8/18/2009

शब्दचित्रों में सदियों का स्त्री-दर्द

वर्तमान सामाजिक परिवेश में एक स्त्री की मजबूरी, छटपटाहट, अंतर्द्वंद के साथ जीने और विपरीत परिस्थितियों को सहने के बावजूद इसकी आहट किसी को न लगने देना ही क्षमा शर्मा की कहानी का यथार्थ है। यह एहसास बिना किसी हो-हल्ला के एक स्त्री के अन्दर उठ रहे बवंडर के बारीक़ शब्दचित्रों से रूबरू उनकी कहानियों को पढने के दौरान होता है। क्षमा शर्मा का कहानी संग्रह 'रास्ता छोड़ो डार्लिंग' में संकलित कहानियाँ सामाजिक ताने-बाने में आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन में घटने वाली घटनाओं का दस्तावेज है। ये कहानियाँ सदी के एक चौथाई समय की कहानियाँ हैं, जिसमें १९८४ में लिखी गई कहानी 'कस्बे की लड़की ' से लेकर २००६ में लिखी गई कहानी 'रसोई घर' तक शामिल है।


इतने सालों में गाँव छोटे शहरों में, छोटे शहर नगरों में, नगर महानगरों में और
महानगर मेट्रो में तब्दील हो गए लेकिन नही बदला तो एक स्त्री का दर्द, जो सदियों से
वे चुपचाप सहती जा रही हैं।

कहानी संग्रह की हरेक कहानी गांवों,कस्बों और छोटे शहरों से निकलकर मेट्रो सिटी में रोजमर्रा घटने वाली घटनाओं के साथ आम व्यक्ति या स्त्री की उलझनें, समस्याएँ, आकाँक्षाओं, उधेड़बुन के साथ-साथ उनके सपनों को बयान करती है। अधिकतर कहानियों में एक औरत की जिन्दगी के खालीपन और मन में उतरने वाली तरंगों की छाप साफ-साफ दिकती है। वक्त जिन्दगी की परतों को इतनी निर्ममता से उधेड़ता है कि सिवाय छटपटाने के कोई चारा नहीं बचता। संग्रह की कहानी 'बयां ' में शहर की जीवंतता चाहे गली-मोहल्ले की सड़क हो या सिनेमा हाल की या टिकट खिड़की की-सभी बातें उकेरी गई हैं। साथ ही, किस कदर एक युवती या स्त्री को जीवन की हर सीढ़ी पर सतर्क रहना पड़ता है और शहर छोड़ दूसरे शहर में बस जाने पर कैसे एक टीस-सी उठती है, इससे भी पाठक अवगत होता है।

'पिता' कहानी में एक लड़की के दिलोदिमाग में अपने पिता की कल्पना और भावुक मन के वेदना है, जिसमें अपने शहर की याद के साथ-साथ अपने घर की याद भी उसे आती है। औरतों को इस पुरूष प्रधान समाज में किस कदर सुनना और सहना पड़ता है और आख़िर पलायन ही एक मात्र विकल्प दीखता है, इससे जूझती पटकथा 'जिन्न' है। कहानी 'कौन है जो रोता है' में जहांआराऔर उनकी माँ के जरिये एक स्त्री की वेदना को बखूबी दर्शाया गया है। कहानी 'दादी माँ का बटुआ' भ्रूण हत्या और मादा भ्रूण हत्या करने वालों के चेहरे पर जोरदार थप्पड़ है। संग्रह की कहानियाँ 'कैसी हो सुष्मिता', 'घर-घर', 'बिंदास', 'एक शहर अजनबी', 'रास्ता छोड़ो डार्लिंग', 'कस्बे की लड़की', 'ढाई आखर', 'एक है सुमन', 'चार अक्षर', 'मंडी हॉउस' आदि भी रोचक हैं, जिसमें समाज का सच और स्त्री का दर्द है।

क्षमा की कहानियाँ एक चौथाई सदी के पटल पर लिखी गई है, जबकि इतने सालों में गाँव छोटे शहरों में, छोटे शहर नगरों में, नगर महानगरों में और महानगर मेट्रो में तब्दील हो गए लेकिन नही बदला तो एक स्त्री का दर्द, जो सदियों से वे चुपचाप सहती जा रही हैं। मजबूरी, बेबसी और छटपटाहट के घुलते-पनपते वाली इस स्त्री संसार को क्षमा बखूबी अपनी सवेदनशील आखों से पहचानती है। संग्रह की कहानियों को पढ़ते वक्त एक बात अवश्य दिमाग में कौंधती है कि क्षमा ताकत और पैसे पर टिके समाज की परतों को बड़ी हुनरमंदी के साथ उघाड़ती तो है और कई बार कहानी कुछ ऐसा मासूम-सा सवाल पेश कर ख़तम हो जाती है जिसका उत्तर मासूमियत से देना सम्भव नही होता, लेकिन उससे बाहर निकलने का उपाय क्या है। जबकि कहानी एक तब्दीली की मांग करती है और यह तब्दीली वास्तविक जगत में भी हो सकता है।

बर्तोल्ख ब्रेख्त कहते हैं कि वह देश अभागा है जिसे नायकों कि जरूरत होती है। शायद यही सोच क्षमा शर्मा की भी है क्योंकि इनकी अधिकतर कहानियों में पात्र तो हैं लेकिन नायक एक भी नही है। इसके उलट सामाजिक सरोकारों में शामिल घर, मकान, सड़क, गलियां सभी इनकी कहानियों के नायक हैं लेकिन नही है तो एक अदद पात्र। यही क्षमा की कहानियों कि विशेषता है और लेखन शैली की भी।

1 comment:

Ram said...

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