3/08/2008

किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहें

किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहें

सिनेमा को साहित्य के अध्याय का हिस्सा बनने के औचित्य को नजर अंदाज अब नहीं किया जा सकता। जिस तरह साहित्य, पाठक के पास पहुँच कर ही वाकई साहित्य बनता है, उसी तरह सिनेमा का औचित्य दर्शकों के पास पहुँच कर ही तय होती है। सिनेमा को देखना का नजरिया होना एक काबिलियत है और विश्व विद्यालय को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

इस मामले में महाभारत सीरियल के स्क्रिप्ट लेखक राही मासूम रजा ने अपना अन्तिम व्याख्यान अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में दिया था। बकौल रजा किसी कविता का अर्थ का रास्ता कवि के मस्तिष्क से होकर पाठक के अंतर्मन में जाकर खत्म होता है। कविता का वास्तविक अर्थ तो पाठक ही देता है।

अगर कोई शेर हमें पसंद है तो इसका मतलब वही है जो हमने समझा। समय के साथ-साथ अर्थों में भी फैलाव आता है। फिल्मों में यही बात लागू होती है। सिनेमा उन लोगों तक पहुँच जाता है, जो लिखना नही जानते। भारत जैसे देश में सिनेमा की कला के महत्व को अनदेखा किया जा रहा है। वर्तमान हालात में सिनेमा की बेपनाह ताकत को नजर अंदाज नही किया जा सकता।

पाठक कविता के साथ उन पंक्तियों की तस्वीर भी दिमाग में उकेरता है। उसी तरह विश्व विद्यालयों को चाहिए की वे अपने छात्रों को तस्वीर बनाना सिखाये, जो काम फ़िल्म बखूबी करती है। बकौल रजा, सिनेमा एक ऐसा आर्ट है जो बिन्दुओं को चलती-फिरती सोती-जागती हिलती-दुलती तस्वीरों में परिवर्तित कर उन्हें समझने का काम आसान कर सकता है। शिक्षा और समझ के लिए सिनेमा एक अच्छा माध्यम हो सकता है।

जिस तरह हम साहित्य को दूसरी विधाओं में परिभाषित करते है, उसी तरह सिनेमा को भी परिभाषित करना पड़ेगा। विशेष व्याकरण और तकनीक का अध्ययन करना पड़ेगा।जिस तरह हमरे टीचर ग़ज़ल, कसीदा, कहानी या उपन्यास पढ़ना सिखाते हैं, उसी तरह सिनेमा देखना और समझना सिखाना पडेगा।

यहाँ समस्या यह है की कथित बुद्धिजीवी लोग प्रसिद्धी को बहुत घटिया समझते हैं। मगर, वह उसकी शक्ति से अनजान है। ऐसे लोग अपनी ठहरी हुयी काबिलियत के गुलाम हैं। सिनेमा का दर्शक सिनेमा से बिल्कुल अनजान है। सही दिर्स्ती कोण कला का आधार है। इसके बिना कला की रचना सम्भव नही है।

सिनेमा की असली ताकत यही है की वह कभी भी देखने वाले को नजर अंदाज नही करता। यह बात कवियों, कहानीकारों, उपन्यासकारों के बारे में नही कही जा सकती। संदेश तो वह भी देते हैं लेकिन पाठक का ख्याल किए बिना। जैसे अच्छी या बुरी ग़ज़ल होती है, अच्छा या बुरा उपन्यास होता है, उसी तरह अच्छे या बुरी फ़िल्म होती है।

जब तक लोगों खासकर नयी पीढी को अच्छी या बुरी फ़िल्म में फर्क करने के तरीके के बारे में नही बताया जायेगा, लोग छुप कर बुरी फ़िल्म देखते रहेंगे। और साथ ही साथ अच्छी फिल्मो के मुकाबले बुरी फिल्मों की संख्या बढ़ती जायेगी।

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