tag:blogger.com,1999:blog-46074983969445439412008-05-23T10:51:48.060-07:00विनीत उत्पलविनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comBlogger54125tag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-79008274095111095962008-05-22T00:33:00.000-07:002008-05-22T01:57:50.674-07:00समाज में बरक़रार है भेदभाव<span style="color:#ff0000;">समाज में बरक़रार है भेदभाव</span><br /><em>भारत में माना जाता है की हमारे यहाँ स्त्रियाँ काफी प्रगति कर रही हैं। कुछ हद तक यह बात ठीक भी है। लेकिन अभी भी कम पढी-लिखी महिलाओं में यह भावना गहरे तक धंसी हुयी है की स्त्रियाँ पुरूष के मुकाबले कमतर है। हमारे यहाँ स्त्रियाँ समर्पिता की भूमिका में है। धर्म का खासा दबाव है उन पर। पैदा होने से ही उसके अन्दर ऐसे संस्कार दाल दिए जाते हैं। कन्या भ्रूण हत्या एक ऐसा अपराध है जिसमें महिला की सहमति से इसे अंजाम दिया जाता है। उसके अन्दर बचपन से पड़े संस्कार और घर के पुरूष सदस्यों का दबाव उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर देते हैं। </em><br />इस सम्बन्ध में कत्थक नृत्यांगना <a href="http://www.punitaragvirag.blogspot.com/"><span style="color:#ff6600;"><strong><em>पुनीता शर्मा</em></strong></span></a> से <a href="http://www.deshbandhu.co.in/"><span style="color:#ff6600;"><strong><em>देशबंधु</em></strong></span></a> की बातचीत कुछ यूं है-<br /><br /><em><span style="color:#993300;">(पुनीता शर्मा राग-विराग नाम से ब्लाग भी लिखती हैं। यहाँ आप कत्थक की बारीकी से अवगत होंगे। और वह समाज के ज्वलंत मुद्दों पर जम कर शब्दबाण चलाती हैं...विनीत )</span></em><br /><br /><strong><em><span style="color:#009900;">हर क्षेत्र में महिलाएं बराबरी से योगदान दे रही हैं, तब फ़िर लड़कियां अवांछित क्यों हैं?</span></em></strong><br />- इसका कारण उनके साथ भेदभाव है। यहाँ शिक्षा और रोजगार में स्त्रियों के साथ भेदभाव की स्थिति है। मैं तो यही कहूंगी की नारी पुरूष के तुलना में अधिक योग्य है। इसीलिए पुरूष प्रधान समाज उसके साथ भेदभाव का रवैया अपनाता है। इसका उदाहरण है- शादी में लड़के और लडकी के उम्र में अन्तर करना। हमारे यहाँ विवाह में विवाह में लड़के की उम्र लडकी की तुलना में तीन से पांच साल अधिक रखी जाती है। क्योंकि लड़कियां लड़कों से शारीरिक व मानसिक रूप से पहले परिपक्व हो जाती है। इस तथ्य को विज्ञान भी मानता है। अगर लडकी की उम्र बराबर होगी, तो वह हर बात आंख मूंदकर स्वीकार नही करेगी। मेरा मानना है की जाति, वर्ग, लिंग, नस्ल के आधार पर भेदभाव नही होना चाहिए।<br /><strong><em><span style="color:#009900;">परवरिश और घर के संस्कार की इसमे कितनी भूमिका है?</span></em></strong><br />-तकरीबन नब्बे फीसदी घरों में लड़के और लडकी के बीच भेदभाव किया जाता है। लड़कियों पर तरह-तरह की बंदिशें लगाई जाती है, जबकि लड़कों को हर तरह की आजादी मिलती है। दिल्ली जैसे महानगर में भी लड़कियों को कहा जाता है की शाम छः बजे तक घर आ जायें।<br /><strong><em><span style="color:#009900;">शिक्षा इस मानसिकता को बदलने में कितनी कारगर हो सकती है?</span></em></strong><br />-शिक्षा खासतौर से लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई से निश्चित रूप से फर्क आया है। लेकिन इसके जरिये मानसिकता में बदलाव बहुत धीरे-धीरे आ रहा है। क्योंकि महिलाओं को बहुत अधिक दबाया गया है। इसके लिए कुछ कदम भी उठाने होंगे। इसके साथ ही भ्रूण हत्या और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार व भेदभाव को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा।<br /><span style="color:#009900;"><strong><em>समाज के नजरिये में बदलाव कैसे लाया जा सकता है?</em></strong></span><br />-समाज में जागरूकता फैलाने कर लिए शिक्षा या भाषण व सेमिनार नाकाफी है। इसके लिए व्यावहारिक नजरिया अपनाने की जरुरत है। इसके लिए नुक्कड़ नाटक, बैले, सोप ऑपेरा, नौटंकी जैसे मनोरंजन के माध्यमों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। दिल्ली के नरेला में सत्यवती कालेज की और से नारी शोषण पर एक नुक्कड़ नाटक किया गया। नाटक खत्म होते ही वहां आयी कुछ औरतों ने अपने पतियों से लड़ाई शुरू कर दी की तुम भी तो ऐसे अत्याचार करते हो। यानी इनके जरिये कहीं न कहीं जाग्रति तो आयी है।<br />भ्रूण हत्या पर मैंने 'परचम बनी महिलाएं' नाम से एक बैले के कई शो किए हैं। अभी हाल ही में मैंने झारखण्ड के दुमका में इसका शो किया। दर्शकों में इसे लेकर जबरदस्त प्रतिक्रिया रही और यह झलक मिली की वे इस बुराई को लेकर जागरूक हुए हैं।<br /><strong><em><span style="color:#009900;">अगर आपको इस स्थिति को सुधारने की निर्णायक भूमिका दे दी जाए तो आपका पहला कदम क्या होगा?</span></em></strong><br />-मैं सबसे पहले ऐसा करने वालों पर तगड़ा जुर्माना और दंड देने का प्रावधान करूंगी। लेकिन इसके लिए जांच की लम्बी प्रक्रिया , अदालत आदि की जरूरत नही होगी, बल्कि चीन की तरह मौके पर ही दण्डित किया जायगा.विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-56436678174322059882008-05-20T23:53:00.000-07:002008-05-21T00:58:41.507-07:00बाजार में हिन्दी<p><span style="color:#ff0000;"><strong>बाजार में हिन्दी</strong></span> </p><p><em><strong><span style="color:#33cc00;">लगभग २२ लोक भाषाओं से समृद्ध हिन्दी का बाजार आज अंगरेजी वालों के लिए ईर्ष्या का विषय है। बाजार में हिन्दी आ रही है और छा रही है। संचार के सभी माध्यमों को भा रही है हिन्दी। विज्ञापन जगत को लुभा रही है हिन्दी। वह पूरे बाजार में अपने झंडे गाड़ रही है। टीवी, प्रिंट, इंटरनेट, मोबाइल जैसे सभी माध्यमों का हिन्दीकरण हो रहा है। हिन्दी में धडाधर ब्लाग महाराज छप रहे हैं। हिन्दी सिनेमा ने वैश्विक चोला पहले ही पहन लिया है। हालीवुड भी हिन्दी में आ रहा है। हिन्दी अख़बार तो पाठकों के लिहाज से अंगरेजी से आठ गुना आगे निकल गए हैं। अब तो बड़े-बड़े विदेशी प्रकाशन कम्पनियाँ भी हिन्दी पुस्तकों के प्रकाशन में कूद रही हैं। हिन्दी ने बहुत जगहों पर अंगरेजी के वर्चस्व को तोडा है। बाजार में हिन्दी के वर्चस्व की यह जंग दिलचस्प होने जा रही है।</span></strong></em> </p><p><span style="color:#993300;"><span style="font-size:130%;">फेर फेर का फेर है हिन्दी का बाजारवाद</span></span></p><p><em><span style="color:#663333;"><strong>विनीत उत्पल</strong></span></em></p><p>हिन्दी के फेरे में बाजार या बाजार के फेरे में हिन्दी, यह एक ऐसा सवाल है जिसका न तो साहित्यकार जबाव दे सकते हैं और न ही बाजार के धुरंधर। इतना तो तय है की जिधर मुनाफे की बात होगी, वहां बाजार होगा। हालांकि, यह बात और है की जहाँ मुनाफे या घाटे की बात होगी, वहां हिन्दी मौजूद हो या न हो। </p><p>पिछले कुछ दशकों से हिन्दी पर जिस कदर बाजार का प्रभाव पड़ा है, वह गौरतलब है। संचार के माध्यमों मसलन, समाचार पत्र, टीवी, इंटरनेट, फ़िल्म ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ हिन्दी की पैठ लगातार बढ़ती जा रही है। हिन्दी का क्षेत्र की व्यापकता के बढ़ने के कारण जहाँ हिन्दी के समाचार पत्र और पत्रिकाएँ बाजार के बड़े हिस्से पर काबिज हो रही हैं, वही विज्ञापन की दुनिया ने भी हिन्दी के बाजार को और विस्तार प्रदान किया है। भारत में हिन्दी के समाचार पत्रों के पाठकों की संख्या सबसे अधिक है। पूरी दुनिया में सबसे अधिक फिल्म हिन्दी भाषा में बनती हैं।