1/25/2016

इश्क में माटी सोना'

गांव से शहर और फिर शहर से गांव के रास्ते का सफर इतना आसान भी नहीं जितना दिखता है. यदि यह आसान होता तो गांव और शहर के बीच की दूरी, चमचमाती सड़कों और मिट्टी की पगडंडियों, रंग-बिरंगी रोशनियों से भरी कॉलोनियों और लालटेन की टिमटिमाती लौ की दूरियां भी खत्म हो चुकी होती. जब पिछले सात-आठ दशक से हर शख्स गांव के विकास की बात करता हो लेकिन विकास कोसों दूर हो मानो यह गिरीन्द्र नाथ झा की 'इश्क में माटी सोना' न होकर मुसहर जाति की 'रूपा' और राय टोले के 'उमेश' की बात हो. 
लघु प्रेम कहानी यानी लप्रेक के जरिए जिन छोटी प्रेम कहानियों को पत्रकार रवीश कुमार ने नींव रखी, उसे नए धरातल और नए सिरे से गिरीन्द्र ने लोगों के सामने रखा है. इनकी कहानी सिर्फ प्रेम कहानी भर नहीं है बल्कि एक ऐसे पत्रकार की भी कहानी है जिसने दिल्ली आकर कई सपने संजोए थे लेकिन उन सपनों की मंजिल आर्थिक तौर पर पिछड़े जिले पूर्णिया का एक गांव चनका तो था, लेकिन प्रेम, अनुभव और चिंतन के तौर पर बौद्धिक विकास की सीमाओं से परे था.
कुल 86 पेज में सिमटी प्रेम कहानियां शहर के पते से निकलकर, जिंदगी और प्रेम से नज़्मे गाते हुए, धूप और छांव से गुजरते हुए जमाने की हद से उस पार ले जाता है, जिसके दायरे में दिल्ली है, दिल्ली के तमाम मुहल्ले हैं, दिल्ली की तमाम सड़कें हैं, फेसबुक के साइक्स हैं, गांव के कदम्ब के पेड़ हैं, अष्टजाम है कीर्तन हैं. फणीश्वरनाथ रेणु के बाद के दशकों से पूर्णिया, मधेपुरा, कटिहार, सहरसा, सुपौल, फारबिसगंज के इलाके की कहानी तो सामने आई पर भाषाई पटल पर वह पिछड़े ही रहे. ऐसे में गिरीन्द्र नई आशा के साथ सिर्फ दिखते ही नहीं बल्कि रचते भी हैं क्योंकि वे न सिर्फ शब्दों से खेलते हैं बल्कि नए मुहावरे गढ़ते भी हैं. गाम, नमनेसन, रूपिया, भोज, सिटकनी, अलच्छन, अखिलेसर, सुन्नैर, आलता, दसबजिया, चाह, दुआर जैसे स्थानीय लोक शब्द उनकी कहानियों को विस्तृत फलक देते हैं, वहीं हर कहानी की अलग खास लाइन आपको प्रेम में डुबकी लगाने के लिए मजबूर करते हैं. मसलन, 'हम एकांत में लिखते थे, अपने-अपने हिस्से के मन', 'उजाले में तुम्हारी आंखों का रंग बिलकुल बदल जाता है. क्या आंखों को भी धूप लग गई है', 'तुम्हारे रेणु तुम्हें कैसे लगते हैं-गुलजार के चांद की तरह', 'उसे चांद पसंद था और मुझे तारों भरा आसमान', 'इन किताबों की तमाम महफिलों में भी मुझे तुम ही दिखती हो...जैसे किसी भी गायक को सुनते हुए मेरा मन उसके संगतकार में रमा रहता है', 'काफी की झाग में जिंदगी खोज रहा हूं', 'प्यार भी चांद की कला है शायद, हर रोज नया रूप'.
अनुभव और शब्दों की जादू तमाम कहानियों में है यही कारण है कि कहानी के पात्र कहते हैं, प्रकृति तो बैकग्राउंड म्यूजिक है तुम्हारे होने की सुंदरता का, हम बिहारी लड़कों को दिल्ली में लड़कियों से जाने कितनी बातें सीखने को मिलती है, हमलोग देखते हैं सेक्युलर सपना, जंगली किसान, दिल्ली की जेब में गांव के साथ-साथ कहता है बिन बाप के घर का बड़ा बेटा बहुत जल्दी बाप बन जाता है, वगैरह.
राजकमल प्रकाशन के उपक्रम 'सार्थक' के द्वारा प्रकाशित गिरीन्द्र नाथ झा की कहानियां न सिर्फ प्रेम की गलियों में भटकने के लिए मजबूर करता है बल्कि विक्रम नायक का चित्रांकन भी बरबक्स पन्ने पलटने के लिए मजबूर करता है तभी तो मेरा चार वर्ष का बेटा विज्ञेश इस किताब को 'पढ़ता' है जिसे अभी सही तरीके से पढ़ना नहीं आता. वह तो अभी नर्सरी में ही स्कूली ज्ञान ले रहा है.
आमीन.

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