1/26/2009

मिथिला की नायाब लोकशैली : भगैत

मिथिला जगत में कई ऐसे कलाकार हैं, कई ऐसी शैली है, कई ऐसे रीति- रिवाज हैं जिसे देख कर और महसूस कर न सिर्फ़ मिथिला के लोग बल्कि दूसरे इलाके के लोग दांतों तले उंगली दबाने के लिए मजबूर होते हैं। पूरी तरह खेती पर जीवन-यापन करने वाली यहाँ की विभिन्न बिरादरी की जिन्दगी खेत-खलियान और नदी-नाले से शुरू होकर यही ख़तम हो जाती है। जिसने बाहर की दुनिया देखी उल्टे मुहँ लौट कर अतीत को याद करना गवारा लगा।
ऐसे में उनके पास पेट की भूख शांत करने के लिए गेहूं तो था लेकिन मन की भूख शांत करने के लिए सेक्स के अलावा शायद ही कुछ रहा होगा। यही वो हालात थे जब सेक्स से मन भर जाने पर लोगों ने जाने-अनजाने पाप और पुण्य जैसे दो शब्दों को इजाद दिया और इसी क्रम में मिथिला में भगैत (भगत) जैसे गायन और नाट्य शैली का विकास हुआ होगा। धीरे-धीरे लोग इससे जुड़ते गए और यह सिर्फ़ मिथिला में ही नही बल्कि नेपाल और पश्चिम बंगाल में भी अपनी पैठ बना ली। हालाँकि जानकारों का मानना है की १९वीं शताब्दी से पहले मिथिला में इस पारंपरिक लोक-शैली का विकास हुआ है, बावजूद इसके, इसे लेकर कहीं भी कोई लिखित विवरण नही मिलता है।

वर्तमान दौर में भी मिथिला के गावों के लोगों का भगैत पर अटूट विश्वास है और माना जाता है की इसके आयोजन के मौके पर देवपुरुष अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होते हैं। ऐसे देवपुरुषों की संख्या करीब दो दर्जन है जिनमें धर्मराज, राजा चैयां, ज्योति, कारू महाराज, मीरा साहेब, बिसहैर, बेनी, अन्दू बाबा, गहील, हरिया डोम, बरहम, खिरहैर प्रमुख हैं। स्वच्छता और पवित्रता की इसके आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वैसे तो नाटक का मतलब वास्तविकता के भ्रम को उत्पन्न करना होता है लेकिन भगैत में इससे जुड़े लोगों को वास्तविकता का अहसास होता है। उनकी मान्यता है कि इस पर अविश्वास करने पर महापाप लगता है। इस तरह की अटूट धारणा दुनिया की मुट्ठी भर शैली या विधा में ही देखने को मिलता है। जहाँ पर भगैत होता है, उस मंडली में जो आगे-आगे गाता है उसे पंजियार या मूलगैन कहा जाता है। बाकी गायक को भगैतिया कहा जाता है। मूलगैन कहानी प्रारंभ करता है और फिर समां bandh जाता है।
भगैत के गीत, गायन और गति तेज और सुर ऊंचा होता है। हारमोनियम, ढ़ोलक, झालि, खंजरी, डुगडुगी वातावरण में रस का संचार करते हैं। भगैत के शुरू होने पर भगैतिया लोग बीच-बीच में अपने कान में उंगली डाल कर बहुत ऊंचे स्वर को साधते हैं। आयोजन के दौरान जिस व्यक्ति के शरीर में देवपुरूष का प्रवेश होता है उसे भगता कहा जाता है। गायन के क्रम में भगता के शरीर में जब देवपुरूष का प्रवेश होता है तो शरीर कंपाने लगता है और वह देवपुरूष जैसा व्यवहार करने लगता है।

