6/08/2008

किसे भूलूं किसे याद करूँ

जिन्दगी चलती रहती है। कभी उतार तो कभी चढाव रहना लाजमी ही है। कभी सुख का आनंद तो साथ ही दुःख पाना तो लगा रहता है। कभी घर में बैठ आराम फरमाते हैं तो घुम्म्कड़ बने रहने का आनंद कुछ और ही है। मौका मिला तो जम कर काम किया, नही तो बस यूं ही दिन ढल गया और रात बीत गयी।

कैसे आया ब्लाग की दुनिया में

नौ जून को ब्लाग की दुनिया में एक साला जीव हो गया हूँ। जब वक्त मिला जम कर लिखा नही तो गायब रहा। लेकिन मौका मिला तो अनुभव और लेखन को जम कर धार दी। आज याद आता है की मैंने किस तरह ब्लाग की दुनिया में आया और क्या पाया क्या खोया।

हिंदुस्तान में काम करने के दौरान बना बलागर

आज से एक साल पहले मैं दैनिक हिंदुस्तान में कार्यरत था, वह भी फरीदाबाद में। रिपोर्टिंग करता था। बौस थे राजू सजवान, जिन्होंने मुझे रिपोर्टिंग की बारीकियाँ बताई। जम कर रिपोर्टिंग की। बारह-तेरह बीट थे मेरे पास। सुबह से शाम तक बस जेहन में रिपोर्टिंग ही था। उसी दौर में हिन्दी ब्लाग का बाजार गर्म हो रहा था। मुझे जानकारी नही थी। राजूजी को साहित्य में रूचि थी। नयी-नयी जानकारी इकट्ठा करना और बांटना उनका शौक रहा है, लेकिन शर्त, सामने वाला जानने को उत्सुक हो।

किसने ब्लाग से रुबरु कराया

पहले उन्होंने ब्लाग बनाने की बात सोची। मैंने भी उन्हें उकसाया और कहा मुझे भी सिखाएं। कुछ सिखाया और कुछ मैंने ख़ुद से सीखी। संयोगवश जून के पहले सप्ताह में वे घर चले गए। मुझे मौका मिल गया और कोशिश की उनके लौटने से पहले अपना ब्लाग पूरी तरह तैयार कर लूँ और उन्हें चौका दूँ। बस यही हुआ।

मोहल्ले के अविनाश न होते तो

कुछ दिक्कतें हुयी तो तुरत मोहल्ले के अविनाश याद आए। गाहे-बगाहे फोन लगाया और तुरत दिक्कत की चर्चा की. कुछ ही सेकेंड में समस्या का समाधान। न तो मैंने कभी सोचा की उन्हें अभी फोन करू या नही और न ही उन्होंने कभी कहा की अभी व्यस्त हूँ। इस ब्लाग के एक साल पूरा होने में उनके योगदान को नही भुलाया जा सकता है।

कब लिखा कैसे लिखा

हिंदुस्तान में काम करने के दौरान लिखता रहा, लेकिन सीमित तौर पर। हमारे हिंदुस्तान के कुछ सहयोगी को मेरी रिपोर्टिंग और ब्लाग का काम पसंद नही आया। नए बौस के कान में शिकायते की। अपने जब बेगाने हो जाते हैं तो शिकायत किस से। हिंदुस्तान के उस सहयोगी ने मुझे जमकर परेशान किया। मैं माफ़ करता गया, यह सोच कर की जब समझ आयेगी, समझेगी। आखिरकार अक्तूबर में मैं बिना कोई गिला-शिकवा के हिंदुस्तान की नौकरी छोड़ अपने दोस्त से अलग होने का निश्चय किया। उस दौर में भी ब्लाग लिखता रहा।

जब जम कर लिखा

हिंदुस्तान छोड़ने के बाद आगरा चला गया और दुसरे दिन ही अकिंचन भारत में अपनी सेवा देने लगा। नया अख़बार था, जम कर काम किया। जम कर ब्लाग पर लिखा। आगरा में रहकर सबसे अधिक पोस्ट लिखी। कुछ ने हौसला बढाया, टिप्पणी लिखकर, कुछ ने गलियां भी दी बेनाम होकर। मैं मस्त होकर लिखता। देश के कोने-कोने में रहने वाले लोगों से ब्लाग के मध्यम से दोस्ती हुयी।

कुछ खट्टी कुछ मीठी

एक साल के सफरनामे में अनिता कुमार से हुयी चैट को प्रकाशित कर टेंशन मोल लिया। अलोक पुराणिक को लेकर लिखी पोस्ट को हटाना पड़ा। फ्रेंडशिप दिवस पर लिखी पोस्ट से कुछ लोगों से बहस हुयी, कुछ से बोलचाल अभी भी बंद है। बेटी के ब्लाग के जरिये बहन के बिछुड़ने के दर्द लेख पर टिप्पणी से मन रमा की लोग मेरा ब्लाग पढ़ते हैं। पहली बार अविनाशजी ने टिप्पणी की।

फिलहाल ब्लाग का सफर जारी है। किसे भूलूं किसे याद करू, अहम् सवाल है। जो मेरे ब्लाग पर आए उनका शुक्रगुजार हूँ, जो नही आए उनका भी।

8 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

बहुत-बहुत बधाई

उन्मुक्त said...

साल पूरा करने की बधाई।

अभिषेक ओझा said...

बधाई हो ! लिखते रहे... विवाद तो पत्रकारों के जीवन का हिस्सा होना चाहिए -)

Udan Tashtari said...

एक साल पूरा होने की बधाई. खट्टॆ मीठे अनुभव तो आते ही रहेंगे सफर में-आपको नियमित लेखन की शुभकामनाऐं.

archana rajhans said...

बढ़िया है विनीत...लिखते रहो....

अर्चना said...

बढ़िया है विनीत....लिखते रहो...

archana rajhans said...

बढ़िया है विनीत...लिखते रहो....

VAIBHAVA PANDEY said...

LEGE REHO VINEET BHAI......BAHUT AAGE JAOGE......