

बराबर बात है, क्यों कवियों की छोटी सी रजाई (पुरस्कार रूप में ) भीषण ठंड में छीन रहे हो भाई।

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