9/27/2008

धन्यवाद अफलातून भाई, मुस्लिम नौजवान जरूर ध्यान देंगे

आज अफलातून ने ऑरकुट पर एक संदेश भेजा है। आतंकवाद को लेकर काफी गंभीर बातें कही गयी है। ऐसे परिवेश में किसे क्या करना चाहिए और हमारा कदम क्या हो, इस पर सटीक विश्लेषण किया गया है। मुसलिम नौजवानों-’भागो मत , दुनिया को बदलो !’

लेख की कुछ पंक्तियाँ यहाँ है :-

आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई राजनैतिक नहीं होनी चाहिए । मुख्यधारा की राजनीति की कमियों और कुछ नेताओं के अललटप्पू बयानों के कारण उनके दिमाग में यह ग़लतफ़हमी है । ‘दिल्ली के जामिया नगर में हुई पुलिस मुठभेड़ फर्जी थी ‘ कई मुस्लिम समूह और मानवाधिकार संगठन यह मान रहे हैं । इस सन्दर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति रामभूषण मल्होत्रा द्वारा दिया गया एक फैसला महत्वपूर्ण है। रामभूषणजी नहीं चाहते कि उनके नाम के आगे न्यायमूर्ति लगाया जाए । चूँकि यह उनके द्वारा दिए गए फैसले की बात है इसलिए ‘न्यायमूर्ति’ लगाना उचित है। अपने फैसले हिन्दी में देने के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा। उक्त फैसले में कहा गया था कि जब भी पुलिस ‘मुठभेड़’ का दावा करती है उन मामलों में (१) मृतकों के परिवार को पुलिस द्वारा सूचना दी जाएगी तथा (२) ऐसे सभी मामलों की मजिस्टरी जाँच होगी । यदि यह घटना जामिया नगर की जगह नोएडा में होती तो इन दोनों बातों को खुद-ब-खुद लागू करना होता।घटना की जाँच की माँग एक अत्यन्त साधारण माँग है तथा पूरी पारदर्शिता के साथ इसे पूरा किया जाना चाहिए ।
इन मानवाधिकार संगठनों और मुस्लिम समूहों से भी हम रू-ब-रू होना चाहते हैं । इतनी गम्भीर परिस्थिति में बस इतना संकुचित रह कर काम नहीं चलेगा । आतंकी घटनाओ और उसके तार देश के भीतर से जुड़े़ होने की बात पहली बार खुल के हो रही है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत के तमाम अमनपसंद मुसलमानों को भुगतना पड़ रहा है । इन घटनाओं के बाद संकीर्ण सोच वाले साम्प्रदायिक समूह हर मुसलमान को गद्दार बताने का अभियान शुरु कर चुके हैं, आगामी लोकसभा निर्वाचन में वोटों के ध्रुवीकरण की गलतफहमी भी वे पाले हुए हैं । आतंकवाद से मुकाबले की नाम पर क्लोज़ सर्किट टेवि जैसे करोड़ों के उपकरण खरीदें जायेंगे और इज़राइली गुप्त पुलिस ‘मसाद’ से तालीम दिलवाई जाएगी । कैनाडा और अमेरिका मे रहने वाले अनिवासी भारतीयों से पूछिए कि पैसे कि ताकत पर कैसे यहूदी लॉबी नीति निर्धारण में हस्तक्षेप करती है ? इन सब से गम्भीर और नुकसानदेह बात यह है कि मेधावी तरुण यदि ‘आतंक’ में ग्लैमर देखने लगें तो उन्हें उस दिशा से रोकने और अन्याय की तमाम घटनाओं के विरुद्ध राजनैतिक संघर्ष से जोड़ने का काम कौन करेगा ? यह काम मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ा कोई खेमा शायद नहीं करेगा।
एक मुस्लिम महिला पत्रकार और कवयित्री ने अपने चिट्ठे पर लिखा , ‘कि दिल्ली का बम काण्ड करने वाले जरूर हिन्दू रहे होंगे’। अत्यन्त सिधाई से उन्होंने यह बात कह दी। मैंने यह देखा है कि शुद्ध असुरक्षा की भावना से ऐसी बातें दिमाग में आती हैं ।‘काम गलत है, इसलिए जरूर हमारे समूह का व्यक्ति न रहा होगा’ - यह मन में आता होगा । राष्ट्रीय एकता परिषद , सर्वोच्च न्यायालय और संसद के सामने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की कसमे खाने वाली जमात ने जब उस कसम को पैरों तले मसलने में अपना राष्ट्रवाद दिखाया तब किसी हिन्दू के दिमाग में क्या यह बात आई होगी कि जरूर यह काम हमारे समूह से अलग लोगों ने किया होगा ? जिन्हें लगता है कि "वह काम सही था और इसीलिए हमारे समूह ने किया" - उन राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवादियों से हमे कुछ नहीं कहना , उनके खतरनाक मंसूबों के खिलाफ़ लड़ना जरूर है ।
मैंने आतिफ़ का ऑर्कुट का पन्ना पढ़ा है जिसमें वह फक्र के साथ एक फेहरिस्त देता है कि किन शक्सियतों के आजमगढ़ से वह ताल्लुक रख़ता है - ……. राहुल सांकृत्यायन , कैफ़ी आज़मी । चार लोगों को जिन्दा जमीन में गाड़ देने वाले भाजपा नेता (पहले सपा और बसपा में रहा है) रमाकान्त यादव या भारत की सियासत के सबसे घृणित दलाल अमर सिंह का नाम नहीं लिखता ! ऐसा कोई तरुण घृणित , अक्षम्य आतंकी कार्रवाई से जुड़ता है , उन कार्रवाइयों की तस्वीरें उतारता है तो निश्चित तौर पर इसकी जिम्मेदारी मैं खुद पर भी लेता हूँ । अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का तरीका आतंकवाद नहीं है । आजमगढ़ के शंकर तिराहे के आगे , मऊ वाली सड़क पर प्रसिद्ध पहलवान स्व. सुखदेव यादव के भान्जे के मकान में समाजवादी जनपरिषद के दफ़्तर के उद्घाटन के मौके पर आजमगढ़ के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और फोटोग्राफर दता ने राहुलजी का लिखा गीत दहाड़ कर गाया था - ‘ भागो मत ,दुनिया को बदलो ! मत भागो , दुनिया को बदलो ‘ । आजमगढ़ के तरुणों से यही गुजारिश है ।

3 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@एक मुस्लिम महिला पत्रकार और कवयित्री ने अपने चिट्ठे पर लिखा , ‘कि दिल्ली का बम काण्ड करने वाले जरूर हिन्दू रहे होंगे’।

शायद ये वही कवयित्री हैं जिन्होंने हताशा में यह कविता कर डाली है:url:>( (http://firdausdiary.blogspot.com/2008/09/blog-post_1496.html)

मार दो गोली, हिन्द के तमाम मुसलमानों को

यह कथित मुस्लिम बुद्धिजीवियों का घिनौना चेहरा है। इसे बेनकाब करना बहुत जरूरी है। नहीं तो मुसलिम नौजवानों-’भागो मत , दुनिया को बदलो ! की अपील सुनने वाला कोई नहीं बचेगा।

Suresh Chiplunkar said...

क्या कहना चाहते हैं समझ नहीं आया, पूरी पोस्ट ही तो जस की तस रख दी आपने, अपनी तरफ़ से नया क्या लिखा है? अफ़लातून जी को बधाई देना चाहते थे तो उनके ब्लॉग पर भी दे सकते थे…

Anonymous said...

Orkut में जाकर आतिफ़ अमीन की प्रोफाइल देख लेते तो शायद उल्टा पुल्टा नहीं छापते। बताओ कि कहां लिखा है आजमगढ़ की मूर्धन्य हस्तियों का नाम? सांप्रदायिकता से लड़ने का मतलब यह नहीं कि बिना जांचे परखे मासूम आतंकवादी कह मारें। फिर से देखो भैया और कहो। मेरा मतलब यह कतई नहीं है कि मुसलमान आतंकी है मगर इतना कहूंगा कि कोई मुस्लिम देश लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं बना पाया है। अब तो तुर्की में तक बंटाधार कर रखा है। दरअसल, हिन्दुस्तान में आप जैसे लोगों की वजह से हिन्दू राष्ट्र नहीं बना है। जो अच्छी बात है किंतु इस्लामी राष्ट्र में बुद्धीजीवियों के लिए कोई जगह नहीं है। अच्छा होगा कि उन्हें लताड़ो जिनकी चुप्पी या मौन की वजह से तालीबान हावी हो रहे हैं। हिन्दुस्तान के परिप्रेक्ष्य में आपकी भूमिका सराहनीय है जो मैंस्वीकारता हूं।