3/09/2008

मत मिलो अविनाश से

मत मिलो अविनाश से

मैं जब ब्लॉग पर अपनी 50 वीं पोस्ट लिख रहा हूँ तो यकायक इस पोस्ट को मोहल्ला बसाने वाले अविनाशजी के नाम और उनसे सीखने और आज ब्लॉग लिखने की धुन सवार होने की बात याद आती है। मुझे ब्लॉग के बारे में जानने और लिखने के काबिल बनाने वाले दो लोग हैं। उनमे अविनाशजी एक हैं, जिनका मैं एकलव्य की भाति शिष्य हूँ। यही कारण है की मोहल्ले में अभी तक मुझे एक प्लाट उपलब्ध नही हुआ है।


तो यहाँ बात हो रही है अविनाशजी की। उनका नाम उस दौर में सुनने को मिला जब प्रभात ख़बर दिल्ली में फ्रीलान्सिंग करता था। सर्दी का समय था। शाम ढलने को था, तभी मैं प्रभात खबर के दफ्तर के नीचे पहुंचा था। उस दौर में मैं सिर्फ़ प्रभात ख़बर के रविवार मैगजीन की कवर स्टोरी और उसके एक या दो कालम लिखता था।


तो रविवार मैगजीन का प्रभार देखने वाले से नीचे ही मुलाकात हो गयी। मैंने कहा चलो दफ्तर चलते हैं। उन्होंने कहा, नही, वहां अविनाशजी आए हैं। रंजनजी से मुलाकात करने आए हैं. मैंने पूछा, कौन अविनाश। उनका जबाब था, तुम नही जानते, प्रभात खबर, देवघर में संपादक थे और अब एनडीटीवी में हैं। इस पर मैंने कहा, चलो मिल लेते हैं, उनका जबाब था, मत मिलो अविनाश से।


बात आयी गयी हो गयी, लेकिन मैं ठहरा चिरकुट।जिस काम के लिए मन किया गया, वही काम पहले करना है। संयोग वश उस दिन शनिवार था. दिल्ली मे रहने वाले को पता होगा की मावलंकर haal के पार्क में हर शनिवार को एक बैठक होती है। उस दिन वहां से मैं भी अपने एक दोस्त के साथ वहां गया। थोड़ी देर बाद अविनाशजी भी अपने लव-लश्कर के साथ पहुंचे। बस फ़िर क्या था। एक मुलाकात हो ही गयी। परिचय का आदान प्रदान काफी बेहतर रहा, लेकिन मेरी समझ में यह नही आया की मुझे मिलने से क्यों मना किया गया।


दुसरी मुलाकात श्री राम सेंटर में हुयी। मिथिला नाटक चल रहा था। उस दौर में काफी कुछ समझने का मौका मिला। हमेशा एक सम्मान का भाव नजर आया।


इसके बात तो फोन पर बातचीत का सिलसिला jaaree है। जब कभी किसी का फोन नम्बर लेना हो या कोई नयी जानकारी लेनी हो, बस, नमस्कार के साथ वह सहायता करते hain। कभी कोई समय का ध्यान मैंने नही दिया, लेकिन उन्होंने हमेशा सहयोग दिया।


जब मैंने अपना ब्लाग शुरू किया, कई तकनीक मुझे समझ में नही आती, तो सीधे फोन लगाया और पूछ डाला। वे जहाँ कहीं होते तुरंत रास्ता बताते। कभी कोई झल्लाहट नही। लेकिन इसके बात कोई बात नही।


एक बार गांधी भवन में मुलाकात हुयी। नेपाल मामले में एक बैठक में वे भी थे। वहां से निकले तो आम दोस्त की तरह ढाबे पर चाय पीकर अलविदा कह घर की ओर चल पड़े। लेकिन जब तक साथ रहे, दुनिया भर की बार, हंसी-मजाक का दौर चला कर सभी को हंसते और गंभीर बात कर मंत मुग्ध करते रहे। आज भी बात होती है, लेकिन भी समझ में नही आया है की आख़िर मुझे क्यों कहा गया था, मत मिलो अविनाश से।

2 comments:

Anonymous said...

भाई विनीत जी, आपका अनुभव तो अच्छा रहा। लेकिन अविनाश जी इतने भी भगवान नहीं हैं। उनके दिल्ली के शुरूआती दिनों के एक दोस्त हुआ करते थे। जब अविनाश हरिवंश जी के सहायक और ओएसडी के तौर पर दिल्ली चंद्रशेखर की षष्ठिपूर्ति पर छप रही किताबों में गणेश का काम करने आए थे। लेकिन उन्हीं मित्र महोदय को वो भूल गए हैं। एक बार मिलने पर भी नहीं पहचाना।

अजित वडनेरकर said...

ज़रूरी है कि किसी की बात मानी ही जाए।
चलिए, हम कहते हैं , खूब मिलिए अविनाशजी से।