9/01/2009

मेरी तो सहानुभूति है भाजपा के साथ: के.एन.गोविन्दाचार्य

मेरी तो सहानुभूति है भाजपा के साथ : के.एन.गोविन्दाचार्य

भाजपा की स्थिति वास्तव में चिंतनीय है। पुराने संबंधों के कारण मेरी सहानुभूति भी है। देश में विपक्ष इतना कमजोर और असंगठित होगा, यह शायद ही किसी ने कभी सोचा होगा। यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी समस्या है और सार्थक लोकतंत्र के विकल्प के अभाव में देश अराजकता की लपटों में झुलसेगा। सभी सोचने-समझने वालों के लिए यह चुनौती भी है। मैं यह मानता हूं कि भाजपा में बहुत वर्षों से संगठनात्मक समस्याओं का इलाज नहीं हुआ। वैचारिक मुद्दों की सफाई की कोशिश नहीं हुई है। वैज्ञानिक कार्य-शैली विकसित नहीं की जा सकी है। उसका परिणाम अब सामने आ रहे हैं जो बदहवासी और हड़बड़ी के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है।

भाजपा में बहुत वर्षों से संगठनात्मक समस्याओं का इलाज नहीं हुआ। वैचारिक मुद्दों की सफाई की कोशिश नहीं हुई है। वैज्ञानिक कार्य-शैली विकसित नहीं की जा सकी है। उसका परिणाम अब सामने आ रहे हैं जो बदहवासी और हड़बड़ी के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है.

आडवाणी का पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाना और अधकचरी जानकारियों के आधार पर जिन्ना जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जसवंत सिंह का किताब लिखना, दोनों ही वैचारिक असंवेदनशीलता के उदाहरण हैं। यदि आडवाणी में वैचारिक स्पष्टता होती, तो वे जिन्ना की मजार पर जाने के बजाय रणजीत सिंह की समाधि पर माथा टेकने गए होते। कंधार कांड के समय करीब डेढ़ सौ अपहृत लोगों की प्राण रक्षा की बजाय पिछले साठ बरसों में हताहत हुए हजारों जांबाज सिपाहियों के बलिदान से वे प्रेरणा लेते। आतंकवादियों को खत्म किए होते, न कि विभिन्न जेलों में बंद आतंकवादियों की रिहाई की बात करते।

मेरा मानना है कि दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद से दूर भाजपा नेतृत्व जा रहा है और इसके लिए नए पैंतरे या शब्दों के प्रयोग किये जा रहे हैं। भाजपा की नीतियां सरकार की प्रति-नीतियों में तब्दील हो गई हैं। दिशा-दर्शक तत्व के नाते मैं यह कह सकता हूं कि भाजपा नेतृत्व ने इसको अंगीकार नहीं किया। मसलन, एक तरफ अखिल भारतीय अध्यक्ष कहते हैं कि विचारधारा से कोई समझौता नहीं होगा, ऐसे में उन्हें इस बात का उत्तर देना होगा कि सत्ताधारी राज्यों में बेतहाशा बढ़ाए गए शराब के ठेके के मामले में हिन्दुत्व विचारधारा कहां गई? उसी प्रकार उत्तराखंड में गंगा के साथ जो छेड़छाड़ की गई, उसमें भारत की स्मिता कहां गई? मध्य प्रदेश या राजस्थान में जितने भ्रष्टाचार के मामले सामने आए या पनपे, उस वक्त विचारधारा कहां चली गई? ऐसे सवाल चाहे मूल आधारित हों या प्रतीकों में उस वक्त खड़े हुए हैं, जब विचारधारा पर कायम रहने की बात कही जाती रही है।

मुख्तार अब्बास नकवी से लेकर वरूण गांधी के जो बयान आए, वे किस विचारधारा से प्रेरित थे? गुजरात में ‘सेज’ को रामबाण कहा गया। इसे एक ऐसी लग्जरी बस के तौर पर सामने लाया गया कि यदि अभी इस बस पर नहीं चढे़, तो आप पीछे छूट जाआ॓गे। ऐसे में एकात्म मानवतावाद जो स्वदेशीकरण पर आधारित था, उसका क्या हुआ? जिस तरह विनिवेश हो रहा है, उस पर पार्टी की विचारधारा क्या है? इन तमाम मुद्दों पर पार्टी में कभी बातचीत नहीं हुई। पार्टी को जब जो लगा कि सत्ता में आने के लिए यही ठीक है, वैसा ही मान लिया गया।

वर्तमान में, भाजपा की स्थिति ऐसी सेना की है, जिसके सिपाही लड़ने के लिए रणक्षेत्र में तैयार हैं लेकिन सेनापति और वरिष्ठ नायक दुश्मन को छोड़ आपस में ही लड़ रहे हैं। भाजपा के कार्यकर्ताओं की मन:स्थिति फिलहाल ऐसी ही है। और इसके लिए सत्ता का सुविधाभोगी और सत्ताधारी नेता काम नहीं आएंगे। उन्हें आगे क्या करना है, वे भाजपा के लोग ही सोचें।

जहां तक संघ की बात है, उसकी भूमिका हमेशा सलाहकार की रही है। संगठनात्मक भूमिका रही है। यह अलग बात है कि इस बार भाजपा की चिंतन बैठक से दो दिन पहले मोहन भागवत का साक्षात्कार छपा। संघ हमेशा संगठनात्मक धर्म निभाता रहा है और राजनीति से उसका कोई लेना-देना नहीं है। चूंकि भारत के सभी प्रमुख राजनीतिक दल अमीरपरस्त हो गए हैं, अल्पसंख्यकपरस्त हो गए हैं, तो भारत में भारतपरस्त और गरीबपरस्त का उभार होना जरूरी है। जब भारतीय जनता के पास तिरंगा कांग्रेस, भगवा कांग्रेस और लाल कांग्रेस के बीच किसी को चुनना हो, तो लाचारीवश उन्हें लगा कि लाल या भगवा कांग्रेस की तुलना में तिरंगा कांग्रेस क्या बुरा है? इन कांग्रेसों का सत्ता में आना वक्त का तकाजा है और ऐसे में लोकतंत्र खतरे में पहुंचेगा। गरीबों की आवाज संसद के बदले सड़कों पर गूंजेगी। देश अराजकता की लपटों में झुलसेगा। आगे की राजनीति और रणनीति भाजपा में सोची ही नहीं जा रही है।

शिमला में आयोजित ‘चिंतन बैठक’ चिंता बैठक के रूप में समाप्त हो गई। यह ऐसी स्थिति है कि ‘पढ़ने गए नमाज, गले पड़ा रोजा’। चिंतन करने गए थे, पार्टी के बारे में और निष्कासन की बात होने लगी। होशोहवास के साथ कोई भी निर्णय नहीं लिया जा रहा है। सब काम हड़बड़ में हो रहा है जो अधकचरे निर्णय के रूप में सामने आ रहा है। जब वसुंधरा से त्यागपत्र लेना ही था, तो उन्हें विधायक दल का नेता ही क्यों बनाया गया? बुनने-उधेड़ने की प्रक्रिया से पार्टी बच सकती थी। इस तरह दिशा और नियमों की समझ मनमर्जी और तात्कालिकता की शिकार हो गई।

: विनीत उत्पल

(यह आलेख राष्ट्रीय सहारा में छपा है )

1 comment:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

मुझे गोविंदी जी की बातों में हमेशा एकरूपता दिखता है, वे हमेशा एक ही बात कर रहे हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आखिर भाजपा को अपने पुराने राग से मुक्त किया जान संभव है, यदि नहीं तो वह खुद को कैसे व्यवस्थित करेगी। गोविंद जी भाजपा के रग-रग से वाकिफ है। उनके पास सोशल इंजीनियरिंग जैसे सुझआव हो सकते हैं।

कभी-कभी लगता है कि क्या भाजपा को इस समय गोविंद जी की जरूरत महसूस हो रही होगी..।