9/29/2009

सारतत्व को बचाने की ज़रूरत : अब्दुल बिस्मिल्लाह,

अब्दुल बिस्मिल्लाह परिचय के मोहताज नही हैं। उनका उपन्यास 'भीनी-भीनी बीनी चदरिया ' को पढने के दौरान एक अलग ही मजा मिलता है। गरीब बुनकरों के जीवन-संघर्ष का अनूठा आख्यान है यह उपन्यास। वर्तमान में लोक कला, लोक संस्कृति और लोक साहित्य पर बाजार का किस तरह प्रभाव पड़ रहा है, उस पर वह बेबाक राय रखते हैं जो राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हुआ है... विनीत उत्पल

बाजार मूलत: परिवर्तन से जुड़ा है। जब पूरे विश्व में परिवर्तन हो रहा है, विकास हो रहा है तो बाजार का विस्तार लेना स्वाभाविक ही है। आये दिन नई-नई वस्तुओं का विकास हो रहा है। इसका प्रभाव जीवन के सभी क्षेत्रों में हो रहा है। रहन-सहन बदल रहा है, जीवन-शैली बदल रही है, सोचने-समझने की क्षमता भी बदल रही है। लोक संस्कृति, लोक पर्व और लोक साहित्य भी हमारे जीवन का हिस्सा है तो जाहिर है कि बाजार का प्रभाव भी इस पर पड़ेगा। अहम बात यह है कि इस परिवर्तन का प्रभाव बाह्य और आंतरिक तौर पर कहां हो रहा है?
भाषा बदल रही है लेकिन यह सत्य है कि कर्ता और क्रिया के बदलने से भाषा नहीं बदल जाती।

बाह्य प्रभाव का अर्थ यह है कि जो लोग जमीन या चौके पर बैठकर अभी तक खाना खाते थे, वे कुर्सी पर बैठकर खाने लगे। लेकिन अब भी सामान्य तौर पर दाल, रोटी, चावल आदि ही खा रहे हैं। हां, यह बात अवश्य है कि हाईफाई घरों में छुरी-कांटे से लोग खाने लगे हैं। शैली बदल गई, लेकिन खाना नहीं बदला। जीवन-शैली पर बाह्य प्रभाव तो पड़ा, लेकिन आंतरिक परिवर्तन नहीं आया।
पारंपरिक लोक गीत जीवन से समाप्त होते जा रहे हैं। नया लोक गीत आ रहा है, जिस पर हिंदी फिल्मों का प्रभाव है। भाषा बदल रही है लेकिन यह सत्य है कि कर्ता और क्रिया के बदलने से भाषा नहीं बदल जाती। हमारे पर्व मसलन होली, ईद, दशहरा, दीवाली आदि को मनाने की शैली में भी परिवर्तन आया है। बाजार में जहां हर साल नई-नई चीजें आती हैं, वहां पैकिंग भी नई हो जाती है। बाजार तंत्र पर विज्ञापन हावी है जिससे सामने जन-मानस आकर्षित होने के लिए मजबूर होते हैं।
हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इतने दबाव के बावजूद आंतरिक परिवर्तन नहीं हुआ है। घबराने की आवश्यकता नहीं है, बस आंतरिकता बरकरार रहे, हमारी संस्कृति बरकरार रहे, इसकी जरूरत है। कभी वक्त खाता जब रामलीला में गांव के लोग शामिल होते थे, कलाकार से लेकर व्यवस्था तक में उनकी भूमिका अहम होती थी। सम परिवर्तन के साथ रामलीला में लोगों का लगाव कम हुआ। आज कैसेट लगाकर भजन सुने जाते हैं, कीर्तन सुने जाते हैं। आज मनुष्य की कहीं जरूरत ही नहीं रह गई है, जो स्वाभाविक है।
अब भी देश के दूरदराज इलाकों में, जहां सड़कें नहीं हैं, बिजली नहीं है, वहां पारंपरिक तौर से सभी पर्व मनाया जाता है। दिल्ली को देखकर पूरे देश का कांसेप्ट बनाना ठीक नहीं है। क्यों नहीं कभी यह शोध होता है कि पूरे देश में होली, दीवाली और तमाम पर्व कितने तरह से मनाये जाते हैं। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में कोई पर्व किस पारंपरिक ढंग से मनाया जाता है, इससे मीडिया को सामने लाना चाहिए।
आज बाजार से घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति के सारतत्व को जीवित रखकर बरकरार रखने की जरूरत है। सुदूर अंचलों की संस्कृति, सभ्यता, साहित्य और कला को जनता के सामने लाने की जरूरत है, तभी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा

4 comments:

मन का पाखी said...

बहुत ही उत्तम विचार हैं ...आपने चवन्निछाप में मेरे सिनेमा के अनुभवों पे कमेंट्स लिखे थे ,.शुक्रिया .मैंने एक अपना ब्लॉग बनाया...पहला प्रयास है....बताएं ,कैसा है?

महेन्द्र मिश्र said...

पुस्तक के बारे में बढ़िया सारतत्व चर्चा की है बधाई .

Udan Tashtari said...

बहुत आभार इस आलेख को पढ़वाने का.

शरद कोकास said...

अब्दुल भाई उपन्यासों मे सारे समाज की पडताल करते है इस विस्तृत आलेख के लिये धन्यवाद -शरद कोकास