भगैत की यह शैली अदभुत रूप से जाति-वर्ण से ऊपर उठकर वर्तमान दौर में भी कायम है। भगैत मंडली में सभी वर्ग, सभी धर्म और सभी जातिके लोग शामिल होते हैं। यही कारण है कि देवपुरूषओं में डोम जाति के हरिया डोम तो मुस्लिम संप्रदाय के मीरा साहेब का नाम शामिल है। भगैत गायक में मुनेश्वर यादव, नटाय पंजियार, भोलन यादव, देखी यादव, रेवती भगता, अर्जुन यादव, बेनी साह, नागो भगता, तुलसी भगता प्रमुख हैं। सबसे अहम् बात यह है कि इस पूरे कार्यक्रम के लिए कोई भी भगैत किसी भी तरह का पारिश्रमिक नही लेता।

5 comments:

अनिल कान्त : said...

बात तो बड़ी सही कही हैं आपने ....

अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

विनय said...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छा.....गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

गिरीन्द्र नाथ झा said...

विनीत भाई, भगैत पर आपकी पोस्ट को पढ़ रहा था. आपने भगैत के बारे जो कुछ लिखा है, उससे मैं पूरी तरह सहमत नही हूँ. मसलन भगैत किसी भी तरह का पारिश्रमिक नही लेता है. जबकि मेरा जो अनुभव है उसके अनुसार भगैत की मंडळी पैसे लेते हैं. क्योंकि भगैत का आयोजन अक्सर गांव के बड़े भू-पति हीं करते हैं। इसके आयोजन में अच्छा-खासा खर्च होता है। अक्सर फसल कटने के बाद हीं ऐसे आयोजन होते हैं। क्योंकि उस वक्त किसान के पास अनाज और पैसे कुछ आ ही जाते हैं।

मैं यह भी कहना चाहूँगा की पंचायात बदलने के साथ ही आप भगैत की शैली में भी अन्तर महसूस कर सकते हैं
खासकर गीत और डॉयलॉग में.आप इस सम्बन्ध में कुछ जानकारी देते तो अच्छा रहता.

गिरीन्द्र

विनीत उत्पल said...

गिरीन्द्रजी,

आपने जिन मुद्दों को उठाया है उसे लेकर मुझे इतना ही कहना है कि यदि भगैत और इससे जुड़े कार्यक्रम पर बारीक नजर डाली जाय तो आपकी बातों से सहमत हूँ की भगैत की मंडली पारिश्रमिक लेती है लेकिन साथ-साथ आपकी बातों को भी एक सिरे से खारिज भी करता हूँ। कारण कार्यक्रम के आयोजन में जो खर्च होता है मसलन पूजा का सामान, धूप-दीप, प्रसाद, पत्तल, बैठने के लिए दरी, कुर्सी, शामियाना, लाउडस्पीकर, लाइट के साथ-साथ जो मंडली आती है उनके खाने-पीने का भी इंतजाम जजमान को करना होता है। क्योंकि 'भूखे पेट होई न भजन-गोपाला' जीवन का सत्य है.

साथ ही जहाँ तक मदिरा सेवन करने की बात है जैसे आपने अपने ब्लाग में भी लिखा था तो कुछ परिवारों में जब भगैत का आयोजन होता है तो ऐसा नही होता। मसलन जिनके कुलदेवता धर्मराज हैं। हाँ, गांजा, ताडी का जमकर सेवन होता है और फ़िर मस्त होकर पूरी रात वे गाते हैं.

जहाँ तक पंचायत बदलने पर भगैत अन्तर की बात है, तो 'कोस-कोस पर बदले पानी दस कोष पर वाणी ' वाली कहावत यहाँ भी सही है। साथ ही इस बात से इंकार नही किया जा सकता कि जजमान की स्थिति देखकर भगैत का कार्यक्रम होता है। इससे इस तरह समझा जा सकता है चाहे तिरुपति हो या वैष्णो देवी आम लोग और वीवीआईपी के लिए भगवान तक पहुँचने की बात तो छोडिये उनके दर्शन तक का रास्ता भी अलग होता है।