11/02/2008

आसान नहीं धुएं के छल्ले को रोकना

आसान नहीं धुएं के छल्ले को रोकना

विनीत उत्पल

सरकार ने बृहस्पतिवार से सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगा दिया है। नए कानून का उल्लंघन करने वालों सहित परिसर के मालिक को भी दंड दिए जाने का प्रावधान है। सरकार द्वारा मई में लिये गए इस फैसले को लागू किए जाने के बाद अब लोग ऑडिटोरियम, अस्पताल भवनों, स्वास्थ्य संस्थानों, मनोरंजन केंद्र, कोर्ट परिसर, शैक्षिक संस्थानों, पुस्तकालयों, स्टेडियम, रेलवे स्टेशनों, बस स्टाप, काफी हाउस जैसे स्थलों पर सिगरेट के धुएं के छल्ले नहीं उड़ा पाएंगे। लेकिन यह फैसला कितना कारगर हो पाएगा, इसमें संदेह है। एक आ॓र जहां सरकार विभिन्न तम्बाकू उत्पादों के सार्वजनिक तौर से सेवन करने पर प्रतिबंध लगा रही है, वहीं राजस्व देने वाले इसके उत्पादन को रोकने के लिए कदम नहीं उठा रही है।

जिस देश में तम्बाकू का इस्तेमाल करने वालों की तादाद बढ़ रही हो, करीब 57 फीसद पुरूष और 11 फीसद महिलाएं तम्बाकू को अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल कर रहे हों, ऐसे में प्रतिबंध के कारगर साबित होने पर सवाल उठना लाजिमी है। ‘ग्लोबल यूथ टोबैको सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, 13 से 15 साल तक के उम्र के करीब 14 फीसद बच्चे तम्बाकू का सेवन करते हैं। इनमें तम्बाकू चबाने वाले अधिक हैं। सर्वे के मुताबिक, देश में 15 फीसद ऐसे बच्चे हैं, जिन्होंने धूम्रपान को कभी हाथ नहीं लगाया, लेकिन अगले साल तक वे इसके आदी हो जाएंगे। सार्वजनिक स्थलों पर दूसरों के धूम्रपान करने से 40 फीसद लोग प्रभावित हैं। फरवरी, 2008 में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में 2010 से हर साल करीब एक लाख लोगों के मरने का कारण धूम्रपान होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन व इम्पावर रिपोर्ट-2007 के अनुसार, औसतन 15 बरसों में तम्बाकू के सेवन करने वालों में तिहाई से लेकर आधे लोग मौत के शिकार होंगे। इस समय विश्व में दस लोगों में एक की मौत का कारण तम्बाकू है।

जहां तक तम्बाकू सेवन पर रोक लगाने की बात है, भारत हमेशा ही वैश्विक स्तर पर अग्रणी रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के फ्रेमवर्क कनवेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (एफसीटीसी) पर भी भारत ने दस्तखत किए हैं। इसी क्रम में 18 मई, 2003 में भारत सरकार ने तम्बाकू नियंत्रण कानून बनाया। पहली बार देश में मई, 2004 से धूम्रपान को प्रतिबंधित किया गया, जिसे मई, 2005 में संशोधित किया गया। इसके तहत सार्वजनिक स्थलों में शॉपिंग मॉल और सिनेमा हॉल को शामिल किया गया। दो अक्टूबर से लागू किए गए कानून के मुताबिक, धूम्रपान न रोकने पर इनके मालिक को भी दंड दिया जाएगा। सरकार ने 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम (एनटीसीपी) लागू किया गया है। इसके तहत देश के अधिकतर जिलों को सशक्त किया जाएगा, जिस पर करीब 450 करोड़ रूपए खर्च करने की योजना है।

तमाम मामलों को देखें, तो पता चलता है कि सरकार की नीयत में तमाम विरोधाभास नजर आता है। इसकी मनोदशा दो तरह की है। एक आ॓र तम्बाकू उत्पादन करने वाली कंपनियों को प्रचार-प्रसार की खुली छूट दी गई है और बदले में भरपूर टैक्स वसूल रही है। समाचारपत्रों, चैनलों, होर्डिंगों द्वारा इसके प्रचार को रोकने पर आंख मूंदे हुए है। वहीं, आम लोगों को इसके सार्वजनिक सेवन पर दंड दे रही है। विश्व परिदृश्य पर अपनी ऐसी छवि बनाने में जुटी है कि वह तम्बाकू उत्पादों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाकर ही दम लेगी।तम्बाकू ऐसा उत्पाद है, जो अपने ग्राहकों की ही जान लेता है। इससे संबंधित कंपनियां हमेशा नए ग्राहकों को तलाशती हैं और उन्हें आकर्षित करना उसका पहला मकसद होता है। इस क्रम में कंपनियां बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार के अलावा सेलिब्रेटी को उत्पाद से जोड़ती हैं।

ऐसे में, जब तक आम आदमी इसके प्रति खुद गंभीर नहीं होगा, सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध कितना सफल हो पाएगा। यदि देश को तम्बाकू रहित करना है, लोगों को अकाल मौत से बचाना है तो इसके उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगाना होगा। सेलिब्रेटी को भी आत्मविश्लेषण करना होगा कि थोड़े से पैसे के लिए तम्बाकू उत्पाद का प्रचार-प्रसार कर वे किस तरह से देश का हित साध रहे हैं। आम लोगों को समझना होगा कि तम्बाकू या तम्बाकू उत्पाद का सेवन कर वे अपने, अपने परिवार या अपने समाज का क्या भला कर रहे हैं! सरकार को भी गंभीर होना होगा। उसे इस मामले में अपनी स्पष्ट रणनीति तय करनी होगी। जब सरकार ने 2003 से तम्बाकू उत्पाद पर प्रतिबंध लगाने पर कामकाज शुरू कर दिया था, कानून लागू किया था, तब धीरे-धीरे इस पर क्यों अमल किया जाता रहा, यह एक अहम सवाल है। सरकार को स्पष्ट रूप से अपनी मंशा जाहिर करनी चाहिए।

(यह आलेख राष्ट्रीय सहारा के सम्पादकीय पेज पर तीन अक्तूबर को छपा है )

4 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत सारे आंकडे के साथ आपने सही मुददे को उठाया गया यह आलेख पढना अच्‍छा लगा। जनता को अपने स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति जागरूक होने की जरूरत अधिक है।

Udan Tashtari said...

आभार इस आलेख को यहाँ पेश करने का.

नारदमुनि said...

jab kanun banane wale or uski raksha karne wale hee use todte hain to fir kya ummid
narayan narayan

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

हमारे यहां कानून तो बन जाते हैं लेकिन उनपर अमल नहीं होता।