9/15/2010

टार्चर बंद करो

किसी को टॉर्चर करना हो तो इसके लिए न तो किसी खास सब्जेक्ट की और न ही इसे सीखने के लिए कहीं ट्रेनिंग की ही जरूरत होती है। वह भी तब जब घर की बहू की बात हो। इस देश में जहां महिलाओं को देवी का दर्जा दिया गया है, वहीं प्रेगनेंसी के दौरान सबसे ज्यादा प्रताड़ित भी इन्हें ही किया जाता है। यह बात नये अध्ययन में सामने आई है, जिसके तहत पाया गया कि प्रेगनेंसी के दौरान या फिर इसके बाद भारत में सास- ससुर, ननद-देवर या फिर घर के और लोग जमकर प्रताड़ित करते है।
ठीक-ठाक आमदनी वाले घरों की एक चौथाई महिला प्रेगनेंसी के दौरान या इसके बाद या अलग-अलग तरीकों से घरेलू हिंसा की शिकार होती है। महिला को न तो पर्याप्त इलाज ही उपलब्ध कराया जाता है और न ही पौष्टिक आहार ही दिया जाता है
बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के द्वारा कराए गए रिसर्च में हुए खुलासे चौकाने वाली हैं। रिसर्च की प्रमुख अनीता राज और उनकी टीम ने पाया कि ठीक-ठाक आमदनी वाले घरों की एक चौथाई महिला प्रेगनेंसी के दौरान या इसके बाद या तो घरेलू हिंसा की शिकार है या फिर अगल-अलग तरीके से ससुराल के लोग प्रताड़ित करते है। साथ ही महिला को न तो पर्याप्त इलाज ही उपलब्ध कराया जाता है और न ही पौष्टिक आहार ही मुहैया कराया जाता है। भले ही आज इस तरह के शोध जा रहे है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है भारतीय समाज आज भी बेटे और बेटियों में फर्क नहीं कर पाया है।
अनपढ़-गंवार को तो छोड़ दीजिए। अपने आस-पास सिर घुमाकर देख लीजिए या फिर अपने परिवार में ही झांक लीजिए, तथाकथित पढ़े-लिखे परिवारों में भी एक अदद बेटे की खातिर बच्चों को जन्म देती रहती है मां। कब्रा में पिता के पैर झूलते रहते है लेकिन उनकी आत्मा एक बेटे के लिए तरसती रहती है। और तो और यदि बेटी पैदा हो गई तो उस मां की नियति, वह मां ही बता सकती हंै। आधे दर्जन बच्चों के पैदा होने पर उनका लालन- पालन, पढ़ाई-लिखाई और फिर भारत जैसे संस्कृति प्रधान देश (जहां शादी में दहेज लेना और देना गर्व की बात समझी जाती है) में शादी वगैरह कैसे होता होगा, इसकी अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हालांकि शोध में पाया गया कि प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं को शारीरिक तौर पर कम ही प्रताड़ित किया जाता है लेकिन 20 फीसद महिलाओं का कहना था कि प्रेगनेंसी के दौरान ससुराल के लोग दूसरों के सामने उन्हें या उनके परिवार वालों को प्रताड़ित करते रहते है।
मेटरनल एंड चाइल्ड हेल्थ जर्नल में छपे लेख के मुताबिक, एक महिला के ससुराल वालों को बेटे की लालसा थी लेकिन उसने बेटी को जन्म दिया। तो घर वालों का कहना था कि वह दूसरा बच्चा पैदा करे और उस बेटी को अपने जेठ को दे दे क्योंकि उन्हें बच्चा नहीं हो सकता है। कई बच्चों को जन्म देने पर जहां मां का स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है वहीं मां अपने बच्चे की सही परवरिश नहीं कर पाती है। और तो और इतने सारे बच्चों को पालते-पोसते यह समझ ही नहीं पाती ंहैं कि उनके बच्चे सही रास्ते पर है या गलत। यह एक बेटे के लिए तरसते मां-बाप जिंदा रहते ही देखने के लिए विवश होते है। न इन बच्चों को अपने करियर की परवाह रहती है और न ही अपने परिवार की।
बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ द्वारा कराए गए शोध सिर्फ भारत में ही नहीं ये मामले दक्षिण एशिया में महिलाओं की बदतर स्थिति को बयां करता है। शोध ने लोगों को इस मामले पर सोचने के लिए विवश कर दिया है कि पारिवारिक प्रताड़ना किस तरह भारतीय समाज में व्याप्त है। साथ ही पति के साथ-साथ ससुराल द्वारा होने वाली प्रताड़ना पर लगाम लगाने वाले कानूनों पर विचार करने की जरूरत है।

2 comments:

alka sarwat said...

बहुत ज्वलंत समस्या उठाई है आपने
साधुवाद

pratibha mishra said...

महिलाओं से जुड़े मुद्दे अधिकतर पुरुष ही उठाते आये हैं
बढ़िया.