</p><p>इंटरनेट की दुनिया में जिस तरह हिन्दी ने घुसपैठ की है की गूगल और कई दूसरी वेबसाईटों ने हिन्दी में भी अपनी सेवा देना शुरू कर दिया है। कहीं न कहीं हिन्दी के बाजार का प्रभाव है की अब आप हिन्दी शब्दों को और उससे संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। ओरकुट पर आप हिन्दी में संवाद आदान-प्रदान कर सकते हैं। ब्लाग की दुनिया ने जहाँ आम लोगों को मन की बात खुले तौर से लिखने का स्पेस दिया, वही अब हिन्दी में चैटिंग करने की सुभिधा भी इंटरनेट यूजर्स को मिलने लगी है। </p><p>जहाँ तक ब्लाग की दुनिया की बात है, फिलहाल हिन्दी में करीब तीन हजार ब्लागर हैं, जो दुनिया के कोने-कोने से अपनी बात-जज्बात को पाठकों के सामने पेश कर रहे हैं। यह और बात है की जिस कदर अंगरेजी ब्लागर को विज्ञापन के जरिये पैसे आ रहा है, उस स्थिति में हिन्दी के ब्लागर नही पहुँच पाये हैं। लेकिन भविष्य में इसकी अपार संभावनाएं हैं। </p><p>इंटरनेट के बाजार की कहीं न कहीं हिन्दी उपभोक्ताओं पर नजर है, तभी तो गूगल ने गुडगाँव में ब्रांच स्थापित की है, जहाँ हिन्दी में विज्ञापन बनने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है की इसी वर्ष गूगल अपने यूजर्स के ब्लाग या ई-मेल पर हिन्दी में विज्ञापन पेश कर देगा। जहाँ तक विज्ञापन की बात है तो इसकी मनमोहक दुनिया को पंख लगे हुए हैं। वर्तमान में बाजार ने एक नयी हिन्दी ईजाद की है। वह है हिन्दी और अंगरेजी को मिलकर बनी हिंगलिश। </p><p>इसका जहाँ विज्ञापन की दुनिया में बखूबी प्रयोग किया जाता है, वही मेट्रो शहर में युवाओं की जुबान के भाषा बनती जा रही है। इतना ही नही, मोबाइल दुनिया में भी खासकर एसऍमएस करने में भी इस भाषा का बखूबी प्रयोग हो रहा है। विभिन्न कम्पनियाँ हिन्दी और अंगरेजी को मिलकर कुछ इस तरह विज्ञापन पेश कर रही हैं की उसकी पंच लाईन हर किसी के जुबान पर काबिज हो रही है। इस दौर में कहीं न कहीं बाजारवाद हिन्दी को प्रभावित कर रहा है। यह हिन्दी के बाजार पर वर्चस्व का ही प्रभाव है की हिन्दी फिल्मों के नाम और गाने भी हिंगलिश भाषा में प्रचलन में आ रहे हैं। चाहे फ़िल्म जब वी मेट का नाम हो या कोई और फ़िल्म। </p><p>फिल्मी गानों में भी हिंगलिश शब्दों का जमकर प्रयोग किया जाने लगा है। हिन्दी जगत में बाजारवाद इस कदर पैठ कर चुका है की सेंसेक्स जैसे शब्दों का हिन्दी अर्थ न धुंध कर उसी शब्दों का बहुतायत से प्रयोग किया जाने लगा है। हिन्दी ने वर्तमान अर्थशास्त्र की नयी परिभाषा को जनम दिया है। </p><p>बहरहाल, मामला बाजारवाद का है, मामला हिन्दी जगत का है। मामला मुनाफे का है, मामला puure हिन्दी क्षेत्र का है। लेकिन तय है की जिस कदर हिन्दी बाजार को प्रभावित कर रही है की आने वाले समय में बाजार पर हिन्दी का आधिपत्य होना तय है। </p><p>साभार- देशबंधु, नयी दिल्ली, १८ मई, २००८ </p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-50483741893974027532008-03-31T22:19:00.000-07:002008-03-31T22:32:45.757-07:00प्रणब की अमरीकी उड़ान, पर हाथ खाली<p><span style="color:#ff0000;">प्रणब की अमरीकी उड़ान, पर हाथ खाली</span></p><p><span class=""><strong><span style="color:#ff6600;">डा अजय बेहेरा</span></strong> </span></p><p><span class="">प्रणब मुखर्जी की अमरीकी यात्रा से भारत के हाथ कुछ खास हाथ नही लगा है। इस क्रम में जहाँ तक एटमी डील में टाइम फ्रेम की बात थी, उसकी रफ़्तार धीमी हुई है। यात्रा के दौरान इस मामले पर दोनों देशों के बीच अधिक प्रगति न होने के बावजूद दोनों देशों के बीच के सम्बन्ध प्रभावित नही होंगे। साथ ही, दोनों देशों के घरेलू मामलों पर भी कोई असर नही पडेगा। आशंका जताई जा रही है की अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव तक एटमी डील पर समझौता नही हो सकेगा और इसकी कोई सम्भावना दूर-दूर तक दिखायी नही दे रही है। </span></p><p><span class="">आगे पढने के लिए क्लिक करें... <a href="http://www.deshbandhu.co.in/Vichar.asp?Details=66"><span style="color:#ff0000;">देशबंधु </span></a></span></p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-23941590828914277862008-03-10T08:50:00.000-07:002008-03-10T09:23:13.348-07:00कुछ पल आंके कुछ पल फांके<p>मैं अक्सर सोचता हूँ की 'व्यक्ति' की परिभाषा क्या है। 'मैं' क्या चीज होता है। मैं तो अपनी एक भीड़ हूँ। मैं केवल एक लेखक नही। मैं किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का पति और किसी का पिता भी हूँ। किसी का दोस्त और किसी का दुश्मन भी हूँ। मैं वह आदमी भी हूँ जो किसी के लिए काम करता है। मैं वह आदमी भी हूँ जिसके लिए कुछ लोग काम करते हैं... मुझमे और बहुत से लोग भी होंगे। </p><p>मैं वह हिपोक्राईट भी हूँ जो अपने बास के बेजान लेतीफे सुनकर सिर्फ़ हँसता ही नही, बल्कि जी लगाकर हँसता है। जो घंटों अपने बोरिंग पडोसियों को बर्दाश्त करता है। जो ख़राब शेरों की तारीफ करता है...जो इसी प्रकार के और भी बहुत से घटिया काम करता है...यह 'मैं' 'व्यक्ति' तो hrgiz नही। यह तो अच्छा- खासा मोहल्ला है।</p><p>...लगभग हमेशा लेखक को अपना जी मरना पड़ता है।...इन बातों पर न पाठक सोचता है और न ही आलोचक। पाठक के पास पसंद-नापसंद की तलवार है। वह यह तलवार भान्जता रहता है और आलोचक बड़े-बड़े और भुदे शब्दों के पत्थर लुढ़कता रहता है। रुक कर मेरी खरियत कोई नही पूछता।</p><p>कोई लेखक शौक से बुरा नही लिखता। मैं उन लेखकों की बात नही कर रहा हूँ जो केवल बुरा ही लिखते हैं और केवल अपने लिखे को महत्व पूर्ण मानते हैं। मैं साहित्यकारों की बात कर रहा हूँ... उन साहित्यकारों की बात कर रहा हूँ जो अच्छे- बुरे साहित्य में फर्क कर सकते हैं। फ़िर भी सदा अच्छा ही नही लिखते। </p><p>यह साहित्यकार बड़ी मुश्किल से कोई घटिया चीज लिखने पर तैयार हो पता है। जानते-बूझते बुरा लिखना बड़ा मुश्किल काम है। पर इसे वही लोग समझ सकते हैं जो लिखने का काम करते हैं। वह लिखना पड़ता है जो लिखना नही चाहता, पर लिखता हूँ क्यूंकि मैं केवल लेखक ही नही हूँ। मैं वह दूसरा आदमी भी हूँ।</p><p>...राही मासूम रजा </p><p>जारी...