9/13/2009

राज्यों की राजनीति की रपटीली राहें

भारत की चुनावी राजनीति में राज्यों के उभार और राष्ट्रीय राजनीति पर राज्यों और भारत की विविधता के हावी होने का मसला अहम है। कहीं जातिवाद हावी है, कहीं सांप्रदायिकता तो कहीं स्थानीय मुद्दे राज्य की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं। राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बनकर उभरने वाले कई क्षेत्रीय आंदोलनों को सर्वाधिक प्रभावी जवाब लोकतांत्रिक चुनावों के माध्यम से मिला है।
आज मुल्क की राजनीति दलितों के सवालों पर, अल्पसंख्यकों के मसलों पर, आदिवासियों के सवाल पर, पिछड़ों से जुड़े मसलों पर जितनी सचेत और सक्रिय है उतना पहले कभी नहीं थी। आजाद भारत की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में जो बदलाव सर्वाधिक आश्चर्यपूर्ण है वह केंद्रीय या राष्ट्रीय राजनीति की जगह क्षेत्रीय या राज्यवार राजनीति का उदय प्रमुख है।
दो खंडों में अरविंद मोहन के संपादन में छपी किताब ‘लोकतंत्र का नया लोक’ देश के विभिन्न राज्यों की राजनीति की बारीक विश्लेषण के साथ-साथ राजनीति शास्त्र के छात्रों और अध्येताओं के अध्ययन को एक दिशा देने में सहायक है, क्योंकि हरेक राज्य की राजनीति के 1990 के दशक से अब तक किस तरह के बदलाव हुए हैं, उनके पीछे सामाजिक गोलबंदी किस तरह की रही है, कैसे काम करती है, इसे समझने-समझाने का काम इस किताब के जरिए किया गया है।
आजाद भारत की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में जो बदलाव सर्वाधिक आश्चर्यपूर्ण है वह केंद्रीय या राष्ट्रीय राजनीति की जगह क्षेत्रीय या राज्यवार राजनीति का उदय प्रमुख है।

कुल बीस अध्यायों में बंटे इस किताब को पढ़ने के दौरान यह तथ्य पूरी तरह स्पष्ट होती है कि अगर अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में मंदिर और मंडल वाले मुद्दे आए और राजनीति को काफी बदलने में सक्षम हुए, तो नए दशक के आने के साथ ही तीसरे ‘एम’ अर्थात मार्केट (बाजारवादी आर्थिक नीतियों) का भी धमाकेदार आगमन हुआ। प्रतिद्वंद्विता जितनी बढ़ी है, मुद्दों का विकल्प कम हुआ है और बदलाव वाले विकल्प सीमित हुए हैं।
मुसलमानों ने, दलितों ने, आदिवासियों ने अगर अपनी पहचान और राजनीतिक वजूद कायम रखा है तो यह किसी की दया से नहीं हुआ है। अगर वोट की ताकत न होती, तो इनकी और भी बुरी गत बन गई होती क्योंकि जितने ‘वाद’ आए-गए, उन सबमें इनकी खास चिंता कहीं नहीं थी। आज बिहार की राजनीति में विकास का मुख्य मुद्दा किसी एक आदमी ने नहीं बनाया है, पंजाब की, कश्मीर की अलगाववादी प्रवृत्तियों को लोकतंत्र ने ही सबसे मजबूत जवाब दिया है। अब राज्य सरकारें अपनी जीत या हार के लिए पूरी तरह राष्ट्रीय सरकारों पर निर्भर नहीं हो सकती हैं।
पिछले दो दशकों में हुए सामाजिक (आर्थिक) और उसके परिणामस्वरूप राजनीतिक परिवर्तनों को कोसने के बजाय समालोचना और विश्लेषण के नजरिए से देखना इस किताब की खूबी है। दोनों खंडों में मशहूर चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव और सुहास पल्सीकर ने अपने लेखों के जरिए राष्ट्रीय व राज्यों की राजनीति के विभिन्न आयामों को सामने रखते हुए व्यापक विश्लेषण के जरिए अध्ययन को गहरा बनाते हैं। दोनों खंडों में अरविंद मोहन की भूमिका भी भारत के नए लोकतंत्र की अवधारणा को स्पष्ट करते हैं।
भारतीय राजनीति की सैद्धांतिक और तथ्यपरक व्याख्या करने वाले इस संकलन में विभिन्न विश्लेषकों ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव परिणामों के आधार पर वहां हो रहे राजनीतिक परिवर्तन की सटीक तस्वीर पाठकों के सामने रखने में कामयाब रहे हैं। खंड एक में आंध्र प्रदेश, केरल, असम, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और बिहार पर विस्तृत चर्चा की गई है वहीं दूसरे खंड में जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, छत्तीसगढ़, आ॓डिसा, कर्नाटक, पूर्वोत्तर के साथ-साथ राजस्थान की राजनीति के बारीकियों का अध्ययन पेश किया गया है।
बहरहाल, हिंदी में उपलब्ध इस भारी-भरकम राजनीति की किताब उस तथ्य को भी पाठकों को सामने लाने में सक्षम है कि भारत की वर्तमान राजनीति में न तो कोई राष्ट्रीय मुद्दा है, न तो कोई राष्ट्रीय नेता जिसे आम जनता आंख मूंदकर सिरमौर बनाए। और किस तरह राज्यों की राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर आते-आते मतदाताओं की सोच के साथ बदल जाती है कि बड़े दलों से लेकर राजनेताओं को हार का सामना करना पड़ता है।
विनीत उत्पल

1 comment:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपको हिन्दी में लिखता देख गर्वित हूँ.

भाषा की सेवा एवं उसके प्रसार के लिये आपके योगदान हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ.