3/19/2009

मंगलेश डबराल जबाव देंगे या अविनाश

किसी भी पुरस्कार को लेकर विवाद खड़ा करना एक अलग मामला है और यथार्थ को सामने लाना एक अलग मामला। पुरस्कार को ठुकराना भी इससे मामले के तहत है। मंगलेश डबराल का राजेन्द्र माथुर स्मृति पत्रकारिकता सम्मान को ठुकराना भले ही व्यक्तिगत मामले का नाम देकर चुप बैठ लिया जाय लेकिन मामला गंभीर है। गाहे-बगाहे इसके जरिये मंगलेश डबराल ने न सिर्फ़ अपनी बौद्धिक सोच पर सवाल खड़ा किया है बल्कि भारत की मानसिकता पर भी प्रश्न चिह्न लगाने की कोशिश की है। इस मामले में सवाल सैकडों है जिसका जबाब भलें ही मंगलेश डबराल आज ना दें लेकिन आने वाली पीढियों इस मकड़ जाल में उलझेंगी।

क्या मंगलेश डबराल इस का जबाव दे सकते हैं कि किसी भी सिद्धांत को नकारने का एक मात्र विकल्प उनके द्वारा दिए गए सम्मान को ठुकराना है। यदि सभी राज्‍य रेवड़‍ियां बांटते हैं और बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों, पत्रकारों को लाभान्वित करते हैं तो देश या किसी भी राज्य में मंगलेश डबराल की सोच या उनके सिद्धांत के समीप सोच वाली पार्टी सरकार में आयी, तो क्या उस सरकार ने रेवड़‍ियां नहीं बांटी और यदि बांटी तो उस वक्त मंगलेश डबराल क्या कर रहे थे। उन्होंने सरकार को क्या सलाह दी। और यदि उनके अनुसार, 'राजेन्द्र माथुर निश्चय ही आधुनिक हिंदी के उन बड़े पत्रकारों में थे जो ऊंचे लोकतांत्रिक मूल्यों, सम्पादकीय स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अगाध विश्वास करते थे और उनके लिए संघर्ष भी करते रहे' तो क्या राजेंद्र माथुर ने अपने से अलग सोच या सिद्धांत वाले लोगों की खबर सम्पादक रहते हुए हुए अपने अख़बार में छपने नही दी थी।

सवाल यह भी है कि क्या समाज का दयारा इतना सीमित है कि कोई भी व्यक्ति या संगठन जब चाहे जहाँ चाहे अपने मनमर्जी के मुताबिक ख़राब कर दे और देश या प्रशाशन मूकदर्शक होकर शिखंडी बनकर ख़ुद को महान घोषित करने से बाज नही आए। मंगलेशजी का मानना है कि "हमारे समाज के अनेक संकटों के लिए मुख्यत: यही विचारधारा जिम्मेदार है।" तो जब ये तत्व समाज में संकट फैला रहे थे तो आप शिखंडी बनकर चुपचाप कविता क्यों लिख रहे थे, सड़क पर कितनी बार आए।

उनकी निजी राय है कि राज्य सरकारों को ऐसे एकमुश्त पुरस्कार देने के बजाए कुछ ठोस और सार्थक रचनात्मक कामों या परियोजनाओं के लिए आर्थिक सहयोग के रूप में ये राशियां देनी चाहिए। लेकिन सवाल है कि जिसे मंगलेशजी यह सलाह दे रहे हैं, उनके सोच इस हद तक होती तो क्या वे समाज को तोड़ने का कम करते और उन्हें पुरस्कार को ठुकराने की नौबत आती। भैंस के आगे बीन बजाने से मंगलेशजी को कभी फायदा दिखा है क्या।

बहरहाल, मामला पुरस्कार को ठुकराने भर का नहीं है, मामला उस मानसिकता का है जो किसी सम्मान को ठुकरा कर अपनी छवि चमकाने की है। मामला पुरस्कारों के निर्णायक मंडल की योग्यता और इन इनामों के लिये पात्र लोगों को चुनने की कसौटी पर सवाल खड़े करने का भी है कि जो अलग मानसिकता या सिद्धांत के लोगों को भी इज्जत करते हुए उन्हें सम्मानित करने का साहस करती है। यह उस सरकार का भी साहस की बात है जो गुणों का सम्मान करना जानती है भले ही वह उसका दुश्मन हो।

नोट :इस पत्र को व्यक्तिगत न लेते हुए सवाल का जबाव खोजने की कोशिश की जाए तो साहित्य और पत्रकारिता जगत के लिए बेहतर विकल्प होगा। लेकिन इस बात से इंकार नही किया जा सकता की समकालीन दौर में मंगलेश डबराल की साहित्य साधना पर सवाल नही उठाया जा सकता और व्यक्तिगत तौर पर उनका सम्मान करना मेरा फर्ज है...विनीत उत्पल

6 comments:

अखिलेश शुक्ल said...

प्रिय मित्र
सादर अभिवादन
आपके ब्लाग पर बहुत ही सुंदर सामग्री है। इसे प्रकाशनाथ्ज्र्ञ अवश्य ही भेंजे जिससे अन्य पाठकों को यह पढ़ने के लिए उपलब्ध हो सके।
अखिलेश शुक्ल
संपादक कथा चक्र
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http://katha-chakra.blogspot.com

Arvind Mishra said...

कुछ तो लोग कहेंगें -क्या किसी को निजी स्तर पर ऐसे निर्णय लेने का अधिकार भी प्रश्नों के दायरे में होना समीचीन है ? कितने लोग हैं जो ऐसे सम्मान और महज कुछ रुपल्ली को अस्वीकार करने की हिम्मत रखते हैं ? यहाँ तो पूरे ५१ हजार का मामला है ! मैंने कुत्तों के तरह कथित स्वनामधन्य साहित्यकारों को चंद रुपयों के खातिर लम्बी जीभ लपलपाते देखा है ! आप खुद जरा आत्मान्वेषण करें खुद को मंगलेश के जगह रख के !

विनीत कुमार said...

अगर साहित्य के साथ लगाए साधना शब्द हटा दें तो बाकी बातों से एक हद तक सहम हूं।

cmpershad said...

इस बखेडे से कुछ हो न हो पर स्व. राजेन्द्र माथुर जी की स्मृति तो आहत हुई ही।

Anonymous said...

Hi, it is nice to go through ur blog...well written..by the way which typing tool are you suing for typing in Hindi..?

i understand that, now a days typing in an Indian language is not a big task... recently, i was searching for the user friendly Indian language typing tool and found.. " quillpad". do u use the same..?

Heard that it is much more superior than the Google's indic transliteration...!?

expressing our views in our own mother tongue is a great feeling...and it is our duty too...so, save,protect,popularize and communicate in our own mother tongue...

try this, www.quillpad.in
Jai..Ho...

Anwin said...

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Cheers,
Anwin
IndiBlogger.in