</p><p>(वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सिनेमा और संस्कृति नामक पुस्तक से साभार)</p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-19979796235085624622008-03-09T06:04:00.000-07:002008-03-09T07:19:36.608-07:00मत मिलो अविनाश से<p><span style="color:#cc0000;">मत मिलो <span class="">अविनाश से</span></span><br /></p><p>मैं <span class="">जब </span>ब्लॉग पर अपनी 50 वीं पोस्ट लिख <span class="">रहा </span>हूँ तो यकायक इस पोस्ट को मोहल्ला बसाने वाले अविनाशजी के <span class="">नाम </span>और उनसे सीखने और आज ब्लॉग लिखने की धुन सवार होने की बात याद आती है। मुझे ब्लॉग के <span class="">बारे </span>में जानने और लिखने के काबिल बनाने वाले दो लोग हैं। उनमे अविनाशजी एक हैं, जिनका मैं एकलव्य की भाति शिष्य हूँ। यही कारण है की मोहल्ले में अभी तक मुझे एक <span class="">प्लाट </span>उपलब्ध नही हुआ है।</p><br /><p>तो यहाँ बात हो रही है अविनाशजी की। उनका नाम उस दौर में सुनने को मिला जब प्रभात <span class="">ख़बर </span>दिल्ली में फ्रीलान्सिंग करता था। सर्दी का समय था। शाम ढलने को <span class="">था, </span>तभी मैं प्रभात खबर के दफ्तर के नीचे पहुंचा था। उस दौर में मैं सिर्फ़ प्रभात ख़बर के रविवार मैगजीन की कवर स्टोरी और उसके एक या दो <span class="">कालम </span>लिखता था। </p><br /><p>तो रविवार मैगजीन का प्रभार देखने वाले से नीचे ही मुलाकात हो गयी। मैंने कहा चलो दफ्तर चलते हैं। उन्होंने कहा, <span class="">नही,</span> वहां अविनाशजी <span class="">आए </span>हैं। रंजनजी से मुलाकात करने आए <span class="">हैं.</span> मैंने पूछा, कौन अविनाश। उनका जबाब था, तुम नही जानते, प्रभात <span class="">खबर, </span>देवघर में संपादक थे और <span class="">अब </span>एनडीटीवी में हैं। इस पर मैंने <span class="">कहा,</span> चलो मिल लेते हैं, उनका जबाब <span class="">था, </span>मत मिलो अविनाश से। </p><br /><p><span class="">बात </span>आयी गयी हो गयी, लेकिन मैं ठहरा चिरकुट।जिस काम के लिए मन किया गया, वही काम पहले करना है। संयोग वश <span class="">उस </span><span class="">दिन </span>शनिवार <span class="">था.</span> दिल्ली मे रहने वाले को पता होगा की मावलंकर haal के पार्क में हर शनिवार को एक बैठक होती है। उस दिन वहां से मैं भी अपने एक दोस्त के साथ वहां <span class="">गया। </span>थोड़ी देर बाद अविनाशजी भी अपने लव-लश्कर के साथ पहुंचे। बस फ़िर क्या <span class="">था। </span>एक मुलाकात हो ही गयी। परिचय का आदान प्रदान काफी बेहतर रहा, लेकिन मेरी समझ में यह नही आया की मुझे मिलने से क्यों मना किया गया। </p><br /><p>दुसरी मुलाकात श्री राम सेंटर में हुयी। मिथिला नाटक चल रहा था। उस दौर में काफी कुछ समझने का मौका मिला। हमेशा एक सम्मान का भाव नजर आया।</p><br /><p>इसके बात तो फोन पर बातचीत का <span class="">सिलसिला </span>jaaree है। जब कभी किसी का फोन नम्बर लेना हो या कोई नयी जानकारी लेनी हो, <span class="">बस, </span>नमस्कार के साथ वह सहायता <span class="">करते </span>hain। कभी कोई समय का ध्यान मैंने नही <span class="">दिया, </span>लेकिन उन्होंने हमेशा सहयोग दिया। </p><br /><p>जब मैंने अपना ब्लाग शुरू किया, कई तकनीक मुझे समझ में नही आती, तो सीधे फोन लगाया और पूछ डाला। वे जहाँ कहीं होते तुरंत रास्ता बताते। कभी कोई झल्लाहट नही। लेकिन इसके बात कोई बात नही। </p><br /><p>एक बार गांधी भवन में मुलाकात हुयी। नेपाल मामले में एक बैठक में वे भी थे। वहां से निकले तो आम दोस्त की तरह ढाबे पर चाय पीकर अलविदा कह घर की ओर चल पड़े। लेकिन जब तक साथ रहे, दुनिया भर की बार, हंसी-मजाक का दौर चला कर सभी को हंसते और गंभीर बात कर मंत मुग्ध करते रहे। आज भी बात होती है, लेकिन भी समझ में नही आया है की आख़िर मुझे क्यों कहा गया था, मत मिलो <span class="">अविनाश </span>से। </p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-35804981143142494682008-03-08T03:59:00.000-08:002008-03-08T05:20:58.726-08:00किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहें<p><strong><span style="color:#cc0000;">किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहें</span></strong></p><p><span class=""><span class="">सिनेमा</span> को साहित्य के अध्याय का हिस्सा बनने <span class="">के औचित्य </span>को नजर अंदाज अब नहीं किया जा सकता। जिस तरह साहित्य, पाठक के पास पहुँच कर ही वाकई साहित्य बनता है, उसी तरह सिनेमा का औचित्य दर्शकों के पास पहुँच कर ही तय होती है। सिनेमा को देखना का नजरिया होना एक काबिलियत है और विश्व विद्यालय को इस ओर ध्यान देना चाहिए। </span></p><p><span class=""></span><span class=""></span><span class="">इस मामले में महाभारत सीरियल के स्क्रिप्ट लेखक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Rahi_Masoom_Reza"><span style="color:#cc0000;">राही मासूम रजा </span></a>ने अपना अन्तिम व्याख्यान अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में दिया था। बकौल रजा किसी कविता का अर्थ का रास्ता कवि के मस्तिष्क से होकर पाठक के अंतर्मन में जाकर खत्म होता है। कविता का वास्तविक अर्थ तो पाठक ही देता है। </span></p><p><span class="">अगर कोई शेर हमें पसंद है तो इसका मतलब वही है जो हमने समझा। समय के साथ-साथ अर्थों में भी फैलाव आता है। फिल्मों में यही बात लागू होती है। सिनेमा उन लोगों तक पहुँच जाता है, जो लिखना नही जानते। भारत जैसे देश में सिनेमा की कला के महत्व को अनदेखा किया जा रहा है। वर्तमान हालात में सिनेमा की बेपनाह ताकत को नजर अंदाज नही किया जा सकता।</span></p><p><span class="">पाठक कविता के साथ उन पंक्तियों की तस्वीर भी दिमाग में उकेरता है। उसी तरह विश्व विद्यालयों को चाहिए की वे अपने छात्रों को तस्वीर बनाना सिखाये, जो काम फ़िल्म बखूबी करती है। बकौल रजा, सिनेमा एक ऐसा आर्ट है जो बिन्दुओं को चलती-फिरती सोती-जागती हिलती-दुलती तस्वीरों में परिवर्तित कर उन्हें समझने का काम आसान कर सकता है। शिक्षा और समझ के लिए सिनेमा एक अच्छा माध्यम हो सकता है। </span></p><p><span class="">जिस तरह हम साहित्य को दूसरी विधाओं में परिभाषित करते है, उसी तरह सिनेमा को भी परिभाषित करना पड़ेगा। विशेष व्याकरण और तकनीक का अध्ययन करना पड़ेगा।जिस तरह हमरे टीचर ग़ज़ल, कसीदा, कहानी या उपन्यास पढ़ना सिखाते हैं, उसी तरह सिनेमा देखना और समझना सिखाना पडेगा। </span></p><p><span class="">यहाँ समस्या यह है की कथित बुद्धिजीवी लोग प्रसिद्धी को बहुत घटिया समझते हैं। मगर, वह उसकी शक्ति से अनजान है। ऐसे लोग अपनी ठहरी हुयी काबिलियत के गुलाम हैं। सिनेमा का दर्शक सिनेमा से बिल्कुल अनजान है। सही दिर्स्ती कोण कला का आधार है। इसके बिना कला की रचना सम्भव नही है। </span></p><p><span class="">सिनेमा की असली ताकत यही है की वह कभी भी देखने वाले को नजर अंदाज नही करता। यह बात कवियों, कहानीकारों, उपन्यासकारों के बारे में नही कही जा सकती। संदेश तो वह भी देते हैं लेकिन पाठक का ख्याल किए बिना। जैसे अच्छी या बुरी ग़ज़ल होती है, अच्छा या बुरा उपन्यास होता है, उसी तरह अच्छे या बुरी फ़िल्म होती है। </span></p><p><span class="">जब तक लोगों खासकर नयी पीढी को अच्छी या बुरी फ़िल्म में फर्क करने के तरीके के बारे में नही बताया जायेगा, लोग छुप कर बुरी फ़िल्म देखते रहेंगे। और साथ ही साथ अच्छी फिल्मो के मुकाबले बुरी फिल्मों की संख्या बढ़ती जायेगी। </span></p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-27046850759325857462008-03-04T22:18:00.000-08:002008-03-04T22:20:32.900-08:00बुल्लिया, की जाणा मैं कौन?