2/15/2011

दुनिया बदलता सोशल नेटवर्क


चाहे मुंबई में गणपति विसर्जन हो या जंतर-मंतर पर मजदूर यूनियन का धरना-प्रदशर्न या फिर कोलकाता में भूख हड़ताल का मामला, भारत में लोगों का सड़कों पर उतरना कोई नया नहीं है। जहां अधिकतर शहर र्वल्ड क्लास सिटी में तब्दील हो रहा है वहीं आन्दोलन या प्रदर्शन के लिए जगह भी खत्म होती जा रही है। खासकर उच्च वर्ग के लोग तो शायद ही सड़क पर आते हैं। जगह कम होने का कारण सिर्फ युवा आबादी का अधिकांश समय साइबर स्पेस में रहना नहीं है। बल्कि इसका योगदान शिफ्ट कर गया है। मिस्र और टय़ूनीशिया में ऐतिहासिक बदलाव डिजिटल स्पेस की नई कहानी कह रहा है, जिस विरोध को न तो पूरी तरह कभी भी बदला जा सकता है और न ही खत्म किया जा सकता है। 
जब टय़ूनीशिया में एक 26 वर्षीय यूनिर्वसटिी स्नातक की आमदनी का जरिया खत्म हो गया क्योंकि पुलिस ने उसके फलों और सब्जियों के ठेले पर कब्जा कर लिया था। तो वह आग के नजदीक बैठ कर इंटरनेट के माध्यम से पूरे देश के लोगों के सामने अपना विरोध रखा। लोग सड़कों पर उतर आए और आखिर तब तक विरोध करते रहे जब तक कि राष्ट्रपति जियान अल आबिदीन बेन अली देश छोड़कर भाग नहीं गए। टय़ूनीशिया का एक नागरिक अपने ट्विटर पर लिखता भी है कि इंटरनेट के बिना संभव था कि हमारा चुपचाप कत्लेआम कर दिया जाता और किसी को मालूम भी नहीं होता। पांच साल पहले इस तरह सत्ता परिवर्तन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी क्योंकि फेसबुक और ट्विटर के न होने पर इस संघर्ष पर लगाम कस दी जाती और दुनिया को पता भी नहीं चलता। मिस्र में भी यही हुआ। टेक्नालॉजी ने दुनिया के सामने संघर्ष की तस्वीर सामने रखी और काफी कम समय में अधिकतर लोगों के पास जानकारी पहुंचने लगी। तहरीर चौक पर किस तरह भीड़ उमड़ पड़ी, इसे दुनिया के लोगों ने देखा और जाना। भारत का राजनीतिक परिदृश्य काफी अलग है। तकनीक लोगों को खुलापन, रास्ता और पारदर्शिता का नया रूप देता है। 
शुरु आत से ही भारत के लोग काफी वेब सेवी रहे हैं और काफी कुछ करते भी रहे हैं। मसलन, पिंक चड्डी कंपेन, नए तरह से विरोध का मसला था और इसके जरिए देखा जा सकता है कि कैसे इंटरनेट से जुड़े लोग किसी चीज को सामने लाते हैं और विरोध प्रदशर्न करते है। अब तो लोग इंटरनेट के साथ ही बड़े हो रहे हैं। बत्ती गुल, जस्टिस फॉर जेसिका, जस्टिस फॉर विनायक सेन, 2008 में मुंबई हमले के बाद गेटवे ऑफ इंडिया रैली इनमें खास रहे हैं। और तो और हाल ही में ‘आई एम अरु णाचल, ड्रीम ऑन चाइना’ मामला सभी को याद ही होगा, जो सोशल मीडिया के जरिए विरोध के नया आयाम गढ़ता नजर आया। आज के दौर में ये डिजिटल माध्यम लोगों को एकजुट करने का माध्यम बन गए हैं, जिसके जरिए लोग अपनी बात रखते हैं, बहस करते हैं। कोई भी आंदोलन अब इसकी पहुंच के बिना संभव नहीं है। इसके जरिए हम भले ही भौतिक रूप से एक जगह नहीं हो पाते हैं लेकिन एक जोरदार बहस जरूर करते हैं।
 ‘फाइट बैक’, जिसने ऑन लाइन जेंडर इक्वेलिटी कैंपेन 2008 में लांच किया था और अब इस फेसबुक ग्रुप में 4000 सदस्य हैं। इस ग्रुप के संस्थापक जुबिन ड्राइवर कहते हैं कि अभी भारत में डिजिटल असर होना बाकी है। उनका कहना है कि भारत में अभी करीब 700 मिलियन लोगों के पास मोबाइल है और जिस दिन इन मोबाइलों के जरिए लोग इंटरनेट का प्रयोग करने लगेंगे, उस दिन दुनिया वर्ग, जाति और भौगोलिक सीमाओं को तोड़कर सामने होगी। हालांकि साइबर विश्लेषकों का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में भले ही अंग्रेजी भाषी लोगों का वर्चस्व हो लेकिन फेसबुक, ट्विटर आदि ऑनलाइन माध्यम लोगों के संघर्ष में शामिल हो रही है, लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए विवश कर रही है। बहरहाल, इंटरनेट की दुनिया के साथ-साथ वायरलेस सोशल नेटवर्क गहरे तौर पर समाज में स्थान बना रहा है और संघर्ष या आंदोलन की नई जमीन तैयार कर रहा है। जहां बातें सहज खत्म नहीं होती बल्कि संघर्ष में भाग लेने वाले लोग काफी संभावनाओं के साथ अपने आइडिया और विश्वास को दूसरे लोगों या समुदायों या स्पेश में रखते हैं।

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