11/01/2010

बेटी के अस्तित्व पर चुप्प!


इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट बताती है कि हर साल भारत में करीब 50 लाख मादा भ्रूण हत्या होती है। ऐसे में, मुट्ठीभर लोग बेटियों औ र उसकी रक्षा के लिए बात करें, तो नैतिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। लेकिन दुखद बात है कि फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग की धौस सोशलिज्म पर छाने के बाद भी बेटियों और उनके अस्तित्व को लेकर कोई खास चर्चा कहीं नहीं दिख रही है
सोशल नेटवर्किग की दुनिया बड़ी ही दिलचस्प है। कभी ब्लॉगों की दुनिया में किसी मुद्दे पर हंसी-ठहाके, व्यंग्य की फुलछड़ियां छूटती रहती है तो कभी फेसबुक, ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म पर गंभीर विषयों पर गंभीर बातें शुरू हो जाती है। यानी यह कि भारतीय हो या अमेरिकी सरकार, हर की तह खुलनी या फिर इस वजरुअल स्पेस में ऐसी की तैसी होनी तय है। पिछले दिनों कुमार सवीर ने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपने मित्र गुलाम कंदनाम की कविता स्क्रैप की,
’सुबह ही मैने दुर्गा को, धूपबत्ती दिखाई थी/ दोपहर में कन्याओं को, उत्तम भोज कराई थी/ शाम को भी मैने एक, बड़ा ही नेक काम किया/ घर आने वाली जगदम्बा को, गर्भ से सीधे स्वर्ग दिया।‘
कुछ साल पहले मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर अविनाश ने ’बेटियों का ब्लॉगनाम से एक कम्युनिटी ब्लॉग का संचालन शुरू किया था और अभी उसमें 11 कंट्रीब्यूटर है, लेकिन दुखद पहलू यह है कि पांच मार्च, 2010 तक के बाद किसी ने भी कोई पोस्ट नहीं किया है। मॉडरेटर ने अपना अंतिम पोस्ट तब किया, जब उनकी बेटी सुर दो साल की हुई थी और वह पोस्ट सिर्फ फोटो फीचर जैसा था। हालांकि इसी ब्लॉग पर फिलहाल चेन्नई में रह रही विभारानी अपनी दोनों बेटियों- तोषी और कोशी की बातों, क्रियाकलापों को लेकर पोस्ट लिखती आ रही है। इसी ब्लॉग पर कभी रवीश कुमार ने भी अपनी बेटी ’तिन्नी‘ को लेकर लिखा है, ’बदलाव तिन्नी ला रही है। छुट्टी के दिन तय करती है। कहती है, आज बाबा खिलाएगा। बाबा घुमाएगा। बाबा होमवर्क कराएगा। मम्मी कुछ नहीं करेगी।‘ गौरतलब है कि ’बेटियों के ब्लॉग को लेकर अविनाश को पुरस्कृत भी किया जा चुका है। ’लाडली-बेटियों का ब्लॉगभी है लेकिन यहां कविताएं ही कविताएं है।
मुंबई में रहने वाले विमल वर्मा ने दो साल पहले 2008 में ’ठुमरी‘ ब्लॉग पर अपनी बेटी ’पंचमी‘ के जन्मदिन पर लिखा था। राजकुमार सोनी ने अपने ब्लॉग ’बिगुल‘ पर बेटियों की आड़ में‘ पोस्ट किया, जिसमें एक कविता है जो सही मायने में भारत में बेटियों की स्थिति को बयां करती है।
’बोए जाते है बेटे, उग जाती है बेटियां / खाद- पानी बेटों पर लहलहाती है बेटियां/ एवरेस्ट पर ठेले जाते है बेटे, पर चढ़ जाती है बेटियां/ रुलाते है बेटे/ और रोती है बे टियां/ पढ़ाई करते है बेटे, पर सफलता पाती है बेटियां/ कुछ भी कहें पर अच्छी है बेटियां।‘
वहीं अहमदाबाद में रहने वाले माधव त्रिपाठी मेरी भाषा डॉट वर्ड प्रेस डॉट कॉम पर ’बेटी बचाओ‘ का नारा लगाते नजर आते है। वहीं, एक ब्लॉग पर लिखा नजर आता है, ’मुझे मत मारो ! मां, मै तेरा अंश हूं और तुम्हारा वंश हूं।‘ साथ ही इंटरनेट की दुनिया में ’स्वाभिमान जगाओ-बेटी बचाओ‘ जैसे नारे भी लिखे जा रहे है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट बताती है कि हर साल भारत में करीब 50 लाख मादा घूणहत्या होती है। ऐसे में, मुट्ठीभर लोग बेटियों और उसकी रक्षा के लिए बात करें, तो नैतिकता पर सवाल उठना लाजिमी है। लेकिन दुखद बात है कि फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग की धौस सोशलिज्म पर छाने के बाद भी बेटियों और उनके अस्तित्व को लेकर कोई खास चर्चा कहीं नहीं दिख रही है। हां, यह जरूर है कि महिलाएं खुद के अस्तित्व को लेकर जागरूक हुई है, बावजूद इसके पुरुष- महिला का समान अनुपात कोसों दूर नजर आता है।

1 comment:

DR. PAWAN K MISHRA said...

’सुबह ही मैने दुर्गा को, धूपबत्ती दिखाई थी/ दोपहर में कन्याओं को, उत्तम भोज कराई थी/ शाम को भी मैने एक, बड़ा ही नेक काम किया/ घर आने वाली जगदम्बा को, गर्भ से सीधे स्वर्ग दिया।‘

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