<p><span style="color:#cc0000;">बुल्लिया, की जाणा मैं कौन?</span><br />ना मैं मोमिन विच्च मसीता<br />ना मैं विच्च कुफ़र दियां रीता,<br />ना मैं पाक आं विच पलीता,<br />ना मैं मूसा ना फ़िर औन।<br /><br />ना मैं विच्च पलीती पाकी,<br />ना विच्च शादी, ना गमना की,<br />ना मैं आबी ना मैं खाकी,<br />ना मैं आतिश ना मैं पौन।<br /><br />ना मैं भेत मजब दा पाया,<br />ना मैं आदम-हव्वा जाया,<br />ना मैं अपना नाम धराया,<br />ना विच बैटन ना विच भौं।<br /><br />अव्वल आखर आप नू जाणा,<br />ना कोई दूजा आप पछाणा ,<br />मैथों वध ना कोई सिआणा,<br />बुल्ल्हिया ओह खड़ा है कौन ?</p><p><br /> इन पंक्तियों का अर्थ कुछ यू है...</p><p><br />साधना की एक ऐसी अवस्था आती है जिसे संत बेखुदी कह लेते हैं, जिसमे उसकी अपना आपा अपनी ही पहचान से परे हो जाता है। इसीलिए बुल्लेशाह कहते हैं की मैं क्या जानू की मैं कौन हूँ?<br />मैं मोमिन नही की मस्जिद में मिल सकूं, न मैं पलीत (अपवित्र) लोगों के बीच पवित्र व्यक्ति हूँ और न ही पवित्र लोगों के बीच अपवित्र हूँ। मैं न मूसा हूँ और फ़िर औन भी नही हूँ।<br />इस प्रकार मेरी अवस्था कुछ अजीब है, ना मैं पवित्र लोगों के बीच, न अपवित्र लोगों के बीच हूँ और मेरी मनोदशा न प्रसन्नता की है, न उदासी की। मैं जल अथवा स्थल में रहनेवाला भी नही हूँ, न मैं आग हूँ और पवन भी नही।<br />मजहब का भेद भी नही पा सका। मैं ऐडम और हव्वा के संतान भी नही हूँ। इसलिए मैंने अपना कोई नाम भी नही रखा है। ना मैं जड़ हूँ और जगम भी नही हूँ।<br />कुल मिलाकर कहूँ, मैं किसी को नही जानता, मैं बस अपने-आपको ही जानता हूँ, अपने से भिन्न किसी दूसरे को मैं नही पहचानता। बेखुदी अपना लेने के बाद मुझसे आगे सयाना और कौन होगा? बुल्लेशाह कहते हैं की मैं यह भी नही जानता की भला वह खड़ा कौन है?</p><p><br /><em>जब भी मैं ख़ुद को अकेला पता हूँ, पता नही क्यों बुल्लेशाह की ये पंक्तियाँ काफी प्रभावित करती हैं।... विनीत</em> </p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-60679836401244709412008-03-04T07:24:00.000-08:002008-03-04T08:28:16.919-08:00बुरे फसेंगे भडासी यशवंत<span style="color:#ff0000;">बुरे फसेंगे भडासी यशवंत</span><br />पिछले दिनों भडास और मोहल्ला विवाद ने जिस तरह सभी ब्लागरों का ध्यान आकर्षित कर कुछेक ब्लागर पर डालर की बरसात हुयी है, इससे यह माना जाने लगा है की यह विवाद फिलहाल थमने वाला नही है। खास कर मनीषा नाम को लेकर जो हलचल मची है उसे लेकर लालू यादव सहित भारत ही नही दुनिया के तमाम देश कुछ अधिक ही गंभीर हुए हैं।<br /><br />बताया जाता है की पिछले दो दशकों से लालू के नाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है और लोगों ने सबसे ज्यादा बेचा है।देश में कही लालू नगर, कहीं लालू पटाखा और यहाँ तक की उनके बाल के स्टाईल पर फ़िल्म तक बनाई गयी है। इतना ही नही, नेहरू, गांधी, सुभाष, भगत सिंह, अम्बेडकर के नाम पर कई लोग अपनी दुकानदारी चला रहे है।<br /><br /><span class="">इन सब मामलों को देखते हुवे जहाँ लालू यादव ने मनीषा के नाम पर आपत्ति और ब्लाग के दुनिया में हलचल ko गंभीरता से लिया है। माना जा रहा है की लालूजी जल्द ही एक लिस्ट निकलने की तैयारी कर रहे हैं, जिसमे उनके नाम को भुनाने वालों को कानूनी नोटिस दी जायेगी। </span><br /><br /><span class="">वहीं सरकार और duusre देश में भी इस बहस को लेकर गंभीर है और कानून विदों से राय-मशविरा ले रही है। अब नाम का पेटेंट होगा। जितने लोग उतने नाम। यहाँ तक की सरनेम अलग कर भी कोई अलग नाम नही रख सकता। मतलब यह की भारत में ३३,००,००,००० देवी देवताओं के नाम के बाद भी और नाम खोजने होंगे। </span><br /><br /><span class="">यहाँ तक विचार किया जा रहा है की यदि किसी के कुत्ते का नाम टामी है तौ कोई भी दूसरा इस नाम का इस्तेमाल नही कर सकेगा। यहाँ तक की कोई किसी के नाम से भी किसी के साथ मजाक नही करेगा। यदि किसी ने कानून तोडा, उसे बिना मामला दर्ज किए फांसी दे दी जायेगी। </span><br /><br /><span class=""></span><span class=""></span><span class="">साथ ही, मजाक करने वाले ब्लाग पर मानहानि का दावा भी किया जाएगा। फ़िर कहाँ रहेगा भड़ास, मोहल्ला, टूटी- बिखरी और दूसरे ब्लाग। </span><br /><br /><span class="">(बुरा ना मानो होली है ) </span>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-91888589507745212332008-02-27T21:46:00.000-08:002008-02-27T22:47:15.728-08:00फेस बुक हो या ऑरकुट सभी जगह चिरकुट<p>फेस बुक हो या ऑरकुट सभी जगह चिरकुट </p><p>आज प्रमोद सिंह ने अजदक पर फेस बुक और ऑरकुट पर एक पोस्ट डाला है। इसे पढ़ते समय कुछ अपनी तो कुछ दोस्तों की बातें याद आ गयी। समय का तकाजा यह है की अपने आस पास रहने वालों, दोस्तों, रिश्तेदारों, पडोसियों से आपको न तो बात करने की फुरसत होती है और न ही चिंता। लेकिन इंटरनेट के मदद से दुनिया से दोस्ती करने का हाथ बढाते हैं। घर की मुर्गी दाल बराबर। </p><p>मैं भी इनसे अलग नही हूँ। दोनों सोशल नेटवर्क में मैं भी हूँ। पिछले दिनों एक पत्रकार मित्र अपनी पहचान छुपा मेरे स्क्राप बुक में अपना कमेन्ट दिया। काफी छानबीन करने पर आखिरकार इस पत्रकार के बारे में जानकारी प्राप्त कर फोन लगाया। यह अलग बात है की वह मेरे दोस्तों में शामिल है। यहाँ सवाल यह है की किसी को भी अपनी पहचान छुपाने की जरुरत क्यों पडी है। न तो ऑरकुट में उसने सही नाम लिखा है और न ही अपनी तस्वीर लगाई है। पूरा मामला न तो मेरे समझ मी आया और न ही मैंने उससे पूछा। </p><p>दूसरा मामला कुछ दिन पहले का है। जीटीवी पर शुक्रवार और शनिवार को देर शाम अन्ताक्छ्री प्रोग्राम आता था जिसकी एंकर हिमानी कपूर होती थी। उसने एक दिन बातचीत में बताया की फेस बुक में मेरे नाम से किसीने एक खाता खोल रखा है। उसमे मेरे इतने फोटो हैं की मैं सोच भी नही सकती। जबकि फेस बुक पर मैं कभी गयी ही नही। फ़िर जब मैंने उसका नाम फेस बुक पर खोजा तो पाया की वहां <span class="">१०६ फोटो </span><span class="">हिमानी </span>की है। उसने बताया की ऑरकुट पर भी उसके नाम से कई फेक खाता है। वहां जाने पर भी <span class="">चिरकुटई देखने </span>को मिला। </p><p>यह बात सही है की हर मामले के सकारात्मक और नकारात्मक दो पहलू होते है। यह तो आप पर निर्भर है की आप किस साहिल को चुनते है। </p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-34453428871436386202008-02-20T23:26:00.000-08:002008-02-20T23:51:05.867-08:00मिल गया, मिल गया, उमराव जान का गाना<p>मिल गया, मिल गया, उमराव जान का गाना </p><p>कुछ अरसा पहले मैंने ब्लॉग पर गायिका <a href="http://www.richasharma.com/">ऋचा शर्मा</a> के बरे में अपना अनुभव बयां किया था। उसका गया हुआ फ़िल्म <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Umrao_Jaan_(2006_film)">उमराव जान</a> का गाना अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो मुझे काफी पसंद है।कई दिनों के बाद आज ब्लाग की दुनिया मी यह गाना मिल गया। यह गाना तो सुनता था, लेकिन याद नही आ रहा था की यह किस फ़िल्म का है। </p><p>नदींम कमर के ब्लाग <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Umrao_Jaan_(2006_film)">कोतुहल</a> पर यह गाना मिल गया। फ़िर मुम्बई से ऋचा जी से बात हो गयी। इस गाने पर आश्वस्त हो झूम बराबर झूम प्रोग्राम को लेकर बात भी हुई। उन्होंने कहा बाजार से कैसेट खरीद कर जरा ध्यान से सुनो। अब मैं बाजार से उसे खरीदूंगा तब कुछ इस मुद्दे पर बात होगी। </p><p>रिचा शर्मा की आवाज आप भी सुने, एक दर्द का अनुभव होगा। फ़िल्म अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या की शादी के बाद रिलीज हुई थी। वैसे नदीम ने जो गाने के बोल लिखे हैं, काफी galtiyan हैं , इस कारण उसे post नही कर रहा। फ़िर भी आप उनके ब्लाग पर जाकर पढ़ सकते हैं। </p><p> </p>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-84425779590482573122008-02-06T08:55:00.000-08:002008-02-06T11:10:50.059-08:00वश चले तो कर दें हिंदी की हत्या<strong><span style="color:#cc0000;">वश चले तो कर दें हिंदी की <span class="">हत्या<br /></span></span></strong><br /><em>गीतकार को साहित्यकार मानने के मुद्दे पर <a href="http://www.blogger.com/profile/05235621483389626810"><span style="color:#ff0000;">दिलीप मंडल </span></a>की प्रतिक्रिया जायज है की वश चले तो संस्कृत की तरह हिंदी की भी हत्या कर देंगे। पवित्र और शुद्ध बनाकर मार डालेंगे। जहाँ तक संस्कृत की बात है, यहाँ ज्योतिष विषय अहम हो जाता है।<br /><br />ज्योतिष दो तरह के हैं, एक फलित तो दूसरा गणित। फलित ज्योतिष में जहाँ ग्रहों सहित तमाम ब्रहमांड में होने वाले घटनाओं से होने वाले फलों की जानकारी होती है। इसके बल पर हस्त रेखा, कुंडली देखने वालों का पेट भरता है। नेताओं, अधिकारियों या बडे लोगों के हाथों में पत्थर सहित तमाम माला isee का फल है। ज्योतिष के नजर में इससे ज्यादा महत्त्व नही दिया जाता है। </em><br /><br /><em>वहीं, गणित ज्योतिष के तहत ग्रहों के पृथ्वी, सूर्य की छाकर</em> <em>लगाने और सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं का अध्ययन किया जाता है। </em><br /><br /><em>यहाँ इस आधार पर की हमारी सभ्यता और संस्कृति के बात या तो संस्कृत में मिलती है या तमिल में। सभी ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए, तो क्यों नही हिन्दी के तथाकथिक पैरोकार ज्योतिष की ही तरह और साहित्य को अपने में समावेश क्यों नही कर सकते। चलिए, जरा दिलीप मंडल जी से रूबरू होते है... विनीत</em><br /><br />हिदी का ब्राह्मणवाद जाति निरपेक्ष है। ब्राह्मणवाद को अगर जातिवाद का समानार्थी मानें तो ये बींमारी सभी जातियों में है। आपको किस विश्वविद्यालय में नौकरी मिलेगी ये जातिवाद और चेलावाद से ही तय होना है। और ऐसा करने वाले सिर्फ ब्राह्मण नहीं हैं। ये जरूर है कि सवर्ण जातियों को ऐसा अनाचार करने का मौका ज्यादा मिला है और इसके ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय कारण हैं।<br /><br />इतना तय है कि ऐसे लोग हिंदी के दुश्मन हैं, समाज के भी दुश्मन हैं और दरअसल खुद के दोस्त भी नहीं है। उनका वश चले तो वो संस्कृत की तरह हिंदी की भी हत्या कर देंगे। पवित्र और शुद्ध बनाकर मार डालेंगे। हमारा सौभाग्य है कि पूरे हिंदी संसार के वो 5 परसेंट के भी मालिक नहीं हैं। सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग मिलकर सालभर में जितनी नौकरी देते हैं, उतनी और उससे ज्यादा मालदार नौकरियां हिंदी के बाकी क्षेत्रों में हर दिन मिलती हैं। जाति को इन जगहों में पूछा नहीं जाता, ऐसा तो नहीं है। लेकिन यहां विविधता ज्यादा नजर आ रही है।<br /><br />हिंदी अब मीडियाकर्मियों, विज्ञापन बनाने वालों, मनोरंजन व्यवसाय से जुड़े लोगों के हाथों में है और पहले से ज्यादा सुरक्षित है। हिंदी की इतनी अच्छी स्थिति कभी नहीं थी। तो जश्न मनाइए हिंदी में ब्राह्णणवाद की मौत का और जश्न मनाइए हिंदी के आजाद होने का।विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-11776981181692410002008-02-05T08:33:00.000-08:002008-02-05T13:04:17.797-08:00क्यों, साहित्यकारों की रजाई खींच रहे हो<a href="http://bp2.blogger.com/_vP741JqBz-8/R6ierZ63efI/AAAAAAAAAEY/G3R6kmYEY6A/s1600-h/vai.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5163551441309628914" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp2.blogger.com/_vP741JqBz-8/R6ierZ63efI/AAAAAAAAAEY/G3R6kmYEY6A/s320/vai.jpg" border="0" /></a><br /><div><br /><div><span style="color:#ff0000;"><strong>क्यों, साहित्यकारों की रजाई खींच रहे हो</strong></span></div><br /><br /><div></div><br /><div><em><strong><span style="color:#33cc00;">उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ से ताल्लुकात रखने वाले पत्रकार वैभव पाण्डेय की सोच और लेखन हिन्दी के साहित्यकारों के लिए करारा तमाचा है। बेबाक बोलने और लिखने वाले वैभव का मानना है की फिल्मी दुनिया में जो गीतकार बेहतर लेखन कर रहे हैं, उन्हें साहित्यकार मानने में कोई बुराई नही है। पर उन्हें साहित्यकारों पर तरस आता है.... विनीत</span></strong> <span class=""></span></em></div><div><em><span class=""></span></em></div><br /><div><em><span class=""></span></em></div><div></div><div>चाहे रवीश कुमार की बात हो या अमर उजाला में छपी बयानबाजी। फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद मौजूदा दौर में कुछ प्रतिभाशाली गीतकारों को साहित्यकार मानने में क्या बुराई है। इन गीतकारों में ५० से ६० दशक के गीतकारों का प्रतिबिम्ब झलकता है। चाहे रंग दे बसन्ती से चर्चित प्रसून जोशी हों या परिणीता से लोगों के नजरों में आने वाले प्रदीप शाहनी। </div><div></div><br /><div>आज के दौर में खास फिल्मों के गाने को सुना जाये, तो आसानी से महसूस किया जा सकता है की आधुनिक कवि कितने संवेदनशील हैं। उनके गीतों में जिन्दगी के तमाम पहलू बंधे रहते हैं। ध्यान रखिये, यहाँ 'सरकाय लियो खटिया' या 'मेरी पैंट भी सेक्सी ' जैसे दो अर्थ वाले गाने लिखने वाले गीतकारों की बात नही कर रहा हूँ। गीतकार शैलेन्द्र, मजरूह सुल्तानपुरी, गुलजार और जावेद अख्तर की गौरवमयी परंपरा को बढ़ाने वाले कुछ असाधारण प्रतिभाशाली गीतकारों की चर्चा कर ध्यान में लाना चाहता हूँ। इन लोगों ने अपने गीतों के माध्यम से फिल्मों को एक नया जीवन दिया है।