10/31/2008

देवानंद की नजर में इंदिरा गांधी

देवानंद की नजर में इंदिरा गांधी
इंदिरा गांधी का गूंगी गुडिय़ा से आयरन लेडी बनकर उभरना भारतीय राजनीति का एक अहम अध्याय रहा है। आज से 24 साल पहले उनके ही अंगरक्षकों ने उन्हें गोली मारकर मौत के आगोश में सुला दिया था। सदाबहार अभिनेता देवानंद ने अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' में उन्हें बखूबी याद किया है।
इंदिरा गांधी की मृत्यु की बात को अपनी आत्मकथा 'रोमांसिंग विद लाइफ' के 57वें अध्याय में समेटते हुए देवानंद लिखते हैं कि फिल्म की शूटिंग समाप्त ही किया था कि समाचार मिला, इंदिरा गांधी को सिख अंगरक्षकों ने गोली मार दी है। पूरा देश स्तब्ध था। मैं मन ही मन बुदबुदाया, 'इंदिरा गांधी एक धार्मिसमुदाय की भावनाओं के गुस्से का शिकार हुई है। मेरे सामने उनकी सारी छवि उमडऩे-घुमडऩे लगीं।
पहली बार देवानंद की इंदिरा से मुलाकात उनके पिता जवाहर लाल नेहरू के आवास तीनमूर्ति में हुई थी। फिल्म इंडस्ट्री ने उस वक्त नई दिल्ली में एक चैरिटी शो का आयोजन किया था। इससे आने वाले फंड को प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा किया जाना था और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी इस मौके पर मौजूद थे। यही वह मौका था जब लता मंगेशकर ने 'ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी' गाया था और नेहरूजी रो पडे थे। वे कहते हैं कि इस कार्यक्रम के बाद मुझे, दिलीप कुमार और राजकपूर को तीनमूर्ति भवन में प्रधानमंत्री से मुलाकात की बात थी। वहां पर आतिथ्य के लिए इंदिरा गांधी मौजूद थीं। यह उनके साथ मेरी पहली मुलाकात थी। वह अल्पभाषी और संकोची थीं। वह कम बोलती थीं लेकिन काफी सभ्य थीं। उसने स्पेशल चाय के द्वारा हमारा स्वागत किया।
देवानंद अपनी आत्मकथा के विभिन्न पृष्ठों पर इंदिरा गांधी को याद कर लिखते हैं, 'पंडितजी की मृत्यु पर मैंने इंदिरा गांधी को टेलीग्राम से संवेदना भेजी थी। फिल्म 'गाइड' के रिलीज के क्रम में फिर इंदिरा गांधी से मुलाकात करने का मौका मिला। कुछ विरोधियों ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को गुमनाम पत्र भेजकर इस फिल्म को क्लीयरेंस सर्टिफिकेट न देने का मुहिम चलाया। सरकारी दफ्तर नई दिल्ली में था और फिल्म पर अश्लीलता का आरोप था। मैंने इस मामले में इंदिरा गांधी से संपर्क किया कि वह इस फिल्म को देखकर फैसला करें। वह उस वक्त नई-नई सूचना और प्रसारण मंत्री बनी थीं। उन्होंने अपने लिए फिल्म की स्क्रीनिंग नई दिल्ली में कराने की बात कही। स्क्रीनिंग के मौके पर वह अपने खास मित्रों के साथ बैठी रहीं और उन्हें इससे कोई खास फर्क नहीं था कि उनके बीच मैं भी हूं।
मैं आगे की पंक्ति में बैठा था जबकि वह चुपचाप काफी पीछे बैठी थी। जैसे ही फिल्म खत्म हुई मैंने पीछे मुड़कर उनकी ओर देखा। उन्होंने बस इतना ही कहा, 'आप काफी तेज बोलते हैं।' इस पर मैंने कहा, 'हां, मैं बोलता हूं। इससे गुस्सा तो नहीं आया।' 'नहीं, यह बढिय़ा है। हमलोग मंत्रालय के द्वारा क्लीयरेंस लेटर भेज देंगे', इंदिरा का जबाव था। इस मौके पर मैंने मनोहर मालगोकर की प्रसिद्ध उपन्यास 'दी प्रिंस गिफ्ट' किया था।
देवानंद लिखते हैं, 'वह फिल्मी दुनिया की समस्याओं को सुनती थी लेकिन बोलती काफी कम थीं। जितनी बार मैं मिला हर बार मैं उन्हें वक्ता की अपेक्षा अधिक श्रोता पाया।' वे याद करते हुए कहते हैं कि एबार सरोजनी नायडू के भाई हरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय के साथ उनसे मुलाकात हुई थी जब हमलोग पंडित नेहरू से मिलने प्रधानमंत्री आवास गए थे। लेकिन हमें अपनी बैठक इंदिरा गांधी से कर लौटना पड़ा था। वे उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि नई दिल्ली में एक बार अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित किया गया था, जिसमें उन्हें आमंत्रित करने गया था। उन्होंने बस इतना ही कहा था कि मैं आने की कोशिश करूंगी। लेकिन वह नहीं आ सकीं थीं। एक बार उनके बहुत करीबी दोस्त के साथ आधे घंटे से अधिक समय तक मुलाकात की थी। बिना किसी सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया के वह हमारी बातें सुनती रही थीं।
बहरहाल, इंदिरा गांधी के व्यक्तिगत यादों सहित उनके कामकाज को लेकर देवानंद अपनी आत्मकथा में कई स्थानों पर विस्तार से चर्चा की है। उन्हें यह बात काफी आश्चर्य लगती है कि एक गूंगी गुडिय़ा किस तरह देश की सबसे ताकतवर नेता के तौर पर उभरी। हालांकि वह हमेशा अल्पभाषी और संकोची ही रहीं।

1 comment:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

देवानंद की यादों में इंदिरा गांधी को पढ़कर अच्छा लगा।
शुक्रिया जानकारी बढ़ाने के लिए और हो सके तो इस किताब के कुछ अंशो से रू बरू करवाएं।