</div><br /><div></div><div>बहस में शामिल उदय प्रकाश का यह कहना मन को उदास करता है की गीतकार तो मैकेनिक जैसा है, जो गाडी के खराब इंजन तो सही कर सकता है, लेकिन गति के सिधांत जैसे रते-रटाये के बारे में नही जानता। क्या सजीव काव्य कैसे लिखा जाये, इसके लिए कहीं बाकायदा 'क्लास' चलायी जाती है? क्या जितने मूर्धन्य कवि हुवे हैं, सभी ने इस क्लास में पढ़ाई की है? नही न, तो फिर इन प्रतिभाशाली गीतकारों से ऐसी आशा क्यों?</div><div></div><div><br />अब बात आती है यथार्थपरक गाने लिखने वाले इन गीतकारों की प्रतिभा का, तो क्यों नही इन गीतकारों को साहित्यिक पुरस्कारों की कसौटी पर कसा जाये। इसका जबाब ज्ञानेन्द्र पति की इन पंक्तियों में छुपा है, 'इन गीतकारों को तो उनकी उत्कृष्ट रचनाओं के एवज में पैसे और फिल्मफेयर अवार्ड समेत अनेक पुरस्कार मिल जाते हैं, पर हम जैसे khantee कवियों को साहित्य पुरस्कार नाम मात्र है।'</div><br /><div>बराबर बात है, क्यों कवियों की छोटी सी रजाई (पुरस्कार रूप में ) भीषण ठंड में छीन रहे हो भाई। </div></div>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-22323170325963952952008-02-04T10:25:00.000-08:002008-02-04T12:23:45.887-08:00हिन्दी जगत ब्राहमणवाद से पीड़ित<span class=""><strong><span style="color:#33cc00;">हिन्दी जगत ब्राहमणवाद से पीड़ित</span></strong></span><em><span style="color:#ff0000;"><br /><br />पहले </span><a href="http://naisadak.blogspot.com/"><span style="color:#ff0000;"><span style="color:#333333;">रवीश भाई</span> </span></a><span style="color:#ff0000;">और अब तीन फरवरी को अमर उजाला ने रविवार पत्रिका में साहित्यकार और गीतकार पर जोरदार बहस चलायी है। </span><a href="http://mohalla.blogspot.com/"><span style="color:#333333;">मोहल्ले </span></a><span style="color:#ff0000;">में अविनाश जी ने भी इसे छापा। पूरा हिन्दी जगत ब्राहमण वाद से पीड़ित है। छुआछूत का हर तरफ बोलबाला है।</span></em><br /><br />यदि हिन्दी जगत और विश्व विद्यालय या स्कूल के कोर्सों के ओर नजर डालें, तो अधिकतर संस्थानों में सालों दर साल से वही घिसा हुआ स्लेबस पढाया जा रहा है। कोई इससे आगे सोचने वाला नहीं। जो खुद छात्र जीवन में पढा और वही प्रोफेसर बनने के बाद पढाया। वही जिन्दगी और फिर वही kahanee. । हिन्दी साहित्य के लोग जितना बड़बोलेपन का शिकार हो लेकिन हकीकत यही है की एक कदम भी न तो आगे बढ़ती है और न ही नया कुछ सोचा जा रहा है।<br /><br />क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है, अंगरेजी में आक्सफोर्ड अपने शब्द भंडार में हर साल कुछ न कुछ शब्द जोर कर लोगों को जानकारी देती है, लेकिन हिन्दी में कहाँ। आज के दौर में कितने हिन्दी के पैरोकारों इंटरनेट, की- बोर्ड से संबंध है। सिर्फ गिनने लायक. हिन्दी साहित्य अकादमी कुछ पुरस्कार, कुछ किताब छाप कर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर डालती है।<br /><br />कहा जाता है, vahee संस्कृति और सभ्यता जीवित रहती hai जो नए को उसी तरह अपनाती हैं जिस तरह पुराने को इज्जत देती है। लेकिन हिन्दी भाषा और साहित्य की ओर नजर डालें तो बस गटर के मेढक की भांति टर्र-टर्र कर, उसे ही पूरी दुनिया मानते हैं और मस्त रहते हैं। पूरा हिन्दी जगत ब्राहमण वाद से पीड़ित है। छुआछूत का हर तरफ बोलबाला है।<br /><br />जब इन हिन्दी साहित्यकारों के घर में चूल्हा जलना भी मुश्किल हुआ तो सीधे गीतकार बनने चल दिए। चाहे प्रेमचंद हों यह शैलेन्द्र।यह अलग बात है, निदा फाजली, गुलजार इसके अपवाद हैं। और तो और अमर उजाला में जिस तरह <a href="http://uday-prakash.blogspot.com/">उदय प्रकाश</a> ने दोनो विधा को साइंटिस्ट और मैकेनिकल में बाँट बरगलाने की कोशिश की है, यह सही नही है। आप नए को स्वीकार नही कर पा रहे हैं, तो कम से कम एक नयी दिशा तो दे ही सकते है।<br /><br />क्यों हिन्दी साहित्य नए को स्वीकार नही करता है। हरशंकर परसाई के लेखन को कितने सालों के बाद साहित्य में स्थान मिलने लगा। तथाकथित साहित्य अपना दायरा क्यों सीमित कर रखा है, मंचीय कविता को अपने में शामिल नही कर पाया है। फिल्म के लिए गीतों को क्यों नही साहित्य में शामिल किया गया है, जबकि वह कही रोड छाप साहित्यकारों से कहीं अधिक दिलों के पास होते हैं।<br /><br />सवाल कई हैं। समय आ गया है, जब साहित्य के पैरोकारों को आपनी सोच का दायरा संकुचित करने के बजाय आगे ले जाना होगा। साहित्य के दूसरे पहलुओं को बाँहों में समेटना होगा, जिसे सौतेला छोड़ रखा है। फिर भी लोग सौतेले के साथ भी इतना बुरा व्यवहार नही करते।विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-27778342002375457772008-02-02T10:21:00.000-08:002008-02-02T11:47:48.879-08:00जब घर में भांजी की किलकारी गूंजी<a href="http://bp0.blogger.com/_vP741JqBz-8/R6S_1563edI/AAAAAAAAAEI/eLCIYckGq-U/s1600-h/shaswatee2.jpg"></a><br /><div><a href="http://bp1.blogger.com/_vP741JqBz-8/R6S-oJ63ecI/AAAAAAAAAEA/wL9vlJtVKH8/s1600-h/shaswatee1.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5162460669940300226" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_vP741JqBz-8/R6S-oJ63ecI/AAAAAAAAAEA/wL9vlJtVKH8/s320/shaswatee1.jpg" border="0" /></a><br /><br /><div><span style="color:#ff6600;">जब घर में भांजी की किलकारी गूंजी</span><br /></div><div></div><div></div><br /><div>साल २००१ में मेरे यहाँ आज के दिन, तीन फरवरी को पहली भांजी <span class=""></span>पैदा हुई। ठंड का समय था। भांजी घर आयी क्या, घर के सभी लोगों को एक खिलौना मिल गया था। दिन हो या रात सभी उसी के साथ चिपके रहते। पापा कालेज से आते तो सीधा उसे ही देखने जाते। मैं बाहर से आता तो बस सीधा रास्ता उसी कमरे में होता, जहाँ वह होती। छोटी बहन तब तक सोचती कि घर में सबसे छोटी वही है, इसलिए सबसे दुलारी है, लेकिन अब तो उससे भी कोई छोटी घर में थी। वह हमेशा उसकी सेवा में लगी रहती। उसे सुलाने का काम मेरा होता।कोई भी बच्चा कितना भी नटखट हो मेरी गोदी में उसे पता नही कितना शकुन मिलता है, वह सो जाता है। </div><div></div><br /><div>उसके जनम के समय जीजाजी नही थे। भागलपुर में जिस डाक्टर के अस्पताल में उसका जनम हुआ था, वह मेरे मित्र की माताजी थी। इस कारण वहाँ अपने घर जैसा माहौल था। भागलपुर के तिलकामांझी स्थित तीन मंजिले मकान के जमीनी तल पर अस्पताल और पहले मंजिल पर डाक्टर शैल बाला श्रीवास्तव जी का घर था। पहली मंजिल पर ही मेरे मित्र का कमरा था, जहाँ कभी बैठ दोनों पढ़ते थे। उस वक्त डाक्टर अंटी कभी चाय तो कभी नास्ता खुद हम लोगों के लिए लाती।</div><div></div><br /><br /><div>सामान्य ढंग से भांजी शाश्वती पैदा हुई। घर के लोग यहाँ तक जितने परिचित थे उसे देखने आते। घर में हर दिन उत्सव का माहौल होता। लेकिन उस दौर में बहन के ससुराल के लोगों को थोडी कशिश रही कि बेटा पैदा नही हुआ। हालांकि, शाश्वती ने सभी का इतना मन जीत लिया कि आब तो सबसे जाया अपने दादा और दादी की दुलारी है। शाश्वती का घर मधुबनी के पास स्थित पिलखवार है। वैसे भागलपुर के पास सबौर में भी आलिशान मकान है। </div><div></div><br /><div>इन दिनों शाश्वती इंदौर में अपने मम्मी और पापा के साथ रह पढ़ाई कर रही है। पढ़ने में इतनी होशियार की आप मिलें तो दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाएँ। समझदार इतनी की मुझे उसका मामा कहने पर शर्म आती है। सभी शब्दों का उच्चारण इतना सटीक और बोलते वक्त अधूरी पंक्ति नही छोड़ती। </div><br /><div></div><br /><div>निश्चयी इतनी है कि भले ही कितनी ठंड हो सुबह नहाने के बाद ही अन्न का दाना मुँह में डालेगी। क्लास में हमेशा अव्वल। लेकिन यदि स्कूल में किसी दिन टीचर ने दांता तो फिर घर आकर उसका रोना-धोना शुरू। मम्मी से हिसाब करेगी कि उसकी क्या गलती थी। कोई भी हो सीधे शब्दों में बात करेगी। कोई दर नही, कोई पंगा नही। फोन पर बेहिचक आप का हाल पूछेगी और फिर मम्मी को फोन देगी।</div><br /><div></div><br /><div>छोटी बहन और भाई से इतना प्यार करती है, जैसे वही दोनो का अभिवावक हो। खामी भी है, गुस्सा का घूंट पी जायेगी, दिल को चोट लगने पर चुपचाप रहेगी। एकलौता ममम यानी मुझसे न तो कभी टाफी मांगी और न ही कुछ और। बस बोलेगी, एक बार इंदौर आ जाओ मिलने। इतनी प्यारी भांजी से कौन नही प्यार करना चाहेगा।<br /></div><div></div></div>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-79635127607333495142008-02-01T09:16:00.000-08:002008-02-01T10:26:40.395-08:00आलोक पुराणिक के दीवाने कम नहीं</span></span>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-23963208694748129272008-01-30T08:52:00.000-08:002008-01-30T09:07:49.623-08:00गांधी, तू आकर देख<span style="color:#ff0000;">गांधी, तू आकर देख</span><br /><br />गांधी, तू आकर देख<br />कैसा है तेरे सपनों का देश<br /><br />पग-पग फैला भ्रष्टाचार<br />होता केवल यहाँ अत्याचार<br />नित्य यहाँ होता बलात्कार<br />जनता में मची हाहाकार<br /><br />गांधी, तू आकर देख<br />कैसा है तेरे सपनों का देश।<br /><br />जनता है यहाँ भूखे-नंगे<br />नेता जमकर करते वायदे<br />यहाँ न कोई कानून-कायदे<br />सब सोचते अपने फायदे<br /><br />गांधी, तू आकर देख<br />कैसा है तेरे सपनों का देश।<br /><br />यहाँ होते रोज घोटाले<br />राज करते बीवी साले<br />किसी के मन पर न होते ताले<br />दिन-रात खनकती शराब के प्याले<br /><br />गांधी, तू आकर देख<br />कैसा है तेरे सपनों का देश।<br /><br />शाम ढलते सूनी होती गलियां<br />सड़क पर होते कुत्ते-बिल्लियाँ<br />नींद चुराती बंदूक की गोलियां<br />रोज बहती खून की नदियाँ<br /><br />गांधी, तू आकर देख<br />कैसा है तेरे सपनों का देश।<br /><br /><em>(यह कविता २६ जुलाई १९९९ को भागलपुर में रहने के दौरान लिखी गयी थी.)</em>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-36349637634622456192008-01-29T10:33:00.000-08:002008-01-29T12:34:56.433-08:00मोहे अगले जनम... और गायिका ऋचा शर्मा<a href="http://bp3.blogger.com/_vP741JqBz-8/R5-FF563ebI/AAAAAAAAAD4/f6ToM7aFLc8/s1600-h/richa.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160990034483444146" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://bp3.blogger.com/_vP741JqBz-8/R5-FF563ebI/AAAAAAAAAD4/f6ToM7aFLc8/s320/richa.jpg" border="0" /></a><br /><div>फिल्म बागबान में गायिका <a href="http://www.richasharma.com/"><span style="color:#ff0000;">ऋचा शर्मा</span></a> ने बेटी की विदाई गीत अपने सुरों में पिरोया है। गीत के सुर और बोल ऐसे कि हर कैसी की आँखों में आशू ला दे। यह वही ऋचा शर्मा हैं, जिसने पिछले दिनों रिलीज हुई गोल, आजा नच ले, savariya का टाइटल संग , ओऊम शांति ओऊम में गाना गया है। जल्द ही, उसकी आवाज राजकंवर की सदियाँ, बाबी देयोल की चमकू और श्याम बेनेगल की महादेव में सुनने को मिलेगी। </div><br /><div>ऋचा को जानने और समझने का मौका फरीदाबाद में रहने के दौरान मिला। वह वहीं की रहने वाली है। आज दिल्ली वाले मोबाइल नम्बर के inbox से कुछ मैसेज hata रहा था। अचानक ऋचा शर्मा का मैसेज सामने आ गया। भले ही यह निजी मैसेज हो सकता है, इसमें कुछ कर गुजरने वालों की सादगी नजर आ रही है। </div><div></div><br /><div>उनका मैसेज है...</div><br /><div>हाय, विनीत मैं दिवाली<span class=""> ke<br /></span><span class="">मौक़े<br /></span>पर शहर में हूँ, जब फुरसत हो जाये तो कॉल करना। </div><br /><div></div><br /><div>गलती से आज मोबाइल से उन्हें कॉल चला गया। मुझे लगा खामखा उन्हें परेशां कर दिया. मैंने झट से कॉल कटा और और एक मैसेज भेज दिया. पर, थोडी देर में ऋचा जी का कॉल आ गया। आख़िर मैंने कॉल रिसीव किया.हाल-चाल जाना, तमाम तरह की बाते हुई और फिर अलविदा। जहाँ तक मैसेज की बात है, दिवाली के मौक़े पर मैं जयपुर में छोटी बहन के पास था। २००७ में दिवाली वहीं बीती थी। उसी दिन, जयपुर से ऋचा शर्मा से बात की थी। उस वक्त फिल्म सवारिया और ओऊम शांति ओऊम रिलीज होने वाली थे। काफी खुश थीं, कहा विनीत मेरे गाने जुरूर सुनना। काफी पसंद आयेगी। </div><br /><div></div><br /><div>यहाँ यह जानकारी देने का मकसद सिर्फ मेरा इतना था, कि एक बेटी क्या नही कर सकती। आपको बता दूँ ऋचा आठ बहनों में एक है। तीन भाई हैं उसके। मैंने उसका इंटरव्यू हिंदुस्तान में शख्सियत कालम के लिए लिया था। बाद में आत्मीयता होने के बाद फरीदाबाद में उसने आपने घर पर बुलाया था। पापा तो काफी पहले गुजर गए थे। अपने भैया के यहाँ थी। भैया और भाभी से मिलवाया और जो भैया मुम्बई में साथ रहते हैं, उनसे भी परिचय कराया था। जमकर नास्ता किया, एक दूसरे के बारे में और जाना।करियर में आगे बढ़ने की kamnaa हुई.</div><br /><div></div><div>कभी सोचता हूँ, घर इतना बड़ा, मुम्बई इतना बड़ा, फिल्मी दुनिया इतनी बड़ी, एक लडकी ने कैसे संघर्ष किया होगा। फिर भी इस मुकाम पर पहुचने पर कोई घमंड नही। आज भी जब वो फरीदाबाद आती है तो सबसे उसी तरह मिलती है, जैसे कल मिली हो।</div><div></div>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-79126273026846535952008-01-28T10:52:00.000-08:002008-01-28T11:57:41.298-08:00...कमलेश्वर का निधन यानी दिल्ली के एक मौत<a href="http://bp1.blogger.com/_vP741JqBz-8/R54xap63eaI/AAAAAAAAADw/qynG0Zadhic/s1600-h/kamleshwar1.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160616557012285858" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_vP741JqBz-8/R54xap63eaI/AAAAAAAAADw/qynG0Zadhic/s320/kamleshwar1.jpg" border="0" /></a><span style="color:#ff0000;">...कमलेश्वर का निधन यानी दिल्ली के एक मौत</span> <div><span class=""></span></div><br /><div>फिर दिल्ली के पत्रकार मित्रों से बात कर उनके घर के फोन नम्बर ले कर कन्फर्म किया और राजूजी ने दिल्ली ऑफिस फोन कर खबर लिखाई। लेकिन राजूजी ने मुझे इत्तला कर दी कि तैयार रहना, हो सकता है कि देर रात या सुबह कमलेश्वरजी के घर इरोज गार्डन जाना पड़े। </div><br /><div></div><br /><div>रात में फिर मैंने अपने मित्र स्नेहा को फोन कर मामला जानना चाहा, लेकिन उसने कहा पापा यानी अशोक चक्रधर बाहर हैं, इस कारण मैं क्या सहायता कर सकती हूँ। फिर थोडी देर बाद स्नेहा का फोन आया, बताई, पापा तो ट्रेन में है, उन्हें भी पता नहीं है। उसे आश्वस्त करते हुवे मैंने कहा चिंता के बात नही है, रात काफी हो रही है, सुबह बात करते हैं। </div><br /><div></div><br /><div>सुबह आठ बजते ही राजूजी का फोन आ गया, कि तैयार हो जाओ, मैं आ रहा हूँ। फोटोग्राफ़र सुभाष शर्मा भी साथ जायेंगे। जल्दी से तैयार हो कर दफ्तर पंहुचा। फिर तीनो इरोज गार्डन की और चल पड़े। सुबह का समय। दिल्ली से कुछ समाचार चैनल के पत्रकार वाहन मौजूद थे। कुछ सहपाठी भी थे। दुआ सलाम होने के बाद खबर लेने में जुट गए। </div><br /><div></div><br /><div>पता चला, कमलेश्वरजी का शरीर उनके पहले तल पर स्थित उनके बैठक में रखा गया है, लेकिन किसी भी पत्रकार को नही जाने दिया जा रह है। कुछ पत्रकार नीचे खडे थे, तो कुछ दरवाजे पर दस्तक देकर निराश हो कर लौट जा रहे थे। तत्काल मेरे दिमाग ने कुछ सोचा और मैंने राजूजी से सवाल किया, भाई साहब, ऐसे काम नही चलने वाला है। रिपोर्टिंग तो करनी है। उन्होने कहा, क्या उपाय है। मुझे अन्दर का सीन देखा नही जाएगा।</div><br /><div></div><br /><div>भाई साहब, आप बाहर नजर रखिये, और मैं पत्रकार की भांति नही, बल्कि उनके चाहने वाले और बतौर पाठक घर में जाऊंगा। कमरे के अन्दर गया। कोने में खडे होकर चुपचाप सभी चीजें देखता रहा। आने वाले रोते तो दिल रोने लगता। खुद को सांत्वना देता। अंदर गौरीनाथ जी भी कुछ देर में आ गए। हिमांशु जोशी सहित और भी कई साहित्यकार आये। करीब पांच घंटे घर के अंदर रहा।</div><br /><div></div><br /><div>कमलेश्वरजी के दामाद आलोकजी और उनकी बेटी मानू भी कई घंटे बाद आयी। तब तक हिन्दू रीति रिवाज से उनके सिर की ओर धूप और कान्हा जी की मूर्ति रख्खी गयी थी। उनका कमरा अस्त-व्यस्त था।अन्दर का दृश्य २८ जनवरी,२००७ के हिंदुस्तान के स्पेशल पेज पर छपा था। करीब दो बजे उनकी अन्तिम यात्रा शुरू हुई। यहाँ तक ही मेरा साथ था उनका। राजूजी ने उनके यहाँ काम करने वाले रघुनाथ और उसके पिताजी से बात की थी। उनकी यादें एन सी आर पेज के सभी संस्करण में छपी थी। </div><br /><div></div><br /><div>करीब पांच घंटे कमरे के अन्दर रहने के बाद जब भूके- प्यासे दोनो आदमी खबर लिखने बैठे, दिमाग सुन्न हो रहा था। खबर लिखते कई बार तो पड़ा। सभी साथी सिर्फ हमारा मुँह देख रहे थे। कोई कुछ नही बोल रह था।<br />mujhe शख्सियत कालम भी लिखना था। संयोग वश फिल्म मैं हूँ ना में शाहरुख़ खान के साथ काम करने वाले कुनाल से बात हो गयी और उसने जहाँ अपनी तस्वीर मुझे ई-मेल तुरंत कर दिया, वहीं कालम से जूरी तमाम बातें तुरन बता डाली, जबकि वह फिल्म की शूटिंग में मुम्बई में व्यस्त था। </div><br /><div></div><br /><div>दूसरे दिन हिंदुस्तान में हमारी खबर बेहतरीन होने के कारण हमने और राजूजी ने रहत की साँस ली, लेकिन उन माहौल से उबरने में कई हफ्ते लग गए।</div>समाप्त<br /><div></div><br /><div></div>विनीत उत्पलhttp://www.blogger.com/profile/10187277796958778493noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-4607498396944543941.post-32212120041126541122008-01-28T08:17:00.000-08:002008-01-28T10:00:35.866-08:00मैंने जिस कमलेश्वर को जाना...<a href="http://bp1.blogger.com/_vP741JqBz-8/R54Vkp63eZI/AAAAAAAAADo/w8vGa7qSSKY/s1600-h/kamleshwar.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5160585942485399954" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://bp1.blogger.com/_vP741JqBz-8/R54Vkp63eZI/AAAAAAAAADo/w8vGa7qSSKY/s320/kamleshwar.jpg" border="0" /></a><br /><div><span class=""></span><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Kamleshwar">कमलेश्वर</a> </div><br /><div>जामिया से मास मीडिया की डिग्री लेने, हिंदुस्तान टाईम्स और हिंदुस्तान में इन्टर्नशिप करने के बाद मैंने <a href="http://jmi.nic.in/cpcr/index.htm">सेंटर फार पीस एंड कोंफ्लिक्ट रीजोल्युशन</a> में एडमीशन ले लिया था। सेंटर की ओर से दो दिनों का एक कांफ्रेंस आयोजित किया गया था। सेंटर के पहले बीस छात्रों में शामिल होने के कारण सभी काम हमारे ही जिम्मे था।<br /></div><div>कांफ्रेंस के दूसरे दिन कमलेश्वरजी को एक सत्र की अध्यक्षता करनी थी। और भी कई वक्ता थे। जम कर शांति और दंगे पर चर्चा हुई। कमलेश्वरजी भी बाबरी ढांचे और अपनी नौकरी के अनुभवों को बांटा। पूरे देश के अलावा बाहरी देशों के प्रतिनिधि हाल में मौजूद थे। </div><div></div><br /><div>सत्र ख़त्म होने के बाद सेंटर के निदेशक <a href="http://www.jmi.nic.in/asc/asc.htm">साजिद सर</a> ने कमलेश्वरजी से व्यक्तिगत तौर पर मेरा परिचय कराया। उन्होंने मेरा नाम सुनते ही कहा, तुम वही विनीत तो नहीं, जिसने कुछ माह पूर्व गीतकार शैलेन्द्र पर हिंदुस्तान के सम्पादकीय पर लेख लिखा था। मैंने जैसे ही हामी भरी, उन्होंने आव देखा न ताव, सामने खडे फोटोग्राफर से कहा, भाई, विनीत के साथ मेरा अच्छा सा फोटो खींचो। वह उस समय काफी की चुस्की का आनंद उठा रहे थे।</div><div></div><br /><div>मैंने कहा, सर कोई बात नही, आप काफी पीते रहें, फोटो खीच जाएगा। उन्होंने थोडी सख्ती बरतते हुवे कहा, भले ही विनीत को अपनी तस्वीर पसंद नही हो, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं किसके साथ फोटो खीचा रहा हूँ और फोटोग्राफर से एक फोटो अपने घर पर भेजने का आदेश दिया। मैं पूरे समय हक्का-बक्का रहा। कहाँ मैं, कहाँ कमलेश्वर। तत्काल मुझे याद आ रहा था कि लेख लिखने के दौरान मुझे पढ़ने को मिला था कि जब गीतकार शैलेन्द्र का निधन हुआ था, तो कमलेश्वरजी उनके घर से लेकर अन्तिम संस्कार तक मौजूद रहे थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। </div><div><br />कार् में बैठते ही जहाँ उन्होने घर पर आने का निमंत्रण दिया, वही जम कर पढाई करने की सलाह दी। उन की कर में सिर्फ बैठने की जगह थी और पूरे कार में किताबें भरी पडी थी।</div><div></div><br /><div>यह तो थी पहली मुलाक़ात। </div><br /><div>जब मैं दिल्ली में हिंदुस्तान को अपनी सेवा दे रहा था, तो एन सी आर डेस्क से मुझे फरीदाबाद रिपोर्टिंग के लिए भेजा गया